Monday, 2 July 2012

वर्षायोग - 2012

परम पूज्य चारित्र-चक्रवर्ती, मुनि कुंजर, समाधी-सम्राट, आचार्य श्री आदिसागर जी महाराज (अंकलीकर) की सुविशुद्ध परंपरा के वर्तमान उत्तराधिकारी परम पूज्य विद्या-वाचस्पति, शब्द शिल्पी, आकिंचन-श्रमनेश्वर, जिनशासन-प्रदीप, आचार्य श्री १०८ सुविधिसागर जी महाराज संघ सहित औरंगाबाद के बालाजी नगर में विराजमान है.
बालाजी नगर में ही वर्षायोग स्थापन विधि 3 जुलाई शाम 6 बजे होगी.

वर्षायोग में आकर अनुयोगों का श्रवण करें. 

Sunday, 24 June 2012

व्रत आत्मोत्थान का राजमार्ग है

व्रत एक दुर्द्धर्ष संकल्प है| उद्देश्ययुक्त जीवन के लिये प्रबल विश्‍वास और अगाध निष्ठा का नाम व्रत है| परविरति और आत्मरति के लिये किया जाने वाला अनुष्ठान व्रत संज्ञा को प्राप्त होता है| व्रत एक प्रकार का आत्मानुशासन है| शरीर, इन्द्रियॉं, मन, बुद्धि और संस्कारों के मायाजाल में उलझ कर मनुष्य आत्मानुशासन से पतित हो जाता है| मनुष्य को इस पतन से केवल व्रत ही बचा सकते हैं| यदि जीवन के प्रत्येक कर्म को आत्मजागरुकता के साथ किया जाये तो प्रत्येक कर्म व्रत बन जाता है| आत्मबल को जगाने और साधने का नाम ही व्रत है| व्रत प्रवृत्तिमूलक और निर्वृत्तिमूलक भी होते हैं| जिन व्रतों के परिपालन में बाहरी संसाधनों का सहयोग लिया जाता है वे प्रवृत्तिमूलक व्रत हैं और जिन व्रतों के परिपालन में आत्मशक्ति का सहयोग लिया जाता है वे निर्वृत्तिमूलक व्रत हैं| जिसप्रकार नदी के प्रवाह को मर्यादित रखने के लिये दो किनारों की आवश्यकता होती है, उसीप्रकार जीवन के प्रवाह को शुद्ध और सहज बनाने के लिये व्रतों की आवश्यकता होती है| गाड़ी को ब्रेक की, ऊँट को नकेल की, घोड़े को लगाम की और जीवन को व्रतों की आवश्यकता होती है|
व्रतों के कारण मनुष्य सम्भावित आपदाओं, विनाशकारी क्षणों और पतनकारी घड़ियों से बच सकता है तथा निरापद रह सकता है| आधिभौतिक और आधिदैविक सफलताओं को प्राप्त करने में व्रतों का सहयोग आवश्यक होता है| अनियमित आहार-विहार तथा आचरण व्यवस्था मनुष्य को बेलगाम घोड़े के समान उत्पथगामी बनाता है| उससे मनुष्य विविध आपत्तियों को प्राप्त करता है| व्रतानुष्ठान जीवन को सन्तुलित बनाता है| इससे मानवीय चेतना आलोकपथ पर ऊर्ध्वगामी होती है| 
व्रत मानसिक शक्तियों को विकसित करता है| इससे सद्विचार उत्पन्न होते हैं, जो सफलतादेवी के दर्शन कराते हैं| व्रतों के द्वारा आध्यात्मिक उपलब्धियॉं भी प्राप्त होती हैं| व्रतों से भावनाओं में उदात्तता का संचरण होता है, संवेदना छलछलाने लगती है, दिव्य प्रेम का अंकुरण होता है और सादगी का प्रस्फुरण होता है| इससे जैविक ऊर्जा का क्षरण अवरुद्ध हो जाता है और वह ऊर्जा सृजनधर्मिणी बन जाती है| इससे साधक वैचारिक विखण्डन से बच जाता है| यह बचाव केवल व्रतधारक को ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि को मंगलमयी बनाने में सहयोग करता है| अतः व्रत श्रेयस्कर हैं|

