कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी के अपररात्रिक काल में अर्थात् अमावस्या के दिन वर्तमानकालीन चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर को निर्वाणसुख की प्राप्ति हुयी थी| उसी दिन सायंकाल में गणाधिपति इन्द्रभूति अर्थात् गौतम गणधर को केवलज्ञान की प्राप्ति हुयी थी| मनुष्य, विद्याधर और देवों ने इस पावन बेला में दीप जला कर उत्सव मनाया था| आज भी इस अवसर पर जैनलोग उत्सव मनाते हैं| अतः दीपावली जैनपर्व के रूप में विख्यात है|
परम पूज्य चारित्र-चक्रवर्ती, मुनि-कुंजर, आचार्य श्री आदिसागर जी महाराज (अंकलीकर) की विशुद्ध परंपरा के वर्तमान पट्टाचार्य परम पूज्य विद्या-वाचस्पति, तपश्चर्या-चक्रवर्ती, शब्द-शिल्पी, जिनशासन प्रदीप, आकिंचन्य श्रमनेश्वर, आचार्य श्री सुविधिसागर जी महाराज ने 5 रस (घी, तेल, नमक, दही, शक्कर) का आजीवन के लिए त्याग कर दिया है.
Wednesday, 26 October 2011
Tuesday, 25 October 2011
धर्मों के नामों में ऐक्य
धर्मों के नामों पर ध्यान दें तो भी एकत्व का बोध होता है| देखो,
१. जैन = इस शब्द की परिभाषा करते समय जैनाचार्यों ने कहा है -
रागद्वेषादि अरिन् जयतीति जिनः तस्योपासकः जैनः|
अर्थात् ः- जिन्होंने राग-द्वेषादि शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली है, वे जिन हैं| जो जिन की उपासना करते हैं, वे जैन हैं|
भारतीयसंस्कृति का कोई भी अंग (धर्म) भगवान को रागी, द्वेषी नहीं मानता| सभी लोग यही मानते हैं कि राग, द्वेष, काम-क्रोधादि भाव स्वभाव का विकार है| जब तक विभाव भावों का अभाव नहीं होता, कोई परमात्मा नहीं बनता| उसकी उपासना नहीं हो सकती| अत एव मान्यता की अपेक्षा से सभी जैन हैं, यह सिद्ध होता है|
२. ब्राह्मण = जो ब्रह्म की पूजा करे, वह ब्राह्मण है| ब्रह्म शब्द के अनेक अर्थ हैं| जैसे-वेद, सत्य, तप, तत्त्वज्ञानमय परमात्मा, आनन्दस्वरूप आत्मा आदि|
इस शब्द का व्युत्पत्यर्थ है - हिंसाया दूनोति स हिन्दूः| अर्थात् ः- जो हिंसा से दूर रहे वह हिन्दू है|
हिंसा को किसी भी धर्म ने स्वीकार नहीं किया| समस्त तत्त्वचिन्तकों ने कहा कि अपने प्राणों की तरह अन्य जीवों के प्राण भी प्राण हैं, तुम जीना चाहते हो, वैसे वे भी जीना चाहते हैं| अत एव तुम्हें दूसरों के प्राणहरण करने का अधिकार नहीं है| तुम हिंसा मत करो| अत एव सभी लोग हिन्दू हैं|
४. मुसलमान = धान आदि कूटने का साधन होती है मुसल| मुसल टूटती नहीं और झुकती भी नहीं है| वैसे ही जिसका मान (सम्मान) हो, वह है मुसलमान| मुसलमान का अर्थ है - अपनी आन के लिये, अपनी शान के लिये, अपने सम्मान के लिये जो मरने तक तैयार हो जाये| आपमें से कौन आदमी ऐसा है जो अपमान को प्रतिकार किये बिना चुपचाप सह लेगा? शिवाजी जैसे मराठा राजा व राणा प्रताप जैसे राजपूत सम्राट् विशाल शत्रुसेना के साथ अपने सम्मान के लिये ल़ड़ते रहे| उनके आदर्श पर चलने की इच्छा रखने वाले आपमें से कितने लोग अपमान का कड़वा घूँट पी लेंगे? कोई भी नहीं ना ! फिर तो सभी मुसलमान हो गये|
५. बौद्ध = बुद्ध अर्थात् ज्ञानी, बुद्धों की जो पूजा करे, उपासना करे, वह बौद्ध है| सभी लोगों ने अपने आराध्य परमात्मा को परमज्ञानी, सर्वज्ञ माना है| अत एव सभी बौद्ध हैं - ऐसा सिद्ध हुआ|
१. जैन = इस शब्द की परिभाषा करते समय जैनाचार्यों ने कहा है -
रागद्वेषादि अरिन् जयतीति जिनः तस्योपासकः जैनः|
अर्थात् ः- जिन्होंने राग-द्वेषादि शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली है, वे जिन हैं| जो जिन की उपासना करते हैं, वे जैन हैं|
भारतीयसंस्कृति का कोई भी अंग (धर्म) भगवान को रागी, द्वेषी नहीं मानता| सभी लोग यही मानते हैं कि राग, द्वेष, काम-क्रोधादि भाव स्वभाव का विकार है| जब तक विभाव भावों का अभाव नहीं होता, कोई परमात्मा नहीं बनता| उसकी उपासना नहीं हो सकती| अत एव मान्यता की अपेक्षा से सभी जैन हैं, यह सिद्ध होता है|
२. ब्राह्मण = जो ब्रह्म की पूजा करे, वह ब्राह्मण है| ब्रह्म शब्द के अनेक अर्थ हैं| जैसे-वेद, सत्य, तप, तत्त्वज्ञानमय परमात्मा, आनन्दस्वरूप आत्मा आदि|
इस शब्द का व्युत्पत्यर्थ है - हिंसाया दूनोति स हिन्दूः| अर्थात् ः- जो हिंसा से दूर रहे वह हिन्दू है|
हिंसा को किसी भी धर्म ने स्वीकार नहीं किया| समस्त तत्त्वचिन्तकों ने कहा कि अपने प्राणों की तरह अन्य जीवों के प्राण भी प्राण हैं, तुम जीना चाहते हो, वैसे वे भी जीना चाहते हैं| अत एव तुम्हें दूसरों के प्राणहरण करने का अधिकार नहीं है| तुम हिंसा मत करो| अत एव सभी लोग हिन्दू हैं|
४. मुसलमान = धान आदि कूटने का साधन होती है मुसल| मुसल टूटती नहीं और झुकती भी नहीं है| वैसे ही जिसका मान (सम्मान) हो, वह है मुसलमान| मुसलमान का अर्थ है - अपनी आन के लिये, अपनी शान के लिये, अपने सम्मान के लिये जो मरने तक तैयार हो जाये| आपमें से कौन आदमी ऐसा है जो अपमान को प्रतिकार किये बिना चुपचाप सह लेगा? शिवाजी जैसे मराठा राजा व राणा प्रताप जैसे राजपूत सम्राट् विशाल शत्रुसेना के साथ अपने सम्मान के लिये ल़ड़ते रहे| उनके आदर्श पर चलने की इच्छा रखने वाले आपमें से कितने लोग अपमान का कड़वा घूँट पी लेंगे? कोई भी नहीं ना ! फिर तो सभी मुसलमान हो गये|
५. बौद्ध = बुद्ध अर्थात् ज्ञानी, बुद्धों की जो पूजा करे, उपासना करे, वह बौद्ध है| सभी लोगों ने अपने आराध्य परमात्मा को परमज्ञानी, सर्वज्ञ माना है| अत एव सभी बौद्ध हैं - ऐसा सिद्ध हुआ|
Monday, 10 October 2011
प्रेम समस्त साधनाओं का सार है
प्रेम आत्मा की परम पावन अनुभूति है| प्रेम परमार्थसाधना है| प्रेम जीवन का अमृत है| इससे चेतना दिव्य तो ऊर्जा ऊर्ध्वमुखी होती है| अपने समान अन्य आत्माओं को स्वीकार कर सबका सन्मान करना, सबके प्रति निश्चल और निश्छल वात्सल्य वर्षा करना प्रेम का धर्म है| प्रेम अनुत्तर है| समस्त धर्मों का सार प्रेम ही है| जिसने प्रेम को जाना, उसने अध्यात्म के समस्त सारभूत तत्त्वों को जान लिया| मनुष्य मेंं विद्यमान रहने वाले सारे गुण नदियों की तरह है और प्रेम उन सद्गुणों का पुंजीभूत सागर है| प्रेम मन को उदात्त और शरीर को सशक्त बनाता है| प्रेम के कारण वसुधैव कुटुम्बकम् की साधना फलीभूत होती है| आत्मीयता का विस्तार बिना प्रेम के सम्भव नहीं है|
जिस घट में मन में प्रेम नहीं होता, वह घट मन मरघट के समान है| प्रेमज्योति अलौकिक है| इसमें अनुताप नहीं होता, यह झंझावातों से बुझता नहीं है| दिव्य चिन्तामणि रत्न की शीतल कान्ति की तरह स्निग्ध, सन्तापहारी और मनमोहक कान्ति प्रेमदीपक की होती है| प्रेम ऐसा दिव्यमन्त्र है कि वह केवल अपने आश्रय को ही नहीं, अपितु अपनी सन्निधि में आने वाले जीवों को भी निर्मल, शीतल और शान्त बना देता है| प्रेम के बिना सच्चिदानन्दत्व की प्राप्ति असम्भव है|
लोग प्रेम और मोह को एक मानने की भूल करते हैं| मोह जड़ से सम्बन्ध रखता है तो प्रेम चेतन से रिश्ता बनाता है| मोह विभेद कराता है तो प्रेम अभेद में स्थिर करता है| मोह में अन्धत्व होता है तो प्रेम में आत्मवत् सर्वभूतेषु की दिव्यदृष्टि होती है| प्रेम सीमित से असीमित बनने की अनिर्वचनीय साधना है| प्रेम काया है तो मोह छाया है|प्रेम गंगाजल की तरह पवित्र होता है| इसे कहीं भी डालो, पवित्रता का ही निर्माण करता है| उसमें आदर्शों की अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है| प्रेम के साथ विवेकशीलता, सुहृदयता, पवित्रता, सदाशयता और वासनारहितता आदि गुणों का गठजोड़ है| प्रेम के कारण मनुष्य की भाव-संवेदनायें नित्य-निरन्तर उच्चस्तरीय आदर्शों के प्रति समर्पित रहती है| प्रेम उम्र, जाति और वैभवादि की सीमा में आबद्ध नहीं होता| प्रेम सूर्य की तरह है| जिस प्रकार सूर्य उदयकाल में मात्र प्राची को ही प्रकाशित करता है, उसी प्रकार प्रेम उदयकाल में इष्टमित्रों का अनुचरण करता है| जिस प्रकार सूर्य मध्याह्नकाल में सारे संसार को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार प्रेम विश्वव्यापी हो जाता है| प्रेम ही मोक्ष का पन्थ है|
Wednesday, 21 September 2011
ब्रह्मचर्य धर्म
पॉंचों इन्द्रियों के विषयों से विरक्त होने का नाम ब्रह्मचर्य है| इस व्रत को धारण करने वाले साधक स्त्री-पुरुषों के परस्पर रागजन्य सम्बन्धों से विरक्त रहते हैं और निश्चय से पदार्थमात्र के विकल्पों का त्याग करके आत्मस्वभाव में स्थिर रहते हैं| जिन्हें किसी भी प्रकार के सांसारिक सुखों की इच्छा नहीं होती, वे ही इस दुर्द्धर व्रत को धारण कर सकते हैं| भोग्यपदार्थ की ओर झुका हुआ पुरुष दास बन कर रह जाता है| ब्रह्मचर्य का परिपालन करने वाला दास नहीं, स्वामी होता है|
ब्रह्मचर्य अमरत्व की साधना है| शारीरिक विकास करने के लिये धर्ममार्ग में अनेक प्रकार की साधनायें बतलायी गयी हैं| उन साधनाओं में ब्रह्मचर्य प्रमुख है, ब्रह्मचर्यव्रत परिवार का मुखिया है| ब्रह्मचयर्र् ही सच्चा विघ्न-विनाशक है, क्योंकि उसकी सन्निधि में कोई विघ्न कायम नहीं रख सकता| गुरु मार्गदृष्टा और गौरवशाली होते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य मार्गदृष्टा और गौरवशाली होने से वह भी गुरु है|
