Wednesday, 27 July 2011

प्रार्थना अन्तःकरण का बल है


   प्रार्थना अन्तःकरण की प्रामाणिक पुकार है| बाहरी वेश-विन्यास से प्रार्थना का दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है| प्रार्थना भावाभिव्यक्ति है, भाषाभिव्यक्ति नहीं| जिस प्रकार सिद्धसाधक का बल ध्यान होता है, उसी प्रकार प्राथमिक साधना का बल प्रार्थना होता है| प्रार्थना आत्मा का गुण है| बाहरी आडम्बरों का आच्छादन तिरोहित हो जाने पर आत्मा अपनी पूर्ण सरलता और अकृत्रिमता को ग्रहण करता है| ऐसे समय में मन में उठा अहोभाव अथवा दिव्यता का भाव प्रार्थना है| प्रार्थना की शक्ति शुद्ध अन्तःकरण की शक्ति है| उसके द्वारा मनुष्य का सुप्त दैवत्व जगाया जा सकता है| प्रार्थना के बिना भक्त कभी भगवान नहीं बन सकता| प्रार्थना मन को मृदु बनाती है| मृदु हुआ मन कभी पापपरक प्रवृत्तियों में संलग्न नहीं हो सकता| अतः प्रार्थी सदैव निष्पाप होता है|
   यद्यपि संकल्प और प्रार्थना ये दोनों भी अन्तःकरण के उपार्जन हैं, परन्तु दोनों में मौलिक अन्तर भी है| संकल्प आत्मा का बल है और प्रार्थना आत्मा की पुकार| संकल्प में निर्भीकता, सशक्तता और आत्मविश्‍वास होता है| प्रार्थना में दिव्यता है, दीनता है और शालीनता है| जब प्रार्थना कातर पुकार के रूप में निःसृत होती है, तब वह साधारण न रह कर असाधारण शक्ति का स्रोत बन जाती है| संकल्प का बल लक्ष्य को पुनः पुनः टक्कर मार कर उसे मूर्तिमान बना देता है| प्रार्थना और संकल्प में अन्तर होते हुए भी दोनों में कार्य-कारण सम्बन्ध है| प्रार्थना कारण है, संकल्प उसका कार्य है| प्रार्थना के बिना संकल्प सघन और फलदायी नहीं हो सकता| इसीलिये संकल्प की अपेक्षा प्रार्थना श्रेष्ठ है| प्रार्थना शुष्क अन्तराल की उपज नहीं, अपितु दिव्य अन्तःकरण का अमर-कोश है| प्रार्थना जब प्रार्थी के विह्वल मन से निःसृत होती है तो वह अवश्य पूर्ण होती है|
   शुष्क शब्दों को दुहराते रहने से प्रार्थना नहीं होती| शब्द भी उच्च अन्तःकरण की भावसंवेदनाओं से सिक्त होने चाहिये| मन की दिव्यता में हर शब्द प्रार्थनामय होगा| प्रार्थना के कारण ससीम शक्ति वाले शब्द असीम सामर्थ्य के संवाहक बन जाते हैं| प्रार्थना निःशब्द भी होती है| जिस दिव्य भाव से मन मचलने लग जाये, वही भाव प्रार्थना है| इसके लिये किसी स्थानविशेष अथवा सामग्री-विशेष की आवश्यकता नहीं है| मन का कोरापन अथवा निष्पापपन प्रार्थना की प्राथमिक आवश्यकता है| भगवान अथवा अपने इष्ट के प्रति अटूट विश्‍वास प्रार्थना का मूल है| गुणहीन और शक्तिहीन पुरुष प्रार्थना के बल से इतना सशक्त होता है कि उसके लिये कोई कार्य असम्भव नहीं रह पाता| दृष्टि और सृष्टि का परिशोधन करना हो तो प्रार्थना ही एकमात्र सक्षम उपाय है|