Saturday, 12 May 2012

२४ वॉं दीक्षादिवस सम्पन्न


पैठण ः- परम पूज्य चारित्र-चक्रवर्ती, आचार्यश्री आदिसागर जी महाराज (अंकलीकर) की सुविशुद्ध परम्परा के तृतीय पट्टाधीश परम पूज्य सिद्धान्त-चक्रवर्ती, आचार्यश्री सन्मतिसागर जी महाराज के उत्तराधिकारी परम पूज्य तपश्‍चर्या-चक्रवर्ती, आचार्यश्री सुविधिसागर जी महाराज का चौबीसवॉं दीक्षादिवस दिनांक ११-५-२०१२ को अतिशय क्षेत्र पैठण में सानन्द सम्पन्न हुआ|
इस अवसर पर प्रातः दस बजे विनयाजंलि सभा का आयोजन किया गया था| इस सभा का प्रारम्भ श्रीमती कंचनमाला कासलीवाल (नासिक) के द्वारा गाये गये मधुर मंगलाचरण के माध्यम से हुआ| बाहर से पधारे हुए गणमान्य श्रावकबन्धुओं ने गुरुजनों की चरणपादुका के समक्ष मंगल दीप को प्रज्वलित किया| ब्रह्मचारी श्री रवि जैन ने मानव जीवन में गुरु की आवश्यकता इस विषय पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया|
तदुपरान्त आचार्यश्री के पादप्रक्षालन एवं पूजन का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ| ब्रह्मचारिणी निर्मला लुहाड़िया ने आचार्यश्री और उनके संघस्थ साधुओं को शास्त्रभेंट किये|
पूज्या गणिनी-आर्यिकाश्री सुविधिमती माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि आचार्यश्री का चौबीसवॉं दीक्षा मनाने हेतु हम सभी एकत्रित हुए हैं| आचार्यश्री आदर्श के हिमालय हैं| छोटी-सी आयु में उन्होंने जिन उपलब्धियों को प्राप्त किया है, वह दुर्लभ है| आचार्यश्री सुविधिसागर जी महाराज का जीवन वटवृक्ष के समान है| जिस प्रकार वटवृक्ष एक छोटे से बीज से अपनी यात्रा प्रारम्भ कर विशालरूप धारण करता है, उसी प्रकार आचार्यश्री ने ब्रह्मचारी पद से अपनी यात्रा प्रारम्भ कर पट्टाचार्यत्व का पद प्राप्त किया| जिस प्रकार वटवृक्ष अनेक पक्षियों का आश्रयदाता है, उसी प्रकार आचार्यश्री अनेक शिष्यों के आश्रयदाता है और जिस प्रकार वटवृक्ष अनेक पथिकों को छाया और शीतलता प्रदान करता है, उसी प्रकार आचार्यश्री भव्य जीवों को अपनी शरण और आशीर्वाद प्रदान करते हैं|
आचार्यश्री अपनी श्रमणचर्या के परिपालन में जितने कठोर हैं, भक्तों व शिष्यों पर अनुशासन करने में उतने ही कोमल हैं| वे कर्मों का विनाश करने में जितने निष्ठुर हैं, भव्यों का उपकार करने में उतने ही दयाशाली हैं|
परम पूज्य परम्पराचार्यश्री सुविधिसागर जी महाराज ने अपने आशीर्वचन में कहा कि पूर्व जन्म में अर्जित कर्मों के प्रभाव के रूप में वासनायें अवचेतन मन में पड़ी रहती है| उसी के कारण मन में वैकारिक-भाव और तन में विकृतिजन्य कर्म उत्पन्न होते हैं| जैसे ग्रामोफोन के रिकार्ड में कटे हुए खॉंचों में से ध्वनियों का उद्गम होता है, उसी प्रकार वासनाओं से नानाविध कामनाओं का उद्गम होता है| वासनासहित मन मनुष्य का दुर्दान्त शत्रु है, क्योंकि वह मनुष्य को कुकर्म करने के लिये प्रेरित करता है|
वासनायें कर्मों के द्वारा अभिव्यक्त होती है तथा बुरे व्यक्तित्व का निर्माण करती है| वासनात्मक वृत्तियों मन में फेन की तरह इच्छाओं को जन्म देती है, जिससे मनुष्य का मन भ्रान्त और जीवन अशान्त बन जाता है| अशान्त मन से कभी धर्मकार्य सम्पन्न नहीं हो सकता| वासनायें जब मन पर हावी हो जाती है, तब मनुष्य जीवनसागर में परित्यक्त नौका की भॉंति विपदाओं की उन्नति लहरों में फँस जाता है|
मनुष्य और बुद्धत्व के मध्य वासनाओं की मजबूत दीवार बन चुकी है| उस दीवार को गिराये बिना मनुष्य परमात्मा नहीं हो सकता| मनुष्य अज्ञानता के कारण बाह्य जगत् को संवारना चाहता है| उसी में वह सुन्दरता और सौख्य की कल्पना कर रहा है| उसे यह विवेक होना चाहिये कि संसार तभी सुन्दर प्रतीत होता है, जब अन्तःकरण शुचिर्भूत होता है| प्राप्त होने वाली विलास की सामग्रियों के द्वारा भी मनुष्य तब तक सुखी नहीं हो सकता, जब तक कि मन प्रसन्न नहीं होता| सुख बाहरी जगत् की देन नहीं है, वह तो अन्तस् का पावन संगीत है| मन प्रसन्न है तो सारी वस्तुयें सुखदायक और मन अप्रसन्न हो तो सारी वस्तुयें दुःखदायक होती हैं| बाहर जो कुछ परिलक्षित हो रहा है, वह सब अन्तस् का प्रक्षेपण है| अतः सुखेच्छ भव्य को वासनाओं का विलय करने विषयक प्रयत्न करना चाहिये|
इस कार्यक्रम का कुशल संचालन ब्रह्मचारी श्री सुमित जी जैन (मन्दसौर) ने किया| उन्होंने सभा को ज्ञात कराया कि आचार्यश्री ने अब तक कुल मिला कर पचहत्तर ग्रन्थों का अनुवाद किया है| आचार्यश्री की प्रेरणा और परिश्रम के फलस्वरूप एक हजार अठारह ग्रन्थ Internet पर jaingranths.com निःशुल्क उपलब्ध हैं| आचार्यश्री का विचार है कि पॉंच हजार ग्रन्थ नेट पर उपलब्ध कराये जाये| आचार्यश्री नेट के माध्यम से जैन-पाठशाला प्रारम्भ करने वाले हैं| इसके लिये आवश्यक तैयारियॉं पूर्ण हो चुकी हैं|
ज्ञातव्य है कि आचार्यश्री की जन्मभूमि औरंगाबाद है| वे इस वर्ष औरंगाबाद में ही वर्षायोग करने वाले हैं|
कार्यक्रम के अन्त में पैठण समाज के मान्यवर सदस्य श्री विलास जी पहाड़े ने आगन्तुक अतिथियों का आभार-प्रदर्शन किया| अतिथियों के भोजन के साथ ही इस मांगलिक कार्यक्रम का समापन हुआ|