ब्रह्मचर्य की सुगन्ध के समान सुगन्ध संसार के पुष्पों में कहॉं ? पुष्पों का सौरभ तो हवा के रुख का आवागमन करती हैं, किन्तु ब्रह्मचर्य की सुगन्ध दशों दिशाओं में फैल जाती है| ब्रह्मचर्य के बिना मन्त्र, तन्त्र, अध्यनन, दया तथा साधनों में प्रगति नहीं हो सकती| शारीरिक वर्चस्व, बौद्धिक प्रतिभा, प्रतिभाशाली वक्तृत्व, कला-कौशल आदि लौकिक अभ्युदय के लिये ब्रह्मचर्य अत्यन्त आवश्यक है| आध्यात्मिक साधना की सिद्धि के लिये ब्रह्मचर्य से उत्तम साधन दूसरा नहीं होता| ब्रह्मचर्य की तुलना सूर्य के साथ की जा सकती है| जैसे सूर्य ग्रह और उपग्रहों का केन्द्र है, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य समस्त सद्गुणों का केन्द्र है| ब्रह्मचर्य के परिपालन से मनुषय का मन निर्विकार होता है और निर्विकार मन ही परमतत्त्व का घर है| इससे पे्रम व्यापक हो जाता है, यही व्यापकता जीवन का प्राप्तव्य है|
आकिंचन्य धर्म
परि = चारों ओर से, ग्रह = पकड़ना, जकड़ना, दुःख देना, पीड़ा देना| जो चारों ओर से जकड़े, दुःख दे वह परिग्रह है| दस प्रकार के बाह्य और चौदह प्रकार के आभ्यन्तर इस प्रकार चौबीस प्रकार के परिग्रहों से रहित होकर और सुख-दुःख देने वाले कर्मजनित भावों को रोक कर निज स्वभाव में रहने का नाम आकिंचन्य है| उपात्त शरीरादिकों में भी ये मेरा नहीं है ऐसी भावना भाना आकिंचन्य धर्म है| यह धर्म जीव को निःसंग और निश्चिन्त बनाता है|
परिग्रह के दो भेद हैं - बाह्य और आभ्यन्तर| बाह्य वस्तु मूर्च्छा में कारण होने से परिग्रह है न कि बाह्य वस्तु स्वयं परिग्रह है| सम्पन्नता होते हुए भी उसमें मूर्च्छा का नहीं होना आकिंचन्य है| छोड़ना और ग्रहण करना इनका तथ्य समझ में आ जाये तो त्याग और आकिंचन्य को समझा जा सकता है| सम्बन्ध जोड़ने का कार्य बुरा नहीं, लेकिन उसमें तटस्थ भाव रखना आकिंचन्य है| बेटी अपनी होते हुए भी वह परायी अमानत है ऐसा विरक्तिरूप भाव आकिंचन्य है| आकिंचन्य धर्म व्यक्ति को वस्तु से भिन्न रहना सिखाता है, जल में स्थित कमल की तरह|
संसार की समस्त वस्तुयें नश्वर हैं, रिश्ता टूटने के लिये जुड़ा है ऐसा चिन्तन वस्तु के प्रति मोह (राग) उत्पन्न नहीं होने देगा| जिस प्रकार छोटे-से-छोटा कॉंटा शरीर में दुःख उत्पन्न कर देता है, उसी प्रकार छोटी-सी चाह भी शरीर को दुःख देती है| जो चाह से रहित होता है वह सब पर राज करता है| संसार भावना का चिन्तन और आकिंचन्य धर्म का पालन विपरीत परस्थितियों में स्थिरता प्रदान करने में कारणीभूत है| आज तक परिग्रह ने किसी को सुखी नहीं किया| अतः परिग्रह को छोड़ने में भूषण मानना चाहिये, जोड़ने में नहीं|
परिग्रह के दो भेद हैं - बाह्य और आभ्यन्तर| बाह्य वस्तु मूर्च्छा में कारण होने से परिग्रह है न कि बाह्य वस्तु स्वयं परिग्रह है| सम्पन्नता होते हुए भी उसमें मूर्च्छा का नहीं होना आकिंचन्य है| छोड़ना और ग्रहण करना इनका तथ्य समझ में आ जाये तो त्याग और आकिंचन्य को समझा जा सकता है| सम्बन्ध जोड़ने का कार्य बुरा नहीं, लेकिन उसमें तटस्थ भाव रखना आकिंचन्य है| बेटी अपनी होते हुए भी वह परायी अमानत है ऐसा विरक्तिरूप भाव आकिंचन्य है| आकिंचन्य धर्म व्यक्ति को वस्तु से भिन्न रहना सिखाता है, जल में स्थित कमल की तरह|
संसार की समस्त वस्तुयें नश्वर हैं, रिश्ता टूटने के लिये जुड़ा है ऐसा चिन्तन वस्तु के प्रति मोह (राग) उत्पन्न नहीं होने देगा| जिस प्रकार छोटे-से-छोटा कॉंटा शरीर में दुःख उत्पन्न कर देता है, उसी प्रकार छोटी-सी चाह भी शरीर को दुःख देती है| जो चाह से रहित होता है वह सब पर राज करता है| संसार भावना का चिन्तन और आकिंचन्य धर्म का पालन विपरीत परस्थितियों में स्थिरता प्रदान करने में कारणीभूत है| आज तक परिग्रह ने किसी को सुखी नहीं किया| अतः परिग्रह को छोड़ने में भूषण मानना चाहिये, जोड़ने में नहीं|
उत्तम त्याग धर्म
संसार, शरीर और भोगों से उदासीन होने का नाम त्यागधर्म है अथवा सुपात्रों को आहार, शास्त्र, औषधि और अभय देना त्यागधर्म है| अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम्| अनुग्रह के लिये स्व (धन) का देना दान है| दान चार प्रकार का है - अन्वयदान, समदान, करुणादान और पात्र-दान|
गोत्र में जो दान दिया जाता है वह अन्वयदान है| बेटी की विदाई के समय उसे भोगोपभोग की सामग्री आदि देना अन्वयदान कहलाता है| इससे परिजनों के मध्य प्रेम बढ़ता है| समान धर्म वालों के लिये जो दिया जाता है उसे समदान कहते हैं| चिकित्सा और शिक्षा ये दो ऐसी व्यवस्थायें हैं जिनके बिना व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता| इनमें दान देना भी समदान है| इससे आभ्यन्तर लोभ की निवृत्ति होती है| अतः दान धर्म है|
सारी सृष्टि के दुःखी जीवों को देख कर उनके दुःखों को दूर करने के लिये जो दान या सेवा दी जाती है वह करुणादान है| जो मोक्षमार्ग में लगे हुए, पात्रता से युक्त हैं वे पात्र हैं| उत्तम, मध्यम और जघन्य के भेद से तीन प्रकार के पात्रों को दान देना पात्रदान कहलाता है|दान करने से लाभान्तराय कर्म का क्षयोपशम होता है|
लेने के लिये अवश्य सोचना चाहिये, किन्तु देने के लिये कभी नहीं सोचना चाहिये| बादल पानी लेता है तो काला और देता है तो सफेद हो जाता है| नदियॉं सागर को पानी देती है अतः मीठी होती है, किन्तु सागर पानी लेता है अतः खारा होता है| जो जितना देता है उतना ही पाता है| जीवन में यदि सम्पदा का मात्र संग्रह ही होता रहे तो जीवन विनष्ट हो जायेगा| अतः त्यागधर्म के द्वारा जीवन में भोगों पर अनुशासन स्थापित करना अनिवार्य है|
Thursday, 8 September 2011
तपःसाधना
मनुष्य का मन चंचल तथा अधोमुखी है| मनुष्य की इन्द्रियॉं उसे निरन्तर बहिर्मुखी बना कर संसार में पतित करने में तत्पर हैं| मनुय के मन में स्थित विभाव उसे स्वकीय का दर्शनलाभ नहीं लेने देते| मोक्षमार्ग के पथिक को आत्मकल्याण करने के लिये मन, इन्द्रियों और विभावों से बचने का प्रयत्न करना पड़ता है| मन और इन्द्रियॉं प्रवृत्ति की भाषा से परिचित हैं| मोक्ष निवृत्तिपरक है| अतः चैतन्यधारा को निवृत्ति पथानुगामी बनाने के लिये मन और इन्द्रियों को निवृत्ति की भाषा सिखाने का प्रयत्न करने को उत्तम तप धर्म कहते हैं|
मनुष्य की बाह्यप्रकृति राग-द्वेषात्मक प्रवृत्तियों को उद्भूत करती है| जब जीवन इन दूषित वृत्तियों में सिकुड़-सिमट रह जाता है, तब जीवन में वसन्त नहीं, पतझड़ आविर्भूत होता है| इससे जीवनोर्जा क्षरण को प्राप्त होती है और मनुष्य क्लान्त हो जाता है| जिस प्रकार अधोगमन स्वभाव के धारक जल को ऊर्ध्वगामी बनाने के लिये विद्युत्-यन्त्र की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार अधोगमन करने वाले मन को ऊर्ध्वगामी बनाने के लिये पुरुषार्थ-यन्त्र की आवश्यकता होती है| उसी पुरुषार्थ-यन्त्र को तप कहते हैं| तपःसाधना जीवन को नम्रता, आस्था, वत्सलता, सहनशीलता, क्षमादिक उदात्त भावनाओं से अभिसिंचित करती है| वासनाओं में वृत्ति है, कामनाओं का विकास है और सुख का आभास है| तप में तृप्ति है तथा आत्मगुणों का सुवास है| वासनायें दुःख का प्रतिनिधित्व करती हैं तो तप सौख्य का नेतृत्व करता है| जो इन्द्रिय और मन का निग्रह करता है, इच्छाओं का निरोध करता है, वही तप कर सकता है|
सांसारिक भोगेच्छाओं का निरोध करने को तप कहते हैं| जब मन के सागर से संसार, शरीर और भोगों के प्रति इच्छा की लहरें उछलना बन्द हो जाती हैं, तब तप प्रकट होता है| तप आत्मसाक्षात्कार का मार्ग है| जिसके द्वारा आत्मविजय की प्राप्ति होती है, उसे तप कहते हैं| अहिंसा और संयम से अभिषिक्त आत्मा ही तप के योग्य होता है| कर्मों का क्षय करने के लिये जो तपा जाता है, उसे तप कहते हैं| जो इन्द्रिय और शरीर को सन्ताप देती हैं, उन क्रियाओं के सम्यक् अनुष्ठान को तप कहते हैं| दृष्टफल से निरपेक्ष होकर स्वभाव की प्राप्ति के लिये किये जाने वाले सत्प्रयत्न को तप कहते हैं अथवा वीतरागता से अनुप्राणित समस्त क्रियानुष्ठान को तप कहते हैं|
तपस्या करने वालों के द्वारा न तो शक्ति का अतिक्रमण होना चाहिये और न उपगूहन| शक्ति का अतिक्रमण करने से कषायों का जागरण होता है तथा शक्ति का उपगूहन करने से प्रमाद का जागरण होता है| प्रमाद और कषाय बृहत्तम पातक है| अतः साधक को उतना ही तप करना चाहिये, जिससे परिणामों में ग्लानता, वचनों में स्खलन तथा काया में वत-पित्त-कफ का उद्रेक न हो| शक्ति के अनुसार किया गया तप पथ्याहार की भॉंति कल्याणकारी बनता है|
Wednesday, 7 September 2011
संयम
इन्द्रियॉं साधक की मित्र भी हैं तो शत्रु भी| ये जीवन को प्रकाशित भी करती हैं तो तमसयुक्त गहन अन्धकार से सहित भी इनके द्वारा जीवन में अमृत का संचार भी होता है तो विष का प्रचार भी होता है| ये जीवन का उद्धार भी करती हैं तो संहार भी| जीवन में स्वर्ग के अवतरण के लिये जहॉं इन्द्रियों के सहयोग की अपेक्षा है, वहीं यह नरक का सृजन करने में भी सक्षम है| अतः इन्द्रियों पर आधिपत्य जमा कर उन्हें सत्प्रवृत्तियों में प्रवृत्त करने को इन्द्रियसंयम कहते हैं|
घोड़े की सेवा करने वाला सईस कहलाता है तो घुड़सवारी करने वाला रईस कहलाता है| इन्द्रियॉं घोड़े की तरह हैं| जो उस पर सवारी करता है, वह संयमी है|
हल्का, भारी, रूखा, चिकना, ठण्डा, गरम, कड़ा और नरम - ये स्पर्शनेन्द्रिय के आठ विषय हैं| खट्टा, मीठा, चरपरा, कडुआ और कषायला - ये रसनेन्द्रिय के पॉंच विषय हैं| सुगन्ध और दुर्गन्ध - ये घ्राणेन्द्रिय के दो विषय हैं| सफेद, काला, लाल, नीला और हरा - ये चक्षुरिन्द्रिय के पॉंच विषय हैं| षड्ज, ॠषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद - ये कर्णेन्द्रिय के सात विषय हैं| मन इन्द्रियों का सम्राट् है| इन्द्रियॉं सीमित विषयों का सेवन करती हैं, किन्तु मन का विषय असीमित है| नानाविध विकल्पजालों को बुन कर मन संसार की यात्रा कर लेता है, जबकि इन्द्रियों का क्षेत्र भी सीमित है| कर्मसिद्धान्त के अनुसार इन्द्रियों के द्वारा होने वाले आस्रव की अपेक्षा मानसिक आस्रव तीव्र एवं अधिक होता है| इन्द्रिय और मन को अपने विषयों में स्वैर प्रवृत्ति नहीं करने देने को संयम कहते हैं| जिस प्रकार संसाधनों का सत्प्रयोग समीचीन लाभ प्रदान करता है व दुरुपयोग हानि पहुँचाता है, उसी प्रकार इन्द्रियों और मन का सदुपयोग लाभ तथा दुरुपयोग हानिकारक है| इन्द्रिय और मन का सदुपयोग करना ही इन्द्रियसंयम है|