Tuesday, 26 July 2011

आनन्द आत्मा की निजनिधि है


   आनन्द आत्मा की सहज अवस्था है| वह अध्यात्म की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है| जिस शाश्‍वत आनन्द का अन्वेषण मनुष्य बाहर कर रहे हैं, वस्तुतः अन्तरंग की असीम पूंजी है| बाहर यदि आनन्द की अनुभूति होती है तो वह भीतर का ही विस्तार है| मनुष्य ज्यों-ज्यों अन्तस् की गहराई में प्रवेश करता है, त्यों-त्यों उसकी तथ्यात्मक अनुभूति और अधिक स्पष्ट और सघन हो जाती है| यदि बाहर में आनन्द की उपलब्धि हो पाती, तो समान सुख-सुविधाओं से सम्पन्न मनुष्यों को समान रूप से आनन्द उपलब्ध होना चाहिये था, परन्तु ऐसा होता नहीं है| कोई नयनरम्य सौन्दर्य के मध्य में रहते हुए भी अतृप्ति का अनुभव करता है और कोई घोर नारकीय परिस्थितियों में रह कर भी स्वर्गीय सुख की प्रतीति करता है|
   मनुष्य सुख को और आनन्द को एकार्थक मानने की बड़ी भारी भूल कर रहा है| सूर्य और चन्द्र के प्रकाश में जो भेद है, संस्कृत भाषा के अनुसार वही भेद सुख और आनन्द में है| संस्कृत में ख शब्द का अर्थ इन्द्रिय है| जो इन्द्रिय और मन को अच्छा लगे, शरीर को उत्फुल्लित करे वह सुख है| हर्ष-विषाद से रहित आत्मा की समस्थिति से उत्पन्न भेद आनन्द कहलाता है| सुख जड़ाश्रित है और आनन्द आत्माश्रित है| यह दिव्य चेतनात्मक स्थिति है| उसे उपलब्ध कर ही स्वप्रतिष्ठित हुआ जा सकता है| इसीलिये महर्षिगण आत्मा को सच्चिदानन्द कहते हैं| जिस दिन मनुष्य जगत् की परिधि से आत्मकेन्द्र की ओर यात्रा प्रारम्भ करेगा, उसी दिन उसे आनन्द समुपलब्ध होगा| अपने पूर्ण आनन्द की प्राप्ति जिसे हो गयी है वही भगवान संज्ञा को प्राप्त होता है|
   आनन्द आत्मा का शाश्‍वत गुण है| उसकी परिप्राप्त्यर्थ मनुष्य को जड़ पदार्थों की शरण छोड़ कर आध्यात्मिक मार्ग का अनुसरण करना होगा| इसका प्रथम चरण है कि मनुष्य उपलब्ध साधनों में सन्तोष करने लग जाये| मन ज्यों-ज्यों विषयविरक्त होता चला जायेगा, आत्मा वैसे-वैसे अपनी उस अवस्था में पहुँच सकता है, जिसे सहजानन्द या परमानन्द कहते हैं| यदि सुख-साधनों में मन को अटका के रखा जायेगा तो उससे व्यग्रता बढ़ती चली जायेगी| फलतः दुःख ही प्राप्त होने लगेंगे| जड़ पदार्थ यदि सचमुच ही प्रसन्नता के उद्गम होेते तो वे किसी के लिये विपन्नता के निमित्त नहीं बन पाते| अतः आनन्द को आत्मगुण स्वीकार कर आत्मपरिष्करण करना चाहिये|