Tuesday, 8 May 2012

गणिनी पद समारोह


4 मई 2012 को परम पूज्य विद्या-वाचस्पति, गुरुवर श्री सुविधिसागर जी महाराज ने अपनी ही शिष्या पूज्य आर्यिका श्री सुविधिमती माताजी को गणिनी पद प्रदान किया. इसी दिन उन्होंने नमक रस का आजीवन त्याग कर दिया. इस अवसर पर पैठन समाज की और से पूज्य गुरुवर को आकिंचन्य श्रम्नेश्वर से अलंकृत किया.  




Wednesday, 26 October 2011

जैनधर्म और दीपावली

    कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी के अपररात्रिक काल में अर्थात् अमावस्या के दिन वर्तमानकालीन चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर को निर्वाणसुख की प्राप्ति हुयी थी| उसी दिन सायंकाल में गणाधिपति इन्द्रभूति अर्थात् गौतम गणधर को केवलज्ञान की प्राप्ति हुयी थी| मनुष्य, विद्याधर और देवों ने इस पावन बेला में दीप जला कर उत्सव मनाया था| आज भी इस अवसर पर जैनलोग उत्सव मनाते हैं| अतः दीपावली जैनपर्व के रूप में विख्यात है|

Tuesday, 25 October 2011

धर्मों के नामों में ऐक्य

धर्मों के नामों पर ध्यान दें तो भी एकत्व का बोध होता है| देखो,
१. जैन = इस शब्द की परिभाषा करते समय जैनाचार्यों ने कहा है -
रागद्वेषादि अरिन् जयतीति जिनः तस्योपासकः जैनः|
अर्थात् ः- जिन्होंने राग-द्वेषादि शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली है, वे जिन हैं| जो जिन की उपासना करते हैं, वे जैन हैं|
भारतीयसंस्कृति का कोई भी अंग (धर्म) भगवान को रागी, द्वेषी नहीं मानता| सभी लोग यही मानते हैं कि राग, द्वेष, काम-क्रोधादि भाव स्वभाव का विकार है| जब तक विभाव भावों का अभाव नहीं होता, कोई परमात्मा नहीं बनता| उसकी उपासना नहीं हो सकती| अत एव मान्यता की अपेक्षा से सभी जैन हैं, यह सिद्ध होता है|
२. ब्राह्मण = जो ब्रह्म की पूजा करे, वह ब्राह्मण है| ब्रह्म शब्द के अनेक अर्थ हैं| जैसे-वेद, सत्य, तप, तत्त्वज्ञानमय परमात्मा, आनन्दस्वरूप आत्मा आदि|
इस शब्द का व्युत्पत्यर्थ है - हिंसाया दूनोति स हिन्दूः|  अर्थात् ः- जो हिंसा से दूर रहे वह हिन्दू है|
हिंसा को किसी भी धर्म ने स्वीकार नहीं किया| समस्त तत्त्वचिन्तकों ने कहा कि अपने प्राणों की तरह अन्य जीवों के प्राण भी प्राण हैं, तुम जीना चाहते हो, वैसे वे भी जीना चाहते हैं| अत एव तुम्हें दूसरों के प्राणहरण करने का अधिकार नहीं है| तुम हिंसा मत करो| अत एव सभी लोग हिन्दू हैं|
४. मुसलमान = धान आदि कूटने का साधन होती है मुसल| मुसल टूटती नहीं और झुकती भी नहीं है| वैसे ही जिसका मान (सम्मान) हो, वह है मुसलमान| मुसलमान का अर्थ है - अपनी आन के लिये, अपनी शान के लिये, अपने सम्मान के लिये जो मरने तक तैयार हो जाये| आपमें से कौन आदमी ऐसा है जो अपमान को प्रतिकार किये बिना चुपचाप सह लेगा? शिवाजी जैसे मराठा राजा व राणा प्रताप जैसे राजपूत सम्राट् विशाल शत्रुसेना के साथ अपने सम्मान के लिये ल़ड़ते रहे| उनके आदर्श पर चलने की इच्छा रखने वाले आपमें से कितने लोग अपमान का कड़वा घूँट पी लेंगे? कोई भी नहीं ना ! फिर तो सभी मुसलमान हो गये|