मनुष्य केवल मरणधर्मा हाड़-मॉंस का पुतला नहीं है| मनुष्य इस सृष्टि की महानतम प्रतिकृति है| मनुष्य इस सृष्टि में परमात्मा का प्रतिनिधि है| मनुष्य जितना बड़ा है उतना ही बड़ा उसका व्यक्तित्व है और उतना ही बड़ा दायित्व एवं दृष्टिकोण है| आध्यात्मिक उत्कर्ष संयम के उच्च आदर्शों की जितनी साधनायें, सम्भावनायें तथा उच्चभूमिकायें हैं, उन सभी का स्रोत मनुष्य की ओर ही प्रवाहित होता है| जो अहिंसा, क्षमा, कर्त्तव्य आदि की धारायें हैं, उन सबका उदय, उद्गम तथा पाक-परिपाक मनुष्य जीवन में ही सम्भव है| मानव की महत्ता का मूल मानदण्ड, अन्तर्जागरण एवं आध्यात्मिक उत्कषर्न संयम की भूमिका पर ही टिका हुआ है| जिस मनुष्य में जितना अधिक संयम होगा, वह उतना ही अधिक श्रेष्ठ माना जाता है| संयम के द्वारा यह मनुष्य अनन्तकाल से आत्मा पर पड़ी हुयी मोह-ममता की धूल को उड़ा कर आत्मा को साफ करता है| संयम ही वह माध्यम है, जिसके द्वारा साधक विकार-वासनाओं से लड़ कर समस्त कर्मश्रृंखलाओं को तोड़ सकता है| इन्द्रिय, मन, बुद्धि और वचनों के संयम को प्राप्त किये बिना न लौकिक सिद्धियों की उपलब्धि हो सकती है और न पारलौकिक सिद्धियों की|
चित्रकार जब किसी चित्र का निर्माण करता है तो उसके लिये उसे सर्वप्रथम रेखायें खींचनी पड़ती हैं| उन रेखाओं के आधार पर ही अपने मानसपटल पर अंकित चित्र को रेखांकित कर पाता है| रेखाओं का समाधार पाये बिना चित्र का सर्वांग सुन्दर एवं सुगठित सृजन नहीं हो सकता, यही स्थिति मनुष्य-जीवन के सम्बन्ध में भी है| जीवन के सुव्यवस्थित, सुगठित एवं विकासात्मक निर्माण के लिये जीव को मर्यादाओं की कुछ रेखायें डालनी पड़ती हैं| जैनसंस्कृति की भाषा में इन्हीं रेखाओं को संयम कहते हैं|
संयम का विशद व्यापक अर्थ है - अपने ऊपर अपने द्वारा अपने नियन्त्रण को स्थापित करना| विवेकपूर्वक अपनी इच्छाओं, तृष्णामूलक अभिलाषाओं तथा पार्थिक कामनाओं पर अपने शासन की स्थापना करने को संयम कहते हैं| जीवन में नैतिकता, आध्यात्मिकता, आन्तरिक ओज एवं उद्रेचन लाने का नाम संयम है| जिसके द्वारा मनुष्य अपने अन्तर्मन को वासनाओं, इच्छाओं, भौतिक एषणाओं पर विजय प्राप्त करता है, उसे संयम कहते हैं| जिसके द्वारा साधक शरीर, इन्द्रिय और मन की दासता का परित्याग कर उनका स्वामी बनता है, उसे संयम कहते हैं| जिसको धारण करने पर जीवन का सार्वकालिक, सार्वभौमिक और सर्वतोमुखी विकास होता है, उसे संयम कहते हैं|
Monday, 5 September 2011
उत्तम आर्जव धर्म
ॠजोर्भावः आर्जवम् सरलता के भाव को आर्जव कहते हैं| जो मनस्वी कुटिलता का परित्याग कर ॠजुभावों को अंगीकृत करता है, उसके आर्जव धर्म होता है| मन में हो, वैसा ही वचनप्रयोग करना चाहिये और वचनों के अनुसार ही काया के द्वारा क्रिया करनी चाहिये| माया शल्य होने के कारण कॉंटें की तरह चुभती है| उसके प्रभाव से जीवन अशान्त हो जाता है| शान्ति प्राप्त करने के इच्छुक जीव को आर्जव का परिपालन करना चाहिये|
आर्जव धर्म को समझने के लिये कपट को समझना अत्यन्त आवश्यक है| मन में विचार कुछ, वचन से उच्चारण कुछ और काया के द्वारा क्रिया कुछ और ही करना कपट है| कपट कुटिलता को उत्पन्न करता है| कुटिलता कठिनाईयों को जागृत करती है| कुटिल व्यक्तित्व के धारक व्यक्ति से कोई मित्रता नहीं करता, बल्कि उससे दूर रहने में ही अपनी भलाई समझता है| इससे विपरीत सरल व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति को तीनों लोक में पूजा जाता है|
तथाकथित धार्मिकता से नास्तिक व्यक्तियों की उत्पत्ति होती है| अतः जितना सरलता से धर्म साधा जा सकता है उतना ही धर्म करना चाहिये| लोक में बगुले को कपट का प्रतीक माना गया है| बगुला एक टांग पर खड़ा रह कर ध्यानस्थ दिखता है, किन्तु उसके मन में तो मछली का ध्यान रहता है कि कब मछली आये और मैं उसका भक्षण करूँ| उसके कपट के विषय में कहा जाता है -
उज्ज्वल वर्ण गरीब गति, एक टांग मुख ध्यान|
देखत लागत भगवत, निकट कपट की खान॥
इसी प्रकार जिसके मन-वचन-काय में कपट झलकता हो उसका उद्धार नहीं हो सकता| आचार्य भगवन्त कहते हैं कि जो माया करता है वह तिर्यंच होता है| इसका कारण यही है कि तिर्यंच टेढ़े होते हैं और कपट भी टेढ़ेपन से युक्त होता है| अतः माया, कपट, वंचना को छोड़ कर सरलता को अंगीकार करना चाहिये|
Friday, 2 September 2011
उत्तम क्षमा
जिसके द्वारा मनुष्य का उद्धार होता है, उसे धर्म कहते हैं| उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य ये धर्मरूपी पुष्प की दस कलियॉं हैं| इन्हीं की आराधना करने के लिये पर्यूषण पर्व मनाया जाता है| उन दशधर्मों का प्राण है उत्तम क्षमा| विपरीत परिस्थितियों के आने पर भी परिणामों को विकृत नहीं होने देना क्षमाधर्म है| क्षमा के माध्यम से क्रोध कषाय पर विजय प्राप्त की जाती है| जिस प्रकार अनुप्रेक्षाओं को भावनाओं की, समिति और गुप्तियों को व्रतों की माता कहा जाता है, उसी प्रकार क्षमा समस्त धर्मों की माता है| क्षमा शब्द पृथ्वी का पर्यायवाची है| जिस प्रकार पृथ्वी अपार सहिष्णु है, उसी प्रकार मनुष्य को सहिष्णु बनना चाहिये यह क्षमाधर्म का सन्देश है| क्षमा मानव जीवन की शोभा है| क्षमा अजातशत्रु बनाने वाला मन्त्र है|
आचार्य श्री ने कहा कि यदि कोई कुवचन बोलता है तो यही विचार करना चाहिये कि जिसकी जैसी बुद्धि है, वैसी ही वाणी होती है| ऐसा विचार करने से क्रोध का जन्म नहीं हो सकेगा| यदि कोई आपके दोषों को प्रचारित करता है तो विचार करना चाहिये कि उसके वचन सत्य हैं कि असत्य ? यदि सत्य हैं तो मुझे अपने में सुधार करना चाहिये, जिससे मैं निर्दोष हो जाऊँ| मेरे दोषों को बता कर मेरा सुधार करने वाला तो मेरा मित्र है, फिर मैं उस पर क्रोध क्यों करूँ ? यदि उसके वचन असत्य हैं तो मुझे उस पर दया करनी चाहिये कि वह नाहक ही पापकर्म कर रहा है| दया के पात्र मनुष्य पर क्रोध क्यों करें ? इस प्रकार दूसरों के विपरीत वचनों पर क्षमाभाव धारण किया जा सकता है|
Saturday, 27 August 2011
तप आत्मसाक्षात्कार का मार्ग
मनुष्य की बाह्यप्रकृति राग-द्वेषात्मक प्रवृत्तियों को उद्भूत करती है| जब जीवन इन दूषित वृत्तियों में सिकुड़-सिमट रह जाता है, तब जीवन में वसन्त नहीं, पतझड़ आविर्भूत होता है| इससे जीवनोर्जा क्षरण को प्राप्त होती है और मनुष्य क्लान्त हो जाता है| जिस प्रकार अधोगमन स्वभाव के धारक जल को ऊर्ध्वगामी बनाने के लिये विद्युत्-यन्त्र की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार अधोगमन करने वाले मन को ऊर्ध्वगामी बनाने के लिये पुरुषार्थ-यन्त्र की आवश्यकता होती है| उसी पुरुषार्थ-यन्त्र को तप कहते हैं| तपःसाधना जीवन को नम्रता, आस्था, वत्सलता, सहनशीलता, क्षमादिक उदात्त भावनाओं से अभिसिंचित करती है| वासनाओं में वृत्ति है, कामनाओं का विकास है और सुख का आभास है| तप में तृप्ति है तथा आत्मगुणों का सुवास है| वासनायें दुःख का प्रतिनिधित्व करती हैं तो तप सौख्य का नेतृत्व करता है| जो इन्द्रिय और मन का निग्रह करता है, इच्छाओं का निरोध करता है, वही तप कर सकता है|
सांसारिक भोगेच्छाओं का निरोध करने को तप कहते हैं| जब मन के सागर से संसार, शरीर और भोगों के प्रति इच्छा की लहरें उछलना बन्द हो जाती हैं, तब तप प्रकट होता है| तप आत्मसाक्षात्कार का मार्ग है| जिसके द्वारा आत्मविजय की प्राप्ति होती है, उसे तप कहते हैं| अहिंसा और संयम से अभिषिक्त आत्मा ही तप के योग्य होता है| कर्मों का क्षय करने के लिये जो तपा जाता है, उसे तप कहते हैं| जो इन्द्रिय और शरीर को सन्ताप देती हैं, उन क्रियाओं के सम्यक् अनुष्ठान को तप कहते हैं| दृष्टफल से निरपेक्ष होकर स्वभाव की प्राप्ति के लिये किये जाने वाले सत्प्रयत्न को तप कहते हैं अथवा वीतरागता से अनुप्राणित समस्त क्रियानुष्ठान को तप कहते हैं|
Wednesday, 24 August 2011
अर्थ-संयम जीवन में सुख प्रदान करता है
अर्थ अनर्थ का मूल है - इस उक्ति को कौन भूल सकता है ? प्रदर्शन, व्यसन और विलासिता में व्यय होने वाला धन अनेक प्रकार के सामाजिक अपराधों को जन्म देता है| इससे वर्गविषमता की वृद्धि होती है, घृणा, द्वेष आदि भाव प्रकृष्टता को प्राप्त होते हैं, उत्पादन घटता है, अकर्मण्यता की वृद्धि होती है| ऐसी दशा में अपनी मनोभिलाषा की पूर्ति के लिये मनुष्य अनैतिक आचरण में प्रवृत्त हो जाता है| रिश्वतखोरी और मिलावट जैसी समस्याओं का कारण अर्थविषयक असंयम ही है| फिजूलखर्ची और दुर्व्यसनों में फँसा हुआ व्यक्ति अपना ही नहीं, अपितु परिवार का भी नुकसान करता है| उसका परिवार आर्थिकतंगी से झूंझते हुए अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण नहीं कर पाता| अभाव से लड़ते-झगड़ते उनका व्यक्तित्व अविकसित रह जाता है|
अर्थ-असंयम पारिवारिक अशान्ति का मूल कारण है| अतः अर्थसंयम के निर्देश से न्यायपूर्वक अर्थोपार्जन करके हितव्ययिता और मितव्ययिता का समादर करना चाहिये| जिस प्रकार योग्य समय में और योग्य परिमाण में ग्रहण किया गया आहार शरीर को बलशाली और दीर्घजीवी रखता है, उसी प्रकार योग्य समय में, योग्य स्थान में और योग्य परिमाण में किया गया न्यायोपार्जित धन का व्यय मनुष्य के सम्मान को सम्पुष्ट करता है| धन जीवननिर्वाह का संसाधन है| अतः उसका संयम निश्चित रूप से जीवन में सुख प्रदान कर सकता है|