Monday, 25 July 2011

वासना के अन्त के बिना समस्याओं का अन्त नहीं होता


   पूर्व जन्म में अर्जित कर्मों के प्रभाव के रूप में वासनायें अवचेतन मन में पड़ी रहती है| उसी के कारण मन में वैकारिक-भाव और तन में विकृतिजन्य कर्म उत्पन्न होते हैं| जैसे ग्रामोफोन के रिकार्ड में कटे हुए खॉंचों में से ध्वनियों का उद्गम होता है, उसी प्रकार वासनाओं से नानाविध कामनाओं का उद्गम होता है| वासनासहित मन मनुष्य का दुर्दान्त शत्रु है, क्योंकि वह मनुष्य को कुकर्म करने के लिये प्रेरित करता है| वासनायें कर्मों के द्वारा अभिव्यक्त होती है तथा बुरे व्यक्तित्व का निर्माण करती है| वासनात्मक वृत्तियों मन में फेन की तरह इच्छाओं को जन्म देती है, जिससे मनुष्य का मन भ्रान्त और जीवन अशान्त बन जाता है| वासनायें जब मन पर हावी हो जाती है, तब मनुष्य जीवनसागर में परित्यक्त नौका की भॉंति विपदाओं की उन्नति लहरों में फँस जाता है|
आदर्श ध्येय मनुष्य के लिये सद्व्यवहार करने की प्रेरणा देते हैं| मन स्वभावतः अधोगामी है| अनादिकालीन संस्कारवशात् वह निरन्तर वासनाओं के मायाजाल में उलझा रहता है| जो साधक मलिन मन का खिलौना बन जाता है, उसकी साधना निष्प्रभ हो जाती है| जो मन को विमल विवेक के प्रकाश में रखता है, वही अपनी इष्टसिद्धि कर सकता है| वासनायें मन और बुद्धि की दिव्य जीवन्त शक्तियों को बन्धनबद्ध करती है| इसीलिये वासना से रहित जीव प्रगति नहीं कर सकता| विश्‍व की सारी समस्यायें घनीभूत वासनाओं का ही प्रतिफल है| वासनाओं ने जीवन को समस्याग्रस्त बना दिया है| वासनाओं का अन्त होने पर ही जीवन की समस्याओ का अन्त होगा| वासनाओं का अन्त करने के लिये जप, ध्यान और भक्ति आदि साधनों का अवलम्बन किया जा सकता है| मनुष्य को यह बात सदैव ध्यान रखनी चाहिये कि वासनायें शक्ति का क्षय व व्यक्ति का नाश करती है|
मनुष्य और बुद्धत्व के मध्य वासनाओं की मजबूत दीवार बन चुकी है| उस दीवार को गिराये बिना मनुष्य परमात्मा नहीं हो सकता| मनुष्य अज्ञानता के कारण बाह्य जगत् को संवारना चाहता है| उसी में वह सुन्दरता और सौख्य की कल्पना कर रहा है| उसे यह विवेक होना चाहिये कि संसार तभी सुन्दर प्रतीत होता है, जब अन्तःकरण शुचिर्भूत होता है| प्राप्त होने वाली विलास की सामग्रियों के द्वारा भी मनुष्य तब तक सुखी नहीं हो सकता, जब तक कि मन प्रसन्न नहीं होता| सुख बाहरी जगत् की देन नहीं है, वह तो अन्तस् का पावन संगीत है| मन प्रसन्न है तो सारी वस्तुयें सुखदायक और मन अप्रसन्न हो तो सारी वस्तुयें दुःखदायक होती हैं| बाहर जो कुछ परिलक्षित हो रहा है, वह सब अन्तस् का प्रक्षेपण है| अतः सुखेच्छ भव्य को वासनाओं का विलय करने विषयक प्रयत्न करना चाहिये|