५. बौद्ध = बुद्ध अर्थात् ज्ञानी, बुद्धों की जो पूजा करे, उपासना करे, वह बौद्ध है| सभी लोगों ने अपने आराध्य परमात्मा को परमज्ञानी, सर्वज्ञ माना है| अत एव सभी बौद्ध हैं - ऐसा सिद्ध हुआ|

Monday, 10 October 2011

प्रेम समस्त साधनाओं का सार है

प्रेम आत्मा की परम पावन अनुभूति है| प्रेम परमार्थसाधना है| प्रेम जीवन का अमृत है| इससे चेतना दिव्य तो ऊर्जा ऊर्ध्वमुखी होती है| अपने समान अन्य आत्माओं को स्वीकार कर सबका सन्मान करना, सबके प्रति निश्‍चल और निश्छल वात्सल्य वर्षा करना प्रेम का धर्म है| प्रेम अनुत्तर है| समस्त धर्मों का सार प्रेम ही है| जिसने प्रेम को जाना, उसने अध्यात्म के समस्त सारभूत तत्त्वों को जान लिया| मनुष्य मेंं विद्यमान रहने वाले सारे गुण नदियों की तरह है और प्रेम उन सद्गुणों का पुंजीभूत सागर है| प्रेम मन को उदात्त और शरीर को सशक्त बनाता है| प्रेम के कारण वसुधैव कुटुम्बकम् की साधना फलीभूत होती है| आत्मीयता का विस्तार बिना प्रेम के सम्भव नहीं है|
      जिस घट में मन में प्रेम नहीं होता, वह घट मन मरघट के समान है| प्रेमज्योति अलौकिक है| इसमें अनुताप नहीं होता, यह झंझावातों से बुझता नहीं है| दिव्य चिन्तामणि रत्न की शीतल कान्ति की तरह स्निग्ध, सन्तापहारी और मनमोहक कान्ति प्रेमदीपक की होती है| प्रेम ऐसा दिव्यमन्त्र है कि वह केवल अपने आश्रय को ही नहीं, अपितु अपनी सन्निधि में आने वाले जीवों को भी निर्मल, शीतल और शान्त बना देता है| प्रेम के बिना सच्चिदानन्दत्व की प्राप्ति असम्भव है| 
      लोग प्रेम और मोह को एक मानने की भूल करते हैं| मोह जड़ से सम्बन्ध रखता है तो प्रेम चेतन से रिश्ता बनाता है| मोह विभेद कराता है तो प्रेम अभेद में स्थिर करता है| मोह में अन्धत्व होता है तो प्रेम में आत्मवत् सर्वभूतेषु की दिव्यदृष्टि होती है| प्रेम सीमित से असीमित बनने की अनिर्वचनीय साधना है| प्रेम काया है तो मोह छाया है|प्रेम गंगाजल की तरह पवित्र होता है| इसे कहीं भी डालो, पवित्रता का ही निर्माण करता है| उसमें आदर्शों की अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है| प्रेम के साथ विवेकशीलता, सुहृदयता, पवित्रता, सदाशयता और वासनारहितता आदि गुणों का गठजोड़ है| प्रेम के कारण मनुष्य की भाव-संवेदनायें नित्य-निरन्तर उच्चस्तरीय आदर्शों के प्रति समर्पित रहती है| प्रेम उम्र, जाति और वैभवादि की सीमा में आबद्ध नहीं होता| प्रेम सूर्य की तरह है| जिस प्रकार सूर्य उदयकाल में मात्र प्राची को ही प्रकाशित करता है, उसी प्रकार प्रेम उदयकाल में इष्टमित्रों का अनुचरण करता है| जिस प्रकार सूर्य मध्याह्नकाल में सारे संसार को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार प्रेम विश्‍वव्यापी हो जाता है| प्रेम ही मोक्ष का पन्थ है|