Tuesday, 23 August 2011
भक्ति और ज्ञान से जीवन का उत्थान होता है
आराध्य के प्रति आत्मपरिणति की तादात्म्यानुभूति भक्ति है और वस्तु के शाश्वत-अशाश्वत स्वभाव को जानने का माध्यम ज्ञान है| जीवन की चैतन्य चेतनता इन्हीं के मध्य प्रवाहित होती है| ये दो श्रेष्ठ धारायें हैं| भक्ति संवेदना से युक्त भावधारा है| इन दोनों का समुचितरूप से विकास हुए बिना जीवन में परमदशा का पुष्प पुष्पित नहीं होता| ये दोनों प्रकाश के दिव्य ज्योतिस्तम्भ हैं| इन्हीं के आलोक में मनुष्य अपनी गुणसम्पदा का अवलोकन कर सकते हैं| ये परम अमृत की तरह हैं, क्योंकि इन्हीं के द्वारा आत्मा अमर होता है| आत्मा की पूर्णता और गुणों का समग्र उत्थान इन्हीं दोनों की सन्निधि में होता है|
अकेली भक्ति मूक होती है और अकेला ज्ञान वाचाल होता है| इन दोनों के मिले बिना व्यक्तित्व में अपूर्णता रह जाती है| ये दोनों जिस पल एकाकार हो जाते हैं, उसी पल जीवन में क्रान्ति घटित होती है| भक्ति और ज्ञान जीवन को परमोपलब्धि प्रदायक है| जीवनरूपी महासंग्राम में विजय प्राप्त करने के लिये अथवा मोक्ष को दिलाने वाले कला-कौशल को प्राप्त करने के लिये इस युगल की अनिवार्य आवश्यकता है| ज्ञान शास्त्र के समान विकारच्छेदक है| उससे कर्मों की जड़ पर वार तो किया जा सकता है, परन्तु साधक के पास भक्तिरूपी ढाल न हो तो वह अपनी सुरक्षा किस प्रकार कर सकेगा ? ज्ञान जब तर्कों की शुष्क रेत मन के आँगन में बिखराने का प्रयत्न करता है, तब भक्ति समीर बन कर उसे उड़ा ले जाती है| अतः भक्ति और ज्ञान दोनों ही उपादेय हैं|
भक्ति और ज्ञान अर्थात् भावना और विचारणा की दो पतवारों से ही जीवन-नौका भवसागर से पार जा सकती है| ये आध्यात्मिक जीवनरूपी गाड़ी के दो ऐसे चक्र हैं, जो इष्टस्थान तक पहुँचने के लिये वाहक बनते हैं| ये सरिता के दो किनारों की भॉंति है, क्योंकि इनकी मर्यादा में रहने वाली आध्यात्मिक सरिता परमधामरूपी सागर तक जा सकती है| भक्ति और ज्ञान ये ऐसी साधना है, जिससे सिद्धि और समाधि का जन्म होता है| ये दोनों विचारों एवं कर्मों को श्रेष्ठत्व प्रदान करते हैं| निष्काम अवस्था इनकी अनुपस्थिति में प्रक नहीं हो सकती| मनुष्य के अन्तःकरण की ये सुगन्ध हैं| यही कारण है कि जीवन की सार्थकता और समग्रता भक्ति और ज्ञान के द्वारा ही हो सकती है|
Sunday, 21 August 2011
लक्ष्यपूर्ति ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिये
मनुष्य जैसा लक्ष्य बनाता है, उसी के अनुरूप जीवन की दशा एवं दिशा की संयोजना होती है| यूँ तो मनुष्य पर्याय ही श्रेष्ठता का पर्याय है, फिर भी लक्ष्य निर्धारण कर जीवन को नयी दिशा प्रदान करने वाली पर्याय और अधिक श्रेष्ठ बनती है| लक्ष्य चाहे ईश्वर-विषयक हो या ऐश्वर्य-विषयक, उसको एकनिष्ठ होकर पूर्ण करना चाहिये| लक्ष्य की दिशा में अपनी समस्त शक्ति और अविकल प्रतिभा का समर्पण होना चाहिये| जिसे प्राप्त करने के लिये मन मचल उठता हो, जिस कार्य की अभिरुचि हो और जो सार्थक व हितकारी हो वही लक्ष्य की श्रेणि में आता है| लक्ष्य का निर्धारण अनिच्छापूर्वक नहीं किया जाता, क्योंकि उसमें उमंग और उत्साह नहीं होने से लक्ष्यसन्धान नहीं हो सकता|
लक्ष्य-निर्धारण करने के बाद सुदीर्घ प्रयत्न करने पड़ते हैं| जब कोई कार्य किया जाता है तो सफलता या असफलता मिलती है| साधक को सफलता मिलने पर हर्षान्माद और असफलता मिलने पर निराशा में नहीं फँसना चाहिये| निराशा और उदासीनता अकर्मण्य व्यक्ति के सहचर होते हैं, कर्मठ व्यक्ति के नहीं| कर्मठ व्यक्ति अनवरत उद्दाम उमंग और नूतन आशा का शक्तिकेन्द्र होते हैं| लक्ष्य चाहे जितना भी कठिन हो, दृढ़ संकल्प, अटल विश्वास और प्रबल पुरुषार्थ से उसे सहज सरल बनाया जा सकता है| जहॉं पर व्यामोह और दुर्बलता का नामोनिशान नहीं होता है, जो लगनशील योद्धा बन कर अविराम प्रयत्न करने की क्षमता दिखाता है, उसे अपने जीवन में अभीष्टप्राप्ति अवश्य होती है| सहायक खोजने की भी आवश्यकता नहीं है, स्वयं का विश्वास अटूट हो तो एकाकी भी लक्ष्यप्राप्ति कर सकता है|
अब तक संसार में अनेक आत्माओं के चरण सफलता ने चूमे है| उनके जीवन का अध्ययन किया जाये तो यह स्पष्ट होता है कि उनकी महानता के पीछे लक्ष्यनिष्ठता है| उनका सम्पूर्ण जीवन लक्ष्य के इर्दगिर्द घूमता हुआ नजर आयेगा| असफलता उन्हें हरा न सकी और कठिनाइयॉं उनके हौसलों को पस्त न कर सकी| असीम धैर्य की पूंजी साथ लेकर वे अपने गन्तव्य की ओर बढ़ते ही चले गये| वस्तुतः जीवन में एक विशिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अटल संकल्प, आत्मविश्वास, उद्दाम साहस और असीम धैर्य की आवश्यकता हुआ करती है| लक्ष्य के प्रति निज का सर्वस्व उत्सर्ग होना आवश्यक है| लक्ष्यनिष्ठा का सुनिश्चित परिणाम निकलता ही है| लक्ष्यनिष्ठ जीवन ही श्रेष्ठ एवं वरेण्य है|
Saturday, 20 August 2011
चिन्तन में विधेयात्मकता होनी चाहिये
मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन पर उसके चिन्तन का गहरा प्रभाव पड़ता है| चिन्तन के द्वारा ही मनुष्य के लक्ष्य और भविष्य का निर्धारण होता है| चिन्तन की कला को जो जान लेता है, वही सफलता के सोपान चढ़ सकता है| संसार में जितने भी नकारात्मक विचारधारा वाले मनुष्य हैं, वे अपने आपको कायरता व निराशा के भँवर में फँसा कर असफलता का दामन थाम लेते हैं| नकारात्मक विचार आत्मशक्ति की विस्मृति से उत्पन्न होते हैं| उनकी सदवस्था में मनुष्य अपनी पात्रताओं को और सामर्थ्य को पहचान नहीं पाता| गरीबी, दीनता, कायरता और अनेक प्रकार की व्याधियॉं नकारात्मक विचारों के ही परिणाम हैं| इस स्थिति में मनुष्य समयोचित निर्णय नहीं कर पाता है, नतीजन उसे लाभ की जगह हानि ही उठानी पड़ती है|
मनुष्य का स्वभाव बड़ा ही विचित्र है| मनुष्य की जितनी आस्था बुराई में है, उतनी सघनता अच्छे काम में नहीं होती| यही कारण है कि मनुष्य अच्छे कार्य को करते समय प्राप्त हुई प्रारम्भिक असफलताओं से अत्यधिक निराश हो जाते हैं| उतनी निराशा उन्हें बुरे कार्य करते समय प्राप्त होने वाली असफलताओं से नहीं होती है| उतनी ही आस्था अच्छाई के प्रति उत्पन्न करनी हो तो विचारों में विधेयात्मकता का संचरण परमावश्यक है| ऐसे चिन्तन से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा रचनाधर्मिता से समन्वित होती है| ऐसे व्यक्ति को कभी निरुत्साही नहीं देखा जा सकता| उसके उन्नति के पथ का एक द्वार बन्द होने तक तो वह अन्य द्वार अपने पुरुषार्थ के बल पर खोल लेता है| साहस और विश्वास ये उसके दो सहचर होते हैं, इसीलिये सफलता उसके चरण चूमती है|
मनुष्य के विचार उसके व्यक्तित्व के दर्पण होते हैं| वह जैसे विचार मन में रखता है, वैसे ही भाव उसके चेहरे पर उभर आते हैं| अशुभ विचार अथवा नकारात्मक विचार करने वाले मनुष्यों के चेहरे पर भय, निराशा और कुण्ठा परिलक्षित होती है| इससे विपरीत सकारात्मक विचारों के धारक लोग स्वस्थ, उल्लसित और आध्यात्मिक विचारों से परिपूर्ण रहते हैं| जिसके चित्त में एकाग्रता, दृढ़ता और निर्मलता होती है, वही मनुष्य अपने चिन्तन में शुभभावों को ला सकता है| जिसका चित्त ही रुग्न हो, उसका चरित्र निर्मल कैसे हो सकता है ? अतः विचारों की शुद्धता के लिये निषेधात्मकता को दूर करना चाहिये| सकारात्मक विचार आत्मशुद्धि में सहायक होते हैं|
Friday, 19 August 2011
संस्कारों से होता है व्यक्तित्व का निर्माण
वर्तमान में समाज एवं युग की अन्तहीन समस्याओं का मूल कारण संस्कारजनित चरित्र-निर्माण के महान कार्यों की उपेक्षा है| आज का मानव क्षणिक सुखोपभोग के लिये अथवा निजी क्षुद्र स्वार्थ की पूर्ति के लिये जीवन के इस सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य को विस्मृत कर गया है| आज मनुष्य ने भौतिक प्रगति के चाहे जितने कीर्तिमान स्थापित कर लिये हो, परन्तु वह आन्तरिक अवनति, पतन और पराभव की पीड़ा से सन्त्रस्त है| यही कारण है कि मनुष्य का जीवन अशान्ति और गहन विषाद का पर्यायवाची बन गया है| संस्कार-विहीन मनुष्य में समाधान के ढेरों प्रयत्न जीवन की खाई-खन्दकों को पाटने में असफल हो रहे हैं| तड़क-भड़क की चकाचौंध में चरित्रनिर्माण करने वाली संस्कारशाला का महत्त्व नगण्य हो गया है|
संस्कार अनेक गुणरूपी फूलों का गुलदस्ता है| सदाचरण, विश्वसनीयता, आदरभाव, स्वविवेक, विनम्रता, दिव्यदृष्टि, आज्ञापालन, वचनबद्धता, निर्णायकशक्ति और दया आदि उच्चमनोवृत्ति के निर्माता सभी गुण इस गुलदस्ते के भिन्न-भिन्न पुष्प हैं| सुव्यवस्थित पद्धति से जीवन जीना अथवा अपने जीवन को गुणों से सुवासित करना ही संस्कार करना है| संस्कार नियमों में मर्यादित जीवन को सुव्यवस्थित कर जीने की कला को सिखाता है| अच्छे व्यक्तित्व का निर्माण संस्कारों के पावन धरातल पर आध्यात्मिक एवं नैतिक वातावरण की सन्निधि में हेाता है| व्यक्तित्व ही व्यक्ति का वास्तविक परिचय है| समृद्ध एवं श्रेष्ठ व्यक्तित्व ही व्यक्ति की शाश्वत पूंजी है| इसके अभाव में व्यक्ति का व्यवहारिक धरातल नितान्त दरिद्र और तुच्छ होता है| संस्कार आत्मा का आभूषण है|