Sunday, 24 July 2011

तनाव छोडो सुख से जीओ

    तनाव मनुष्य के मनोदैहिक तन्त्र की ऐसी अवस्था है, जिसमें वह अपने संवेगों और मांसपेशियों में जकड़न का अनुभव करता है| तनावग्रस्त मनुष्य का मन एवं शरीर दोनों ही सदैव दुःखी रहते हैं| ऐसा व्यक्ति सामान्य-से-सामान्य कार्य को भी सुचारु रूप से पूर्ण नहीं कर पाता| उसमें भय, चिन्ता, बेचैनी, घबराहट आदि के लक्षण विद्यमान रहते हैं| उसके शरीर में कम्पन होने लगता है| वह सदैव थका-थका-सा रहता है| भोजन करना अथवा स्नान करना जैसे दैनिक कार्य भी वह मन लगा कर नहीं कर सकता| तनाव से शरीर की पाचनक्रिया मन्द हो जाती है, रक्तचाप बढ़ जाता है और शरीर की अन्य ग्रन्थिया शिथिल हो जाती हैं| इससे शरीर निष्क्रिय हो जाता है| अजीर्ण और अनिद्रा तनाव के ही परिणाम हैं|
    तनाव आकस्मिक नहीं होता| मनुष्य को वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारियों का निर्वहण करना पड़ता है| इस कार्य में कभी अधिक बोझ होता है| प्रतिस्पर्धा के कारण किसी से ईर्ष्या, द्वेष, भय या बेचैनी भी होती है| ये सारे कारण नाड़ीमण्डल पर विपरीत प्रभाव डालते हैं| फलतः मनुष्य तनावग्रस्त हो जाता है| वर्तमान युग में विलासपूर्ण जीवन, शारीरिक कार्यों से परहेज और स्वाद के वशीभूत होकर निष्प्राण खाद्यसामग्री का सेवन दिनचर्या का अविभाज्य अंग बन चुका है| इन कारणों से पाचनतन्त्र शिथिल हो जाता है| पाचनतन्त्र के शिथिल हो जाने पर शरीर का उचित पोषण नहीं हो पाता| अस्वस्थ शरीर में रहने वाला मन भी अस्वस्थ हो जाता है| फिर, जरा-सी भी विपरीत परिस्थिति मनुष्य को तनावग्रस्त बना देती है| तनाव सुखपूर्ण जीवन का महान शत्रु है|
   तनाव से मुक्त होना कठिन अवश्य है, परन्तु असम्भव नहीं है| उसके लिये मनुष्य को सर्वप्रथम गलत दृष्टिकोण से सोचना बन्द करना होगा| अक्सर यही होता है कि नकारात्मक चिन्तन तनाव के उत्पादक बन जाते हैं| अवांछनीय अपेक्षायें, अनजाना भय अथवा अत्यधिक कार्यशीलता तनाव के कारण हो सकते हैं| यदि मनुष्य अपने विचारों में विधेयात्मकता ले आवे तो तनाव उड़न-छू हो जायेगा| बीते कल को भूल जाना और आगामी कल को कल पर छोड़ देना तनावमुक्ति का सुगम उपाय है| टहलना, संगीत सुनना, शंख या घण्टेे की मन्दध्वनि श्रवण करना, भगवन्नाम का जप करना, प्रणवमन्त्र का जप करना, शरीर की मालिश करना और सुपाच्य भोजन ग्रहण करना आदि कार्यों से भी तनाव से मुक्ति मिल सकती है|

