प्रार्थना अन्तःकरण की प्रामाणिक पुकार है| बाहरी वेश-विन्यास से प्रार्थना का दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है| प्रार्थना भावाभिव्यक्ति है, भाषाभिव्यक्ति नहीं| जिस प्रकार सिद्धसाधक का बल ध्यान होता है, उसी प्रकार प्राथमिक साधना का बल प्रार्थना होता है| प्रार्थना आत्मा का गुण है| बाहरी आडम्बरों का आच्छादन तिरोहित हो जाने पर आत्मा अपनी पूर्ण सरलता और अकृत्रिमता को ग्रहण करता है| ऐसे समय में मन में उठा अहोभाव अथवा दिव्यता का भाव प्रार्थना है| प्रार्थना की शक्ति शुद्ध अन्तःकरण की शक्ति है| उसके द्वारा मनुष्य का सुप्त दैवत्व जगाया जा सकता है| प्रार्थना के बिना भक्त कभी भगवान नहीं बन सकता| प्रार्थना मन को मृदु बनाती है| मृदु हुआ मन कभी पापपरक प्रवृत्तियों में संलग्न नहीं हो सकता| अतः प्रार्थी सदैव निष्पाप होता है|
यद्यपि संकल्प और प्रार्थना ये दोनों भी अन्तःकरण के उपार्जन हैं, परन्तु दोनों में मौलिक अन्तर भी है| संकल्प आत्मा का बल है और प्रार्थना आत्मा की पुकार| संकल्प में निर्भीकता, सशक्तता और आत्मविश्वास होता है| प्रार्थना में दिव्यता है, दीनता है और शालीनता है| जब प्रार्थना कातर पुकार के रूप में निःसृत होती है, तब वह साधारण न रह कर असाधारण शक्ति का स्रोत बन जाती है| संकल्प का बल लक्ष्य को पुनः पुनः टक्कर मार कर उसे मूर्तिमान बना देता है| प्रार्थना और संकल्प में अन्तर होते हुए भी दोनों में कार्य-कारण सम्बन्ध है| प्रार्थना कारण है, संकल्प उसका कार्य है| प्रार्थना के बिना संकल्प सघन और फलदायी नहीं हो सकता| इसीलिये संकल्प की अपेक्षा प्रार्थना श्रेष्ठ है| प्रार्थना शुष्क अन्तराल की उपज नहीं, अपितु दिव्य अन्तःकरण का अमर-कोश है| प्रार्थना जब प्रार्थी के विह्वल मन से निःसृत होती है तो वह अवश्य पूर्ण होती है|
शुष्क शब्दों को दुहराते रहने से प्रार्थना नहीं होती| शब्द भी उच्च अन्तःकरण की भावसंवेदनाओं से सिक्त होने चाहिये| मन की दिव्यता में हर शब्द प्रार्थनामय होगा| प्रार्थना के कारण ससीम शक्ति वाले शब्द असीम सामर्थ्य के संवाहक बन जाते हैं| प्रार्थना निःशब्द भी होती है| जिस दिव्य भाव से मन मचलने लग जाये, वही भाव प्रार्थना है| इसके लिये किसी स्थानविशेष अथवा सामग्री-विशेष की आवश्यकता नहीं है| मन का कोरापन अथवा निष्पापपन प्रार्थना की प्राथमिक आवश्यकता है| भगवान अथवा अपने इष्ट के प्रति अटूट विश्वास प्रार्थना का मूल है| गुणहीन और शक्तिहीन पुरुष प्रार्थना के बल से इतना सशक्त होता है कि उसके लिये कोई कार्य असम्भव नहीं रह पाता| दृष्टि और सृष्टि का परिशोधन करना हो तो प्रार्थना ही एकमात्र सक्षम उपाय है|