संस्कार ऐसी सम्पदा है जो दैनिक जीवन में आने वाले छोटे-छोटे सूत्रों के माध्यम से जमा होती है| जिसके पास यह पूंजी जितनी अधिक मात्रा में एकत्र होती है, वह उतना ही व्यवहारकुशल और सफल व्यक्तित्व का धनी होता है| संस्कार जीवन से भी अधिक कीमती है, क्योंकि उसी के द्वारा मनुष्य जीवन के मूल्यों को प्राप्त करता है| संस्कारों के अभाव में जब उच्च-आदर्श और मूल्य के अनुरूप जीवन को संगठित करने में मनुष्य विफल हो जाता है, तब वह बाह्य में भी समाज का समायोजन करने में भी विफल हो जाता है| माता-पिता, गुरुजन, अनुभव और संगति ये चार संस्कार-निर्माण के आधारस्तम्भ हैं| संस्कारों के कारण ही मनुष्य इन्द्रिय और मनोवृत्तियों पर अंकुश लगा कर सफलता के हिमशिखर का स्पर्श करता है|
Thursday, 18 August 2011
अन्दर से सुन्दर बनें
संसार का प्रत्येक जीव सुन्दरता का अभिलाषी है| अन्तर्मन को उकेेरे बिना वास्तविक सौन्दर्य के दर्शन हो नहीं पाते| सुन्दरता के लिये रूप की ही नहीं, गुणों की भी आवश्यकता होती है| वास्तविक सौन्दर्य में देवत्व और दिव्यत्व का भाव जुड़ा हुआ होता है| निःसन्देह वही सौन्दर्य समीचीन है, जिसमें मंगलता हो और कल्याणकारित्व हो| जीवन में आत्मप्रबोध, चरित्र,चिन्तन एवं व्यवहार को परिष्कृत करके ही कल्याणकारी सौन्दर्य के श्रीमुख का दर्शन हो सकता है| जब जीवन के हर क्षण में ऐसे सौन्दर्य का अनुभव होने लगता है, तब जीवन ही सौन्दर्य का पर्यायवाची बन जाता है| वस्तुतः शरीर को स्वस्थ एवं नीरोग रख कर आत्मान्वेषण करने पर ही सौन्दर्य प्राप्ति हो सकती है|
मन का सौन्दर्य उसके दिव्य-विचारों में सन्निहित है| श्रेष्ठ और सद्विचारों से मन का सौन्दर्य निखरता है| मनरूपी दर्पण पर जब भी कुविचारों की धूल जमती है, उसका अकृत्रिम सौन्दर्य नष्ट हो जाता है| ऐसा मन विकृत ही नहीं, कुरूप भी हो जाता है| यह समस्त मनोविकारों का जनक है| यदि मन कुमार्गगामी होता है तो शरीर भी सत्कर्मों से विरत हो जाता है, क्योंकि शरीर का नियन्ता व अनुशास्ता मन ही होता है| जिस पुरुष का मन विद्रूप हो, उसका शरीर चाहे कितना भी मनोहर व नयनरम्य क्यों न हो - सुन्दरता की श्रेणि में नहीं आ सकता| चर्म की सुन्दरता व असुन्दरता का मूल्य ही नहीं होता| इसीलिये मन के सौन्दर्य को उभारा जाना चाहिये| स्वाध्याय, ध्यान अथवा उपासनादिक साधनों से मन को सौन्दर्यान्वित किया जा सकता है| मन के सुन्दर होने पर व्यक्तित्व भी आकर्षक हो जाता है|
सेवा और सहकार के माध्यम से भावनाओं में सौन्दर्य की अभिवृद्धि की जा सकती है| जैसे मन विचारों का नायक है, उसी प्रकार हृदय भावनाओं का नायक है| भावनाओं का परिष्करण ही हृदय का सौन्दर्य है| वैचारिक सौन्दर्य अत्यन्त प्रखर और प्रबल होता है, उसी प्रकार भावनाओं का सौन्दर्य चन्द्रिकाओं के समान शीतल होता है| इन्हीं के प्रभाव से हृदय पीड़ित की पीड़ा को देख कर सजल हो उठता है| दूसरों को कष्ट में पड़ा हुआ देख कर जिसका हृदय मोम की तरह पिघल उठता है, वही भावनिक सौन्दर्य को प्राप्त करता है| अहंकार के आवरण को सेवा ही हटा सकती है| जो आत्मिक सौन्दर्य का रसास्वाद लेना चाहते हैं उन्हें सेवा का व्रत अवश्य स्वीकार करना चाहिये|
Wednesday, 17 August 2011
मौन के बिना आत्मदर्शन नहीं होता
प्रत्येक मनुष्य भौतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रगति करना चाहता है| प्रगति के लिये शक्ति की आवश्यकता होती है| शक्ति का संचयन और संवर्द्धन मौन के द्वारा होता है| इसीलिये मौन प्रगति का बीज है| मौन का अर्थ है अपनी ऊर्जा के बिखराव को समेटना| अपनी अन्तरंगशक्ति को संग्रहित करके उच्चस्तरीय पुरुषार्थ में अर्थात् आत्माभ्युदय के श्रेष्ठ मार्ग में लगाने के लिये मौन परमावश्यक है| जिस प्रकार शरीर को शक्तिमान और बलवान बनाये रखने के लिये ब्रह्मचर्य की साधना की जाती है, उसी प्रकार वाणी को प्रभावशाली बनाये रखने के लिये मौन की साधना की जाती है| अधिक बोलने से मन और मस्तिष्क दोनों भी थक जाते हैं| अतः उन दोनों की स्फूर्ति के लिये मौन रामबाण औषधि है|
सारे संसार का इतिहास उठा कर देख लो, संसार में जितने भी अनर्थ हुए हैं या युद्ध हुए हैं - उनके पीछे सबसे बड़ा कारण जिह्वा का लपलपाना ही है| द्रौपदी यदि कटुवचन नहीं बोलती तो कुरुक्षेत्र में खून की नदियॉं बही नहीं होती| राजा दशरथ कैकेयी को वचन नहीं देते तो राम के राजतिलक में कोई विघ्न उपस्थित नहीं हुआ होता| रावण यदि विभीषण के साथ कटुवचनों का प्रयोग नहीं करता तो युद्धकाल में विभीषण राम के पक्ष में न लड़ता| आज भी पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय क्षेत्रों में जितने संघर्ष दिखाई दे रहे हैं, उनमें बोलना ही मुख्य कारण है| कलह के प्रसंग पर मौन शान्ति का उपाय है| विपत्ति के समय मौन धैर्यप्रदाता है| हजारों भाषणों का जो प्रभाव नहीं पड़ता, वह मौन का पड़ता है| इसीलिये आध्यात्मिक दर्शन में मौन को सर्वाधिक और सर्वप्रथम महत्त्व दिया गया है|
मौन रहने से मन को ताजगी मिलती है, विचारों में स्फूर्ति आती है, वाणी में जोश आता है और क्रियाओं में उत्साह का संचरण होता है| मौन मनुष्य की लोकप्रियता का एक अचूक साधन है| मौन रहने वाला जीव कलह से बचता है| मौन सभी तरह के मनुष्यों का सुरक्षाकवच है| ज्ञानी जीव जब तक मौन रखता है, तब तक वह अपने सत्यव्रत की रक्षा कर सकता है और अपनी लोकप्रियता बनाये रख सकता है| मूर्ख जीव जब तक मौन रखता है, तब तक वह लोगों द्वारा समझदार समझा जाता है| मौन इन्द्रियसंयम का प्रधान कारण है| मौन साधक को प्रगतिशील बनाता है| मौन धारण करके ही मनुष्य अपने अन्तरंग की निधि के दर्शन प्राप्त कर सकता है| मौन में उच्चकोटि की शक्ति है|
Tuesday, 16 August 2011
निन्दक नहीं, प्रशंसक बनिये
गुणवानों की प्रशंसा करना एक दैवी गुण है| जिनके हृदय में दूसरों के प्रति प्रेम, सम्मान और आत्मीयता के भाव होते हैं, जिन्हें दूसरों के जीवन-व्यवहार तथा सत्कार्यों को देख कर प्रसन्नता का अनुभव होता है, जिनका मन पवित्र और विशाल होता है सच्चे अर्थों में वे ही लोग औरों की प्रशंसा कर सकते हैं| प्रशंसा करने से एक ओर जहॉं मानव गुणग्राही बनता है, वहीं दूसरी ओर समाज में अच्छे कार्यों को सम्पन्न करने वाले कार्यकर्त्ताओं को समर्थन, उत्साह और सम्बल प्राप्त होता है| इससे सत्कार्यों का असीम वेग भी बढ़ जाता है|
समाज के अधिकतर व्यक्ति अपना अमूल्य समय दूसरों की निन्दा करने में अथवा दूसरों के अवगुणों को खोजने में व्यतीत कर देते हैं| ऐसा करने से वह जिस समय में दूसरों के जीवन से कुछ प्रेरणा लेकर सीख सकता था, गुणवानों की प्रशंसा करके पुण्योपार्जन कर सकता था, उस समय को व्यर्थ में खोकर कर्मबन्ध कर लेता है| निन्दा के स्वभाव से स्वयं के जीवन में गुणों की कमी और दुर्गुणों का प्रवेश प्रारम्भ हो जाता है| यही कारण है कि निन्दक अपने आपको सदैव अशान्त, व्याकुल और अकेला पाता है| इससे विपरीत गुणग्राही व्यक्ति उत्साह, प्रमोद और शान्ति से परिपूर्ण होकर एक समय में अनेक लक्ष्यों की सिद्धि कर लेता है|
दूसरों की प्रशंसा लोकप्रिय बनने का प्रथम सोपान है| इससे चिन्तन की कोटि उच्च होती है| मनुष्य जैसा देखता है, वैसा करता है और जैसा करता है, उसी प्रकार बन जाता है| अतः पर के अवगुण देखने की अपेक्षा गुणों को देखना ही श्रेयस्कर है| प्रशंसा करने वाले मनुष्य के मन में उत्साह होता है, वह गुणों का अर्जन करने के लिये प्रतिपल प्रयत्नशील होता है| उसके मन में वात्सल्य, आत्मीयता और प्रेम की भावनायें तीव्रता से उदित होती रहती है| वह स्वयं तो शुद्ध भावों में रमण करता है और औरों के लिये भी आशा के दीप जलाता है| निन्दा करने वाला व्यक्ति दूसरों का तो कुछ भी नहीं बिगाड़ता, किन्तु स्वयं के समय, बुद्धिमत्ता, व्यवहार और जीवन की हानि कर लेता है| प्रशंसा मानव के मन और मस्तिष्क को विकसित करती है तो निन्दा उन्हें विकृत करती है| प्रशंसा प्रेरणा की प्रणेता है तो परनिन्दा पतन की पगडण्डी| अपने जीवन को समुन्नत बनाने के इच्छुक व्यक्ति को परनिन्दक नहीं अपितु प्रशंसक बनना चाहिये|
Monday, 15 August 2011
व्यवहारकुशलता से सफलतायें मिलती है
सद्व्यवहाररूपी पुष्प चारित्र की लता पर खिलता है| उसका परिमल दिग्-दिगन्त में व्याप्त होकर चिन्तन का वातावरण सुरम्य बनाता है| इस पुष्प को पल्लवित करने के लिये सजल भावनारूपी नीर आवश्यक होता है| मनुष्य सामाजिक परिवेश में जीवित रहता है| रिश्तों की सौहार्द्रता के बिना सामाजिकता स्थिर नहीं रह सकती| रिश्तों की सौहार्द्रता के लिये सद्व्यवहार अति-आवश्यक है| मनुष्य के ज्ञान-विज्ञान, आचरण या आध्यात्मिक पात्रता का मूल्य व्यवहार-कुशलता के सद्भाव में ही सम्भव है| जो मनुष्य व्यवहारशिष्ट नहीं होता, उसके सारे गुण अंकरहित बिन्दियों की तरह निरर्थक हो जाते हैं| बाह्य व्यवहार आन्तरिक चिन्तन एवं भावनाओं के गर्भ से प्रसूत होने से अन्तरंग का दर्पण होता है|
अशिष्ट व्यवहार अनगढ़ित रूखे व्यक्तित्व का परिचायक है| अशिष्ट व्यक्ति कितनी ही प्रतिभाओं से सम्पन्न क्यों न हो, वह लोकसम्मान को अर्जित नहीं कर सकता| उसकी अव्यावहारिकता लोगों के लिये विकर्षण का कारण बनती है| लोगों के लिये तो दूर, उसके परिजन भी उसके साथ पराये जैसा बर्ताव करते हैं| अपनी उद्धतता एवं उद्दण्डता के कारण वह अपने और औरों के लिये घातक होता है| वह अग्नि के समान ही स्व-परदाहक होता है| अभद्र और अशिष्ट व्यवहार करने वाला सभी का तिरस्कार पाते रहने से और अधिक उग्र और विनाशशील हो जाता है| फलतः उसकी रचनाधर्मिता नष्ट हो जाती है| अतः अशिष्ट व्यवहार करना आत्महत्या करने के समान है|