Saturday, 23 July 2011

प्रेम

    प्रेम आत्मा की परम पावन अनुभूति है| प्रेम परमार्थसाधना है| प्रेम जीवन का अमृत है| इससे चेतना दिव्य तो ऊर्जा ऊर्ध्वमुखी होती है| अपने समान अन्य आत्माओं को स्वीकार कर सबका सन्मान करना, सबके प्रति निश्‍चल और निश्छल वात्सल्य वर्षा करना प्रेम का धर्म है| प्रेम अनुत्तर है| समस्त धर्मों का सार प्रेम ही है| जिसने प्रेम को जाना, उसने अध्यात्म के समस्त सारभूत तत्त्वों को जान लिया| मनुष्य मेंं विद्यमान रहने वाले सारे गुण नदियों की तरह है और प्रेम उन सद्गुणों का पुंजीभूत सागर है| प्रेम मन को उदात्त और शरीर को सशक्त बनाता है| प्रेम के कारण वसुधैव कुटुम्बकम् की साधना फलीभूत होती है| आत्मीयता का विस्तार बिना प्रेम के सम्भव नहीं है|
   जिस घट में मन में प्रेम नहीं होता, वह घट मन मरघट के समान है| प्रेमज्योति अलौकिक है| इसमें अनुताप नहीं होता, यह झंझावातों से बुझता नहीं है| दिव्य चिन्तामणि रत्न की शीतल कान्ति की तरह स्निग्ध, सन्तापहारी और मनमोहक कान्ति प्रेमदीपक की होती है| प्रेम ऐसा दिव्यमन्त्र है कि वह केवल अपने आश्रय को ही नहीं, अपितु अपनी सन्निधि में आने वाले जीवों को भी निर्मल, शीतल और शान्त बना देता है| प्रेम के बिना सच्चिदानन्दत्व की प्राप्ति असम्भव है|
    लोग प्रेम और मोह को एक मानने की भूल करते हैं| मोह जड़ से सम्बन्ध रखता है तो प्रेम चेतन से रिश्ता बनाता है| मोह विभेद कराता है तो प्रेम अभेद में स्थिर करता है| मोह में अन्धत्व होता है तो प्रेम में आत्मवत् सर्वभूतेषु की दिव्यदृष्टि होती है| प्रेम सीमित से असीमित बनने की अनिर्वचनीय साधना है| प्रेम काया है तो मोह छाया है| प्रेम गंगाजल की तरह पवित्र होता है| इसे कहीं भी डालो, पवित्रता का ही निर्माण करता है| उसमें आदर्शों की अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है| प्रेम के साथ विवेकशीलता, सुहृदयता, पवित्रता, सदाशयता और वासनारहितता आदि गुणों का गठजोड़ है| प्रेम के कारण मनुष्य की भाव-संवेदनायें नित्य-निरन्तर उच्चस्तरीय आदर्शों के प्रति समर्पित रहती है| प्रेम उम्र, जाति और वैभवादि की सीमा में आबद्ध नहीं होता| प्रेम सूर्य की तरह है| जिस प्रकार सूर्य उदयकाल में मात्र प्राची को ही प्रकाशित करता है, उसी प्रकार प्रेम उदयकाल में इष्टमित्रों का अनुचरण करता है| जिस प्रकार सूर्य मध्याह्नकाल में सारे संसार को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार प्रेम विश्‍वव्यापी हो जाता है| प्रेम ही मोक्ष का पन्थ है|

Friday, 22 July 2011

अहंकारः एक नशा


         क्रोध का शीर्षासन मान है| व्यक्ति अधिकार चाहता है| जब अधिकार की प्राप्ति नहीं होती, उसी समय क्रोध उत्पन्न होता है और अधिकार की प्राप्ति होने पर अहंकार अर्थात् मान की उत्पत्ति हो जाती है| अपेक्षा की उपेक्षा से क्रोध और अपेक्षा की पूर्णता मान है| जितने अपराध क्रोध से नहीं होते उतने मान से होते पाये गये हैं| रावण ने मान की पूर्ति के लिये सीता को अपने पास रखा और युद्ध किया| अहंकार के कारण रामायण का युद्ध हुआ|
         शराब केवल मुख से सेवन की जाती है, किन्तु अहंकाररूपी शराब को तो शरीर का जर्रा-जर्रा पीता है| शराब के नशे से तो मनुष्य तो नाली में ही गिरता है, किन्तु मानरूपी शराब पीने पर होने वाला नशा नरक, निगोद में ही गिराता है| शराब पीने वाले कहीं-कहीं पाये जाते हैं, किन्तु मानरूपी शराब पीने वाले सर्वत्र पाये जाते हैं| सभी काल में पाये जाते हैं| अतः मान को छोड़ कर कोमलता अपनानी चाहिये|