Monday, 25 July 2011

वासना के अन्त के बिना समस्याओं का अन्त नहीं होता


   पूर्व जन्म में अर्जित कर्मों के प्रभाव के रूप में वासनायें अवचेतन मन में पड़ी रहती है| उसी के कारण मन में वैकारिक-भाव और तन में विकृतिजन्य कर्म उत्पन्न होते हैं| जैसे ग्रामोफोन के रिकार्ड में कटे हुए खॉंचों में से ध्वनियों का उद्गम होता है, उसी प्रकार वासनाओं से नानाविध कामनाओं का उद्गम होता है| वासनासहित मन मनुष्य का दुर्दान्त शत्रु है, क्योंकि वह मनुष्य को कुकर्म करने के लिये प्रेरित करता है| वासनायें कर्मों के द्वारा अभिव्यक्त होती है तथा बुरे व्यक्तित्व का निर्माण करती है| वासनात्मक वृत्तियों मन में फेन की तरह इच्छाओं को जन्म देती है, जिससे मनुष्य का मन भ्रान्त और जीवन अशान्त बन जाता है| वासनायें जब मन पर हावी हो जाती है, तब मनुष्य जीवनसागर में परित्यक्त नौका की भॉंति विपदाओं की उन्नति लहरों में फँस जाता है|
आदर्श ध्येय मनुष्य के लिये सद्व्यवहार करने की प्रेरणा देते हैं| मन स्वभावतः अधोगामी है| अनादिकालीन संस्कारवशात् वह निरन्तर वासनाओं के मायाजाल में उलझा रहता है| जो साधक मलिन मन का खिलौना बन जाता है, उसकी साधना निष्प्रभ हो जाती है| जो मन को विमल विवेक के प्रकाश में रखता है, वही अपनी इष्टसिद्धि कर सकता है| वासनायें मन और बुद्धि की दिव्य जीवन्त शक्तियों को बन्धनबद्ध करती है| इसीलिये वासना से रहित जीव प्रगति नहीं कर सकता| विश्‍व की सारी समस्यायें घनीभूत वासनाओं का ही प्रतिफल है| वासनाओं ने जीवन को समस्याग्रस्त बना दिया है| वासनाओं का अन्त होने पर ही जीवन की समस्याओ का अन्त होगा| वासनाओं का अन्त करने के लिये जप, ध्यान और भक्ति आदि साधनों का अवलम्बन किया जा सकता है| मनुष्य को यह बात सदैव ध्यान रखनी चाहिये कि वासनायें शक्ति का क्षय व व्यक्ति का नाश करती है|
मनुष्य और बुद्धत्व के मध्य वासनाओं की मजबूत दीवार बन चुकी है| उस दीवार को गिराये बिना मनुष्य परमात्मा नहीं हो सकता| मनुष्य अज्ञानता के कारण बाह्य जगत् को संवारना चाहता है| उसी में वह सुन्दरता और सौख्य की कल्पना कर रहा है| उसे यह विवेक होना चाहिये कि संसार तभी सुन्दर प्रतीत होता है, जब अन्तःकरण शुचिर्भूत होता है| प्राप्त होने वाली विलास की सामग्रियों के द्वारा भी मनुष्य तब तक सुखी नहीं हो सकता, जब तक कि मन प्रसन्न नहीं होता| सुख बाहरी जगत् की देन नहीं है, वह तो अन्तस् का पावन संगीत है| मन प्रसन्न है तो सारी वस्तुयें सुखदायक और मन अप्रसन्न हो तो सारी वस्तुयें दुःखदायक होती हैं| बाहर जो कुछ परिलक्षित हो रहा है, वह सब अन्तस् का प्रक्षेपण है| अतः सुखेच्छ भव्य को वासनाओं का विलय करने विषयक प्रयत्न करना चाहिये|

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