Wednesday, 21 September 2011

ब्रह्मचर्य धर्म

पॉंचों इन्द्रियों के विषयों से विरक्त होने का नाम ब्रह्मचर्य है| इस व्रत को धारण करने वाले साधक स्त्री-पुरुषों के परस्पर रागजन्य सम्बन्धों से विरक्त रहते हैं और निश्‍चय से पदार्थमात्र के विकल्पों का त्याग करके आत्मस्वभाव में स्थिर रहते हैं| जिन्हें किसी भी प्रकार के सांसारिक सुखों की इच्छा नहीं होती, वे ही इस दुर्द्धर व्रत को धारण कर सकते हैं| भोग्यपदार्थ की ओर झुका हुआ पुरुष दास बन कर रह जाता है| ब्रह्मचर्य का परिपालन करने वाला दास नहीं, स्वामी होता है|
      ब्रह्मचर्य अमरत्व की साधना है| शारीरिक विकास करने के लिये धर्ममार्ग में अनेक प्रकार की साधनायें बतलायी गयी हैं| उन साधनाओं में ब्रह्मचर्य प्रमुख है, ब्रह्मचर्यव्रत परिवार का मुखिया है| ब्रह्मचयर्र् ही सच्चा विघ्न-विनाशक है, क्योंकि उसकी सन्निधि में कोई विघ्न कायम नहीं रख सकता| गुरु मार्गदृष्टा और गौरवशाली होते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य मार्गदृष्टा और गौरवशाली होने से वह भी गुरु है|
      ब्रह्मचर्य की सुगन्ध के समान सुगन्ध संसार के पुष्पों में कहॉं ? पुष्पों का सौरभ तो हवा के रुख का आवागमन करती हैं, किन्तु ब्रह्मचर्य की सुगन्ध दशों दिशाओं में फैल जाती है| ब्रह्मचर्य के बिना मन्त्र, तन्त्र, अध्यनन, दया तथा साधनों में प्रगति नहीं हो सकती| शारीरिक वर्चस्व, बौद्धिक प्रतिभा, प्रतिभाशाली वक्तृत्व, कला-कौशल आदि लौकिक अभ्युदय के लिये ब्रह्मचर्य अत्यन्त आवश्यक है| आध्यात्मिक साधना की सिद्धि के लिये ब्रह्मचर्य से उत्तम साधन दूसरा नहीं होता| ब्रह्मचर्य की तुलना सूर्य के साथ की जा सकती है| जैसे सूर्य ग्रह और उपग्रहों का केन्द्र है, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य समस्त सद्गुणों का केन्द्र है| ब्रह्मचर्य के परिपालन से मनुषय का मन निर्विकार होता है और निर्विकार मन ही परमतत्त्व का घर है| इससे पे्रम व्यापक हो जाता है, यही व्यापकता जीवन का प्राप्तव्य है|