व्यवहार की शालीनता पारसमणि के समान इच्छित फलप्रदात्री है| यह व्यक्तित्व का सहज वशीकरण मन्त्र है| यह ऐसा गुप्तरहस्य है, जिसे हृदयंगम करने वाला मनुष्य सफलता और महानता का वरण करता है| व्यवहार की शालीनता न केवल औरों को प्रसन्न करती है, अपितु स्वयं को भी आनन्दित करती है| इससे अन्तरंग परिष्कृत होता है| जब अन्तरंग की भावना प्रस्फुटित होती है, तब हृदय मोम के समान कोमल हो जाता है| इससे वाणी में अमृत झरने लगता है| ऐसी संवेदनशीलता दूसरों के हृदय पर सीधा असर करती है| फलतः वातावरण में सौम्यता आती है| इससे प्रतिभाओं को उभरने का अवसर मिलता है और सफलता प्राप्त होने की नियामकता बन जाती है|
Saturday, 13 August 2011
रक्षाबन्धन
रक्षाबन्धनपर्व को वात्सलपर्व अथवा सलौनापर्व कहते हैं| इस पर्व के नाम में आगत बन्धन शब्द संकल्प का सूचक है| रक्षा का संकल्प करना ही रक्षाबन्धन है| रक्षा किसकी? यह प्रश्न विचारणीय है| अनादिकाल से संसार में परिभ्रमण करने वाले आत्मा के स्वभवा की रक्षा, सम्प्रदायों की अग्नि में झुलस रहे धर्म की रक्षा, परिवार राष्ट्र-देश और परिवेश की रक्षा इसी प्रकार समस्त कर्त्तव्य कर्मों की रक्षा आवश्यक है|
संस्कृत, संस्कृति और संस्कार हमारे देश के आस्थास्तम्भ थे, जो शनैः शनैः जर्जरित हो रहे हैं| आज उनकी रक्षा का संकल्प आवश्यक है, क्योंकि देश होगा तो धर्म होगा तथा धर्म होगा तो मनुष्य के जीवन में सुख-शान्ति होगी| मुनिप्रवर विष्णुकुमार जी ने अपना सर्वस्व लुटा कर आज ही के दिन सात सौ मुनियों की रक्षा की थी| आज आर्यावर्त्त की आर्यसंस्कृति किसी विष्णुकुमार मुनिराज की राह तृषित नजरों से निहार रही है| क्या हम अपने संकल्पशक्ति को दृढ़ बना कर संस्कृतिरक्षा के लिये कटिबद्ध हो सकते हैं? क्या अमर्यादा के पंक में आकण्ठ डूबे इस सभ्यता को त्राण दिलाने का संकल्प किया जा सकता है? जिस देश में नारी पूजी जाती थी, उसी देश में आज मॉं-बहनों के आँचल तार-तार किये जा रहे हैं| क्या इससे उन्हें छुटकारा दिलाया जा सकता है? ऐसे कई यक्षप्रश्न हैं| इनके समाधान खोजने का संकल्पदिवस ही रक्षाबन्धन है| अतः जब हम कर्त्तव्यरक्षा के लिये तत्पर होंगे तभी पर्व मनाना सार्थक होगा|
Friday, 12 August 2011
मनुष्यजीवन
मनुष्यजीवन मुक्तिनगर में प्रविष्ट होने का मुख्य प्रवेशद्वार है| इसको प्राप्त करने के लिये सुरेन्द्र, असुरेन्द्र और अहमिन्द्र तक तरसते हैं| इसी महाभवन में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूपी महाराजा रहते हैं| मोहरूपी दानव ने आत्मा की अगाध गुणराशि का अपहरण कर रखा है, उससे युद्ध कर विजय प्राप्त करने के लिये मनुष्यजीवन से सुन्दर और कोई कुरुक्षेत्र नहीं है| इस जीवन की महिमा अपरम्पार है| मनुष्यजीवन सात राजु प्रमाण ऊँची शिवपुरी को मात्र एक समय में पहुँचाने वाला श्रेष्ठ वायुयान है|
मनुष्यजीवन अज्ञानरूपी तम को क्षणभर में ही ध्वस्त करने वाला तमहर सहस्रकिरण है| मनुष्यजीवन केवलज्ञानरूपी ज्योति का प्रकाश फैलाने वाला सर्वश्रेष्ठ ऊर्जाघर है| मनुष्यजीवन आधि, व्याधि और उपाधि इन त्रिविध अग्नि में दग्ध होने वाली आत्माओं को अपने शीतल और स्निग्ध जल से शीतलता प्रदान करने वाला मधुर जलयुक्त झरना है| मनुष्यजीवन जन्म, जरा और मरणरूपी रोगत्रय का सफलतापूर्वक निराकरण करने वाला महान औषधालय है| यह जीवाजीवादि सप्त तत्त्व तथा बन्ध और मोक्षमार्ग का बोध कराने वाला महाविद्यालय है|
यही एक ऐसा उत्तम बन्दरगाह है जहॉं धर्मरूपी वस्तु का क्रय-विक्रय बड़े पैमाने पर होता है| यही अगाध शान्ति प्रदान करने वाला शान्ति निकेतन है| मनुष्यजीवन में ही शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक निधियों की प्राप्ति की जा सकती हैं| जिन्हें अपने आत्मतत्त्व से अगाध प्रेम है और जो परम सौख्य को प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें इस जीवन का सार्थक उपयोग करना चाहिये|
Thursday, 11 August 2011
व्रत आत्मोत्थान का राजमार्ग है
व्रत एक दुर्द्धर्ष संकल्प है| उद्देश्ययुक्त जीवन के लिये प्रबल विश्वास और अगाध निष्ठा का नाम व्रत है| परविरति और आत्मरति के लिये किया जाने वाला अनुष्ठान व्रत संज्ञा को प्राप्त होता है| व्रत एकप्रकार का आत्मानुशासन है| शरीर, इन्द्रियॉं, मन, बुद्धि और संस्कारों के मायाजाल में उलझ कर मनुष्य आत्मानुशासन से पतित हो जाता है| मनुष्य को इस पतन से केवल व्रत ही बचा सकते हैं| यदि जीवन के प्रत्येक कर्म को आत्मजागरुकता के साथ किया जाये तो प्रत्येक कर्म व्रत बन जाता है| आत्मबल को जगाने और साधने का नाम ही व्रत है| व्रत प्रवृत्तिमूलक और निर्वृत्तिमूलक भी होते हैं| जिन व्रतों के परिपालन में बाहरी संसाधनों का सहयोग लिया जाता है वे प्रवृत्तिमूलक व्रत हैं और जिन व्रतों के परिपालन में आत्मशक्ति का सहयोग लिया जाता है वे निर्वृत्तिमूलक व्रत हैं| जिसप्रकार नदी के प्रवाह को मर्यादित रखने के लिये दो किनारों की आवश्यकता होती है, उसीप्रकार जीवन के प्रवाह को शुद्ध और सहज बनाने के लिये व्रतों की आवश्यकता होती है| गाड़ी को ब्रेक की, ऊँट को नकेल की, घोड़े को लगाम की और जीवन को व्रतों की आवश्यकता होती है|
व्रतों के कारण मनुष्य सम्भावित आपदाओं, विनाशकारी क्षणों और पतनकारी घड़ियों से बच सकता है तथा निरापद रह सकता है| आधिभौतिक और आधिदैविक सफलताओं को प्राप्त करने में व्रतों का सहयोग आवश्यक होता है| अनियमित आहार-विहार तथा आचरण व्यवस्था मनुष्य को बेलगाम घोड़े के समान उत्पथगामी बनाता है| उससे मनुष्य विविध आपत्तियों को प्राप्त करता है| व्रतानुष्ठान जीवन को सन्तुलित बनाता है| इससे मानवीय चेतना आलोकपथ पर ऊर्ध्वगामी होती है|
व्रत मानसिक शक्तियों को विकसित करता है| इससे सद्विचार उत्पन्न होते हैं, जो सफलतादेवी के दर्शन कराते हैं| व्रतों के द्वारा आध्यात्मिक उपलब्धियॉं भी प्राप्त होती हैं| व्रतों से भावनाओं में उदात्तता का संचरण होता है, संवेदना छलछलाने लगती है, दिव्य प्रेम का अंकुरण होता है और सादगी का प्रस्फुरण होता है| इससे जैविक ऊर्जा का क्षरण अवरुद्ध हो जाता है और वह ऊर्जा सृजनधर्मिणी बन जाती है| इससे साधक वैचारिक विखण्डन से बच जाता है| यह बचाव केवल व्रतधारक को ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि को मंगलमयी बनाने में सहयोग करता है| अतः व्रत श्रेयस्कर हैं|
व्रत आत्मोत्थान का राजमार्ग है
- व्रत एक दुर्द्धर्ष संकल्प है| उद्देश्ययुक्त जीवन के लिये प्रबल विश्वास और अगाध निष्ठा का नाम व्रत है| परविरति और आत्मरति के लिये किया जाने वाला अनुष्ठान व्रत संज्ञा को प्राप्त होता है| व्रत एकप्रकार का आत्मानुशासन है| शरीर, इन्द्रियॉं, मन, बुद्धि और संस्कारों के मायाजाल में उलझ कर मनुष्य आत्मानुशासन से पतित हो जाता है| मनुष्य को इस पतन से केवल व्रत ही बचा सकते हैं| यदि जीवन के प्रत्येक कर्म को आत्मजागरुकता के साथ किया जाये तो प्रत्येक कर्म व्रत बन जाता है| आत्मबल को जगाने और साधने का नाम ही व्रत है| व्रत प्रवृत्तिमूलक और निर्वृत्तिमूलक भी होते हैं| जिन व्रतों के परिपालन में बाहरी संसाधनों का सहयोग लिया जाता है वे प्रवृत्तिमूलक व्रत हैं और जिन व्रतों के परिपालन में आत्मशक्ति का सहयोग लिया जाता है वे निर्वृत्तिमूलक व्रत हैं| जिसप्रकार नदी के प्रवाह को मर्यादित रखने के लिये दो किनारों की आवश्यकता होती है, उसीप्रकार जीवन के प्रवाह को शुद्ध और सहज बनाने के लिये व्रतों की आवश्यकता होती है| गाड़ी को ब्रेक की, ऊँट को नकेल की, घोड़े को लगाम की और जीवन को व्रतों की आवश्यकता होती है|
व्रतों के कारण मनुष्य सम्भावित आपदाओं, विनाशकारी क्षणों और पतनकारी घड़ियों से बच सकता है तथा निरापद रह सकता है| आधिभौतिक और आधिदैविक सफलताओं को प्राप्त करने में व्रतों का सहयोग आवश्यक होता है| अनियमित आहार-विहार तथा आचरण व्यवस्था मनुष्य को बेलगाम घोड़े के समान उत्पथगामी बनाता है| उससे मनुष्य विविध आपत्तियों को प्राप्त करता है| व्रतानुष्ठान जीवन को सन्तुलित बनाता है| इससे मानवीय चेतना आलोकपथ पर ऊर्ध्वगामी होती है|
व्रत मानसिक शक्तियों को विकसित करता है| इससे सद्विचार उत्पन्न होते हैं, जो सफलतादेवी के दर्शन कराते हैं| व्रतों के द्वारा आध्यात्मिक उपलब्धियॉं भी प्राप्त होती हैं| व्रतों से भावनाओं में उदात्तता का संचरण होता है, संवेदना छलछलाने लगती है, दिव्य प्रेम का अंकुरण होता है और सादगी का प्रस्फुरण होता है| इससे जैविक ऊर्जा का क्षरण अवरुद्ध हो जाता है और वह ऊर्जा सृजनधर्मिणी बन जाती है| इससे साधक वैचारिक विखण्डन से बच जाता है| यह बचाव केवल व्रतधारक को ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि को मंगलमयी बनाने में सहयोग करता है| अतः व्रत श्रेयस्कर हैं|
Wednesday, 10 August 2011
णमोकारमन्त्र का महत्त्व
णमोकारमन्त्र का स्मरण करने से समस्त अमंगल दूर हो जाते हैं, अनेक प्रकार की ॠद्धि-सिद्धियॉं उपलब्ध होती हैं तथा मुक्त होने का सुलभ अवलम्बन प्राप्त होता है| जिस प्रकार अग्निकण ईन्धन की महाराशि को भस्म करने में समर्थ है, उसी प्रकार णमोकारमन्त्र चिरसंचित ज्ञानावरणादि कर्मों के समूहरूपी ईन्धन की राशि को क्षणार्द्ध में दग्ध करने में समर्थ है| कल्पवृक्ष, चिन्तामणि रत्न अथवा कामधेनु चिन्तित फलप्रदायक होने से जगत् में पूज्य माने गये हैं| णमोकारमन्त्र चिन्तित और अचिन्तित फलों का प्रदाता होने से उन तीनों से भी अधिक पूज्य है| जिस अज्ञान, पाप और संक्लेशरूपी अन्धकार को सूर्य, चन्द्र अथवा दीपक जैसे ज्योतिर्मयी पदार्थ दूर नहीं कर सकते, उस अन्धकार को इस महामन्त्र का स्मरण अतिशीघ्र दूर कर देता है| अतः इससे अधिक ज्योतिर्मयी कौन हो सकता है ?
इस मन्त्र का स्मरण करने से अनादिकालीन मूर्च्छा भग्न हो जाती है| णमोकारमन्त्र अंग और अंगबाह्य ग्रन्थों का सार है| जिस प्रकार धन की रक्षा के लिये तिजोरी, शरीर की रक्षा के लिये वस्त्र, आरोग्य की रक्षा के लिये औषधि आदि की आवश्यकता हुआ करती है, उसी प्रकार आध्यात्मिक भावों की रक्षा के लिये महामन्त्र की आवश्यकता है| यह सच है कि यह मन्त्र शब्दों से निर्मित है, किन्तु यह अपने आराधक को अशब्द की ओर ले जाता है| जब तक चेतना में चित्रांकित नहीं हो जाता, तब तक ही यह मन्त्र शब्दमयी बना रहता है| यह मन्त्र भक्ति, जप और ध्यान में सामंजस्य स्थापित करता है| संसाररूपी रणक्षेत्र में मोह, राग-द्वेषरूपी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना हो तो साधक के पास णमोकारमन्त्ररूपी अमोघ बाण परमावश्यक हैं| जिस प्रकार जल से शारीरिक मल दूर होते हैं, उसी प्रकार णमोकारमन्त्र से कर्ममल दूर होता है|
जिस प्रकार धरती में वपन किया गया बीज धरती के रस को चूस कर यथासमय अंकुर के रूप में उत्फुल्लित होता है, उसी प्रकार साधक के मन में बोये गये णमोकारमन्त्र का एक-एक अक्षर आत्मा के चैतन्यामृत का पान कर तेज स्रोत के रूप में प्रकट हो जाता है| गुरु की गुरुता और प्रभु की प्रभुता की प्राप्ति के लिये णमोकारमन्त्र सहायक बनता है|
Wednesday, 27 July 2011
प्रार्थना अन्तःकरण का बल है
प्रार्थना अन्तःकरण की प्रामाणिक पुकार है| बाहरी वेश-विन्यास से प्रार्थना का दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है| प्रार्थना भावाभिव्यक्ति है, भाषाभिव्यक्ति नहीं| जिस प्रकार सिद्धसाधक का बल ध्यान होता है, उसी प्रकार प्राथमिक साधना का बल प्रार्थना होता है| प्रार्थना आत्मा का गुण है| बाहरी आडम्बरों का आच्छादन तिरोहित हो जाने पर आत्मा अपनी पूर्ण सरलता और अकृत्रिमता को ग्रहण करता है| ऐसे समय में मन में उठा अहोभाव अथवा दिव्यता का भाव प्रार्थना है| प्रार्थना की शक्ति शुद्ध अन्तःकरण की शक्ति है| उसके द्वारा मनुष्य का सुप्त दैवत्व जगाया जा सकता है| प्रार्थना के बिना भक्त कभी भगवान नहीं बन सकता| प्रार्थना मन को मृदु बनाती है| मृदु हुआ मन कभी पापपरक प्रवृत्तियों में संलग्न नहीं हो सकता| अतः प्रार्थी सदैव निष्पाप होता है|
यद्यपि संकल्प और प्रार्थना ये दोनों भी अन्तःकरण के उपार्जन हैं, परन्तु दोनों में मौलिक अन्तर भी है| संकल्प आत्मा का बल है और प्रार्थना आत्मा की पुकार| संकल्प में निर्भीकता, सशक्तता और आत्मविश्वास होता है| प्रार्थना में दिव्यता है, दीनता है और शालीनता है| जब प्रार्थना कातर पुकार के रूप में निःसृत होती है, तब वह साधारण न रह कर असाधारण शक्ति का स्रोत बन जाती है| संकल्प का बल लक्ष्य को पुनः पुनः टक्कर मार कर उसे मूर्तिमान बना देता है| प्रार्थना और संकल्प में अन्तर होते हुए भी दोनों में कार्य-कारण सम्बन्ध है| प्रार्थना कारण है, संकल्प उसका कार्य है| प्रार्थना के बिना संकल्प सघन और फलदायी नहीं हो सकता| इसीलिये संकल्प की अपेक्षा प्रार्थना श्रेष्ठ है| प्रार्थना शुष्क अन्तराल की उपज नहीं, अपितु दिव्य अन्तःकरण का अमर-कोश है| प्रार्थना जब प्रार्थी के विह्वल मन से निःसृत होती है तो वह अवश्य पूर्ण होती है|
शुष्क शब्दों को दुहराते रहने से प्रार्थना नहीं होती| शब्द भी उच्च अन्तःकरण की भावसंवेदनाओं से सिक्त होने चाहिये| मन की दिव्यता में हर शब्द प्रार्थनामय होगा| प्रार्थना के कारण ससीम शक्ति वाले शब्द असीम सामर्थ्य के संवाहक बन जाते हैं| प्रार्थना निःशब्द भी होती है| जिस दिव्य भाव से मन मचलने लग जाये, वही भाव प्रार्थना है| इसके लिये किसी स्थानविशेष अथवा सामग्री-विशेष की आवश्यकता नहीं है| मन का कोरापन अथवा निष्पापपन प्रार्थना की प्राथमिक आवश्यकता है| भगवान अथवा अपने इष्ट के प्रति अटूट विश्वास प्रार्थना का मूल है| गुणहीन और शक्तिहीन पुरुष प्रार्थना के बल से इतना सशक्त होता है कि उसके लिये कोई कार्य असम्भव नहीं रह पाता| दृष्टि और सृष्टि का परिशोधन करना हो तो प्रार्थना ही एकमात्र सक्षम उपाय है|
Tuesday, 26 July 2011
आनन्द आत्मा की निजनिधि है
आनन्द आत्मा की सहज अवस्था है| वह अध्यात्म की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है| जिस शाश्वत आनन्द का अन्वेषण मनुष्य बाहर कर रहे हैं, वस्तुतः अन्तरंग की असीम पूंजी है| बाहर यदि आनन्द की अनुभूति होती है तो वह भीतर का ही विस्तार है| मनुष्य ज्यों-ज्यों अन्तस् की गहराई में प्रवेश करता है, त्यों-त्यों उसकी तथ्यात्मक अनुभूति और अधिक स्पष्ट और सघन हो जाती है| यदि बाहर में आनन्द की उपलब्धि हो पाती, तो समान सुख-सुविधाओं से सम्पन्न मनुष्यों को समान रूप से आनन्द उपलब्ध होना चाहिये था, परन्तु ऐसा होता नहीं है| कोई नयनरम्य सौन्दर्य के मध्य में रहते हुए भी अतृप्ति का अनुभव करता है और कोई घोर नारकीय परिस्थितियों में रह कर भी स्वर्गीय सुख की प्रतीति करता है|
मनुष्य सुख को और आनन्द को एकार्थक मानने की बड़ी भारी भूल कर रहा है| सूर्य और चन्द्र के प्रकाश में जो भेद है, संस्कृत भाषा के अनुसार वही भेद सुख और आनन्द में है| संस्कृत में ख शब्द का अर्थ इन्द्रिय है| जो इन्द्रिय और मन को अच्छा लगे, शरीर को उत्फुल्लित करे वह सुख है| हर्ष-विषाद से रहित आत्मा की समस्थिति से उत्पन्न भेद आनन्द कहलाता है| सुख जड़ाश्रित है और आनन्द आत्माश्रित है| यह दिव्य चेतनात्मक स्थिति है| उसे उपलब्ध कर ही स्वप्रतिष्ठित हुआ जा सकता है| इसीलिये महर्षिगण आत्मा को सच्चिदानन्द कहते हैं| जिस दिन मनुष्य जगत् की परिधि से आत्मकेन्द्र की ओर यात्रा प्रारम्भ करेगा, उसी दिन उसे आनन्द समुपलब्ध होगा| अपने पूर्ण आनन्द की प्राप्ति जिसे हो गयी है वही भगवान संज्ञा को प्राप्त होता है|
आनन्द आत्मा का शाश्वत गुण है| उसकी परिप्राप्त्यर्थ मनुष्य को जड़ पदार्थों की शरण छोड़ कर आध्यात्मिक मार्ग का अनुसरण करना होगा| इसका प्रथम चरण है कि मनुष्य उपलब्ध साधनों में सन्तोष करने लग जाये| मन ज्यों-ज्यों विषयविरक्त होता चला जायेगा, आत्मा वैसे-वैसे अपनी उस अवस्था में पहुँच सकता है, जिसे सहजानन्द या परमानन्द कहते हैं| यदि सुख-साधनों में मन को अटका के रखा जायेगा तो उससे व्यग्रता बढ़ती चली जायेगी| फलतः दुःख ही प्राप्त होने लगेंगे| जड़ पदार्थ यदि सचमुच ही प्रसन्नता के उद्गम होेते तो वे किसी के लिये विपन्नता के निमित्त नहीं बन पाते| अतः आनन्द को आत्मगुण स्वीकार कर आत्मपरिष्करण करना चाहिये|
Monday, 25 July 2011
वासना के अन्त के बिना समस्याओं का अन्त नहीं होता
पूर्व जन्म में अर्जित कर्मों के प्रभाव के रूप में वासनायें अवचेतन मन में पड़ी रहती है| उसी के कारण मन में वैकारिक-भाव और तन में विकृतिजन्य कर्म उत्पन्न होते हैं| जैसे ग्रामोफोन के रिकार्ड में कटे हुए खॉंचों में से ध्वनियों का उद्गम होता है, उसी प्रकार वासनाओं से नानाविध कामनाओं का उद्गम होता है| वासनासहित मन मनुष्य का दुर्दान्त शत्रु है, क्योंकि वह मनुष्य को कुकर्म करने के लिये प्रेरित करता है| वासनायें कर्मों के द्वारा अभिव्यक्त होती है तथा बुरे व्यक्तित्व का निर्माण करती है| वासनात्मक वृत्तियों मन में फेन की तरह इच्छाओं को जन्म देती है, जिससे मनुष्य का मन भ्रान्त और जीवन अशान्त बन जाता है| वासनायें जब मन पर हावी हो जाती है, तब मनुष्य जीवनसागर में परित्यक्त नौका की भॉंति विपदाओं की उन्नति लहरों में फँस जाता है|
आदर्श ध्येय मनुष्य के लिये सद्व्यवहार करने की प्रेरणा देते हैं| मन स्वभावतः अधोगामी है| अनादिकालीन संस्कारवशात् वह निरन्तर वासनाओं के मायाजाल में उलझा रहता है| जो साधक मलिन मन का खिलौना बन जाता है, उसकी साधना निष्प्रभ हो जाती है| जो मन को विमल विवेक के प्रकाश में रखता है, वही अपनी इष्टसिद्धि कर सकता है| वासनायें मन और बुद्धि की दिव्य जीवन्त शक्तियों को बन्धनबद्ध करती है| इसीलिये वासना से रहित जीव प्रगति नहीं कर सकता| विश्व की सारी समस्यायें घनीभूत वासनाओं का ही प्रतिफल है| वासनाओं ने जीवन को समस्याग्रस्त बना दिया है| वासनाओं का अन्त होने पर ही जीवन की समस्याओ का अन्त होगा| वासनाओं का अन्त करने के लिये जप, ध्यान और भक्ति आदि साधनों का अवलम्बन किया जा सकता है| मनुष्य को यह बात सदैव ध्यान रखनी चाहिये कि वासनायें शक्ति का क्षय व व्यक्ति का नाश करती है|
मनुष्य और बुद्धत्व के मध्य वासनाओं की मजबूत दीवार बन चुकी है| उस दीवार को गिराये बिना मनुष्य परमात्मा नहीं हो सकता| मनुष्य अज्ञानता के कारण बाह्य जगत् को संवारना चाहता है| उसी में वह सुन्दरता और सौख्य की कल्पना कर रहा है| उसे यह विवेक होना चाहिये कि संसार तभी सुन्दर प्रतीत होता है, जब अन्तःकरण शुचिर्भूत होता है| प्राप्त होने वाली विलास की सामग्रियों के द्वारा भी मनुष्य तब तक सुखी नहीं हो सकता, जब तक कि मन प्रसन्न नहीं होता| सुख बाहरी जगत् की देन नहीं है, वह तो अन्तस् का पावन संगीत है| मन प्रसन्न है तो सारी वस्तुयें सुखदायक और मन अप्रसन्न हो तो सारी वस्तुयें दुःखदायक होती हैं| बाहर जो कुछ परिलक्षित हो रहा है, वह सब अन्तस् का प्रक्षेपण है| अतः सुखेच्छ भव्य को वासनाओं का विलय करने विषयक प्रयत्न करना चाहिये|
Sunday, 24 July 2011
तनाव छोडो सुख से जीओ