आकिंचन्य धर्म

परि = चारों ओर से, ग्रह = पकड़ना, जकड़ना, दुःख देना, पीड़ा देना| जो चारों ओर से जकड़े, दुःख दे वह परिग्रह है| दस प्रकार के बाह्य और चौदह प्रकार के आभ्यन्तर इस प्रकार चौबीस प्रकार के परिग्रहों से रहित होकर और सुख-दुःख देने वाले कर्मजनित भावों को रोक कर निज स्वभाव में रहने का नाम आकिंचन्य है| उपात्त शरीरादिकों में भी ये मेरा नहीं है ऐसी भावना भाना आकिंचन्य धर्म है| यह धर्म जीव को निःसंग और निश्‍चिन्त बनाता है|
      परिग्रह के दो भेद हैं - बाह्य और आभ्यन्तर| बाह्य वस्तु मूर्च्छा में कारण होने से परिग्रह है न कि बाह्य वस्तु स्वयं परिग्रह है| सम्पन्नता होते हुए भी उसमें मूर्च्छा का नहीं होना आकिंचन्य है| छोड़ना और ग्रहण करना इनका तथ्य समझ में आ जाये तो त्याग और आकिंचन्य को समझा जा सकता है| सम्बन्ध जोड़ने का कार्य बुरा नहीं, लेकिन उसमें तटस्थ भाव रखना आकिंचन्य है| बेटी अपनी होते हुए भी वह परायी अमानत है ऐसा विरक्तिरूप भाव आकिंचन्य है| आकिंचन्य धर्म व्यक्ति को वस्तु से भिन्न रहना सिखाता है, जल में स्थित कमल की तरह|
      संसार की समस्त वस्तुयें नश्‍वर हैं, रिश्ता टूटने के लिये जुड़ा है ऐसा चिन्तन वस्तु के प्रति मोह (राग) उत्पन्न नहीं होने देगा| जिस प्रकार छोटे-से-छोटा कॉंटा शरीर में दुःख उत्पन्न कर देता है, उसी प्रकार छोटी-सी चाह भी शरीर को दुःख देती है| जो चाह से रहित होता है वह सब पर राज करता है| संसार भावना का चिन्तन और आकिंचन्य धर्म का पालन विपरीत परस्थितियों में स्थिरता प्रदान करने में कारणीभूत है| आज तक परिग्रह ने किसी को सुखी नहीं किया| अतः परिग्रह को छोड़ने में भूषण मानना चाहिये, जोड़ने में नहीं|

उत्तम त्याग धर्म

संसार, शरीर और भोगों से उदासीन होने का नाम त्यागधर्म है अथवा सुपात्रों को आहार, शास्त्र, औषधि और अभय देना त्यागधर्म है| अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम्| अनुग्रह के लिये स्व (धन) का देना दान है| दान चार प्रकार का है - अन्वयदान, समदान, करुणादान और पात्र-दान|
      गोत्र में जो दान दिया जाता है वह अन्वयदान है| बेटी की विदाई के समय उसे भोगोपभोग की सामग्री आदि देना अन्वयदान कहलाता है| इससे परिजनों के मध्य प्रेम बढ़ता है| समान धर्म वालों के लिये जो दिया जाता है उसे समदान कहते हैं| चिकित्सा और शिक्षा ये दो ऐसी व्यवस्थायें हैं जिनके बिना व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता| इनमें दान देना भी समदान है| इससे आभ्यन्तर लोभ की निवृत्ति होती है| अतः दान धर्म है|
     सारी सृष्टि के दुःखी जीवों को देख कर उनके दुःखों को दूर करने के लिये जो दान या सेवा दी जाती है वह करुणादान है| जो मोक्षमार्ग में लगे हुए, पात्रता से युक्त हैं वे पात्र हैं| उत्तम, मध्यम और जघन्य के भेद से तीन प्रकार के पात्रों को दान देना पात्रदान कहलाता है|दान करने से लाभान्तराय कर्म का क्षयोपशम होता है|
      लेने के लिये अवश्य सोचना चाहिये, किन्तु देने के लिये कभी नहीं सोचना चाहिये| बादल पानी लेता है तो काला और देता है तो सफेद हो जाता है| नदियॉं सागर को पानी देती है अतः मीठी होती है, किन्तु सागर पानी लेता है अतः खारा होता है| जो जितना देता है उतना ही पाता है| जीवन में यदि सम्पदा का मात्र संग्रह ही होता रहे तो जीवन विनष्ट हो जायेगा| अतः त्यागधर्म के द्वारा जीवन में भोगों पर अनुशासन स्थापित करना अनिवार्य है|