तनाव मनुष्य के मनोदैहिक तन्त्र की ऐसी अवस्था है, जिसमें वह अपने संवेगों और मांसपेशियों में जकड़न का अनुभव करता है| तनावग्रस्त मनुष्य का मन एवं शरीर दोनों ही सदैव दुःखी रहते हैं| ऐसा व्यक्ति सामान्य-से-सामान्य कार्य को भी सुचारु रूप से पूर्ण नहीं कर पाता| उसमें भय, चिन्ता, बेचैनी, घबराहट आदि के लक्षण विद्यमान रहते हैं| उसके शरीर में कम्पन होने लगता है| वह सदैव थका-थका-सा रहता है| भोजन करना अथवा स्नान करना जैसे दैनिक कार्य भी वह मन लगा कर नहीं कर सकता| तनाव से शरीर की पाचनक्रिया मन्द हो जाती है, रक्तचाप बढ़ जाता है और शरीर की अन्य ग्रन्थिया शिथिल हो जाती हैं| इससे शरीर निष्क्रिय हो जाता है| अजीर्ण और अनिद्रा तनाव के ही परिणाम हैं|
तनाव आकस्मिक नहीं होता| मनुष्य को वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारियों का निर्वहण करना पड़ता है| इस कार्य में कभी अधिक बोझ होता है| प्रतिस्पर्धा के कारण किसी से ईर्ष्या, द्वेष, भय या बेचैनी भी होती है| ये सारे कारण नाड़ीमण्डल पर विपरीत प्रभाव डालते हैं| फलतः मनुष्य तनावग्रस्त हो जाता है| वर्तमान युग में विलासपूर्ण जीवन, शारीरिक कार्यों से परहेज और स्वाद के वशीभूत होकर निष्प्राण खाद्यसामग्री का सेवन दिनचर्या का अविभाज्य अंग बन चुका है| इन कारणों से पाचनतन्त्र शिथिल हो जाता है| पाचनतन्त्र के शिथिल हो जाने पर शरीर का उचित पोषण नहीं हो पाता| अस्वस्थ शरीर में रहने वाला मन भी अस्वस्थ हो जाता है| फिर, जरा-सी भी विपरीत परिस्थिति मनुष्य को तनावग्रस्त बना देती है| तनाव सुखपूर्ण जीवन का महान शत्रु है|
तनाव से मुक्त होना कठिन अवश्य है, परन्तु असम्भव नहीं है| उसके लिये मनुष्य को सर्वप्रथम गलत दृष्टिकोण से सोचना बन्द करना होगा| अक्सर यही होता है कि नकारात्मक चिन्तन तनाव के उत्पादक बन जाते हैं| अवांछनीय अपेक्षायें, अनजाना भय अथवा अत्यधिक कार्यशीलता तनाव के कारण हो सकते हैं| यदि मनुष्य अपने विचारों में विधेयात्मकता ले आवे तो तनाव उड़न-छू हो जायेगा| बीते कल को भूल जाना और आगामी कल को कल पर छोड़ देना तनावमुक्ति का सुगम उपाय है| टहलना, संगीत सुनना, शंख या घण्टेे की मन्दध्वनि श्रवण करना, भगवन्नाम का जप करना, प्रणवमन्त्र का जप करना, शरीर की मालिश करना और सुपाच्य भोजन ग्रहण करना आदि कार्यों से भी तनाव से मुक्ति मिल सकती है|
तनाव आकस्मिक नहीं होता| मनुष्य को वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारियों का निर्वहण करना पड़ता है| इस कार्य में कभी अधिक बोझ होता है| प्रतिस्पर्धा के कारण किसी से ईर्ष्या, द्वेष, भय या बेचैनी भी होती है| ये सारे कारण नाड़ीमण्डल पर विपरीत प्रभाव डालते हैं| फलतः मनुष्य तनावग्रस्त हो जाता है| वर्तमान युग में विलासपूर्ण जीवन, शारीरिक कार्यों से परहेज और स्वाद के वशीभूत होकर निष्प्राण खाद्यसामग्री का सेवन दिनचर्या का अविभाज्य अंग बन चुका है| इन कारणों से पाचनतन्त्र शिथिल हो जाता है| पाचनतन्त्र के शिथिल हो जाने पर शरीर का उचित पोषण नहीं हो पाता| अस्वस्थ शरीर में रहने वाला मन भी अस्वस्थ हो जाता है| फिर, जरा-सी भी विपरीत परिस्थिति मनुष्य को तनावग्रस्त बना देती है| तनाव सुखपूर्ण जीवन का महान शत्रु है|
तनाव से मुक्त होना कठिन अवश्य है, परन्तु असम्भव नहीं है| उसके लिये मनुष्य को सर्वप्रथम गलत दृष्टिकोण से सोचना बन्द करना होगा| अक्सर यही होता है कि नकारात्मक चिन्तन तनाव के उत्पादक बन जाते हैं| अवांछनीय अपेक्षायें, अनजाना भय अथवा अत्यधिक कार्यशीलता तनाव के कारण हो सकते हैं| यदि मनुष्य अपने विचारों में विधेयात्मकता ले आवे तो तनाव उड़न-छू हो जायेगा| बीते कल को भूल जाना और आगामी कल को कल पर छोड़ देना तनावमुक्ति का सुगम उपाय है| टहलना, संगीत सुनना, शंख या घण्टेे की मन्दध्वनि श्रवण करना, भगवन्नाम का जप करना, प्रणवमन्त्र का जप करना, शरीर की मालिश करना और सुपाच्य भोजन ग्रहण करना आदि कार्यों से भी तनाव से मुक्ति मिल सकती है|
Saturday, 23 July 2011
प्रेम
प्रेम आत्मा की परम पावन अनुभूति है| प्रेम परमार्थसाधना है| प्रेम जीवन का अमृत है| इससे चेतना दिव्य तो ऊर्जा ऊर्ध्वमुखी होती है| अपने समान अन्य आत्माओं को स्वीकार कर सबका सन्मान करना, सबके प्रति निश्चल और निश्छल वात्सल्य वर्षा करना प्रेम का धर्म है| प्रेम अनुत्तर है| समस्त धर्मों का सार प्रेम ही है| जिसने प्रेम को जाना, उसने अध्यात्म के समस्त सारभूत तत्त्वों को जान लिया| मनुष्य मेंं विद्यमान रहने वाले सारे गुण नदियों की तरह है और प्रेम उन सद्गुणों का पुंजीभूत सागर है| प्रेम मन को उदात्त और शरीर को सशक्त बनाता है| प्रेम के कारण वसुधैव कुटुम्बकम् की साधना फलीभूत होती है| आत्मीयता का विस्तार बिना प्रेम के सम्भव नहीं है|
जिस घट में मन में प्रेम नहीं होता, वह घट मन मरघट के समान है| प्रेमज्योति अलौकिक है| इसमें अनुताप नहीं होता, यह झंझावातों से बुझता नहीं है| दिव्य चिन्तामणि रत्न की शीतल कान्ति की तरह स्निग्ध, सन्तापहारी और मनमोहक कान्ति प्रेमदीपक की होती है| प्रेम ऐसा दिव्यमन्त्र है कि वह केवल अपने आश्रय को ही नहीं, अपितु अपनी सन्निधि में आने वाले जीवों को भी निर्मल, शीतल और शान्त बना देता है| प्रेम के बिना सच्चिदानन्दत्व की प्राप्ति असम्भव है|
लोग प्रेम और मोह को एक मानने की भूल करते हैं| मोह जड़ से सम्बन्ध रखता है तो प्रेम चेतन से रिश्ता बनाता है| मोह विभेद कराता है तो प्रेम अभेद में स्थिर करता है| मोह में अन्धत्व होता है तो प्रेम में आत्मवत् सर्वभूतेषु की दिव्यदृष्टि होती है| प्रेम सीमित से असीमित बनने की अनिर्वचनीय साधना है| प्रेम काया है तो मोह छाया है| प्रेम गंगाजल की तरह पवित्र होता है| इसे कहीं भी डालो, पवित्रता का ही निर्माण करता है| उसमें आदर्शों की अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है| प्रेम के साथ विवेकशीलता, सुहृदयता, पवित्रता, सदाशयता और वासनारहितता आदि गुणों का गठजोड़ है| प्रेम के कारण मनुष्य की भाव-संवेदनायें नित्य-निरन्तर उच्चस्तरीय आदर्शों के प्रति समर्पित रहती है| प्रेम उम्र, जाति और वैभवादि की सीमा में आबद्ध नहीं होता| प्रेम सूर्य की तरह है| जिस प्रकार सूर्य उदयकाल में मात्र प्राची को ही प्रकाशित करता है, उसी प्रकार प्रेम उदयकाल में इष्टमित्रों का अनुचरण करता है| जिस प्रकार सूर्य मध्याह्नकाल में सारे संसार को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार प्रेम विश्वव्यापी हो जाता है| प्रेम ही मोक्ष का पन्थ है|
जिस घट में मन में प्रेम नहीं होता, वह घट मन मरघट के समान है| प्रेमज्योति अलौकिक है| इसमें अनुताप नहीं होता, यह झंझावातों से बुझता नहीं है| दिव्य चिन्तामणि रत्न की शीतल कान्ति की तरह स्निग्ध, सन्तापहारी और मनमोहक कान्ति प्रेमदीपक की होती है| प्रेम ऐसा दिव्यमन्त्र है कि वह केवल अपने आश्रय को ही नहीं, अपितु अपनी सन्निधि में आने वाले जीवों को भी निर्मल, शीतल और शान्त बना देता है| प्रेम के बिना सच्चिदानन्दत्व की प्राप्ति असम्भव है|
लोग प्रेम और मोह को एक मानने की भूल करते हैं| मोह जड़ से सम्बन्ध रखता है तो प्रेम चेतन से रिश्ता बनाता है| मोह विभेद कराता है तो प्रेम अभेद में स्थिर करता है| मोह में अन्धत्व होता है तो प्रेम में आत्मवत् सर्वभूतेषु की दिव्यदृष्टि होती है| प्रेम सीमित से असीमित बनने की अनिर्वचनीय साधना है| प्रेम काया है तो मोह छाया है| प्रेम गंगाजल की तरह पवित्र होता है| इसे कहीं भी डालो, पवित्रता का ही निर्माण करता है| उसमें आदर्शों की अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है| प्रेम के साथ विवेकशीलता, सुहृदयता, पवित्रता, सदाशयता और वासनारहितता आदि गुणों का गठजोड़ है| प्रेम के कारण मनुष्य की भाव-संवेदनायें नित्य-निरन्तर उच्चस्तरीय आदर्शों के प्रति समर्पित रहती है| प्रेम उम्र, जाति और वैभवादि की सीमा में आबद्ध नहीं होता| प्रेम सूर्य की तरह है| जिस प्रकार सूर्य उदयकाल में मात्र प्राची को ही प्रकाशित करता है, उसी प्रकार प्रेम उदयकाल में इष्टमित्रों का अनुचरण करता है| जिस प्रकार सूर्य मध्याह्नकाल में सारे संसार को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार प्रेम विश्वव्यापी हो जाता है| प्रेम ही मोक्ष का पन्थ है|
Friday, 22 July 2011
अहंकारः एक नशा
क्रोध का शीर्षासन मान है| व्यक्ति अधिकार चाहता है| जब अधिकार की प्राप्ति नहीं होती, उसी समय क्रोध उत्पन्न होता है और अधिकार की प्राप्ति होने पर अहंकार अर्थात् मान की उत्पत्ति हो जाती है| अपेक्षा की उपेक्षा से क्रोध और अपेक्षा की पूर्णता मान है| जितने अपराध क्रोध से नहीं होते उतने मान से होते पाये गये हैं| रावण ने मान की पूर्ति के लिये सीता को अपने पास रखा और युद्ध किया| अहंकार के कारण रामायण का युद्ध हुआ|
शराब केवल मुख से सेवन की जाती है, किन्तु अहंकाररूपी शराब को तो शरीर का जर्रा-जर्रा पीता है| शराब के नशे से तो मनुष्य तो नाली में ही गिरता है, किन्तु मानरूपी शराब पीने पर होने वाला नशा नरक, निगोद में ही गिराता है| शराब पीने वाले कहीं-कहीं पाये जाते हैं, किन्तु मानरूपी शराब पीने वाले सर्वत्र पाये जाते हैं| सभी काल में पाये जाते हैं| अतः मान को छोड़ कर कोमलता अपनानी चाहिये|
Subscribe to:
Posts (Atom)