आनन्द आत्मा की सहज अवस्था है| वह अध्यात्म की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है| जिस शाश्वत आनन्द का अन्वेषण मनुष्य बाहर कर रहे हैं, वस्तुतः अन्तरंग की असीम पूंजी है| बाहर यदि आनन्द की अनुभूति होती है तो वह भीतर का ही विस्तार है| मनुष्य ज्यों-ज्यों अन्तस् की गहराई में प्रवेश करता है, त्यों-त्यों उसकी तथ्यात्मक अनुभूति और अधिक स्पष्ट और सघन हो जाती है| यदि बाहर में आनन्द की उपलब्धि हो पाती, तो समान सुख-सुविधाओं से सम्पन्न मनुष्यों को समान रूप से आनन्द उपलब्ध होना चाहिये था, परन्तु ऐसा होता नहीं है| कोई नयनरम्य सौन्दर्य के मध्य में रहते हुए भी अतृप्ति का अनुभव करता है और कोई घोर नारकीय परिस्थितियों में रह कर भी स्वर्गीय सुख की प्रतीति करता है|
मनुष्य सुख को और आनन्द को एकार्थक मानने की बड़ी भारी भूल कर रहा है| सूर्य और चन्द्र के प्रकाश में जो भेद है, संस्कृत भाषा के अनुसार वही भेद सुख और आनन्द में है| संस्कृत में ख शब्द का अर्थ इन्द्रिय है| जो इन्द्रिय और मन को अच्छा लगे, शरीर को उत्फुल्लित करे वह सुख है| हर्ष-विषाद से रहित आत्मा की समस्थिति से उत्पन्न भेद आनन्द कहलाता है| सुख जड़ाश्रित है और आनन्द आत्माश्रित है| यह दिव्य चेतनात्मक स्थिति है| उसे उपलब्ध कर ही स्वप्रतिष्ठित हुआ जा सकता है| इसीलिये महर्षिगण आत्मा को सच्चिदानन्द कहते हैं| जिस दिन मनुष्य जगत् की परिधि से आत्मकेन्द्र की ओर यात्रा प्रारम्भ करेगा, उसी दिन उसे आनन्द समुपलब्ध होगा| अपने पूर्ण आनन्द की प्राप्ति जिसे हो गयी है वही भगवान संज्ञा को प्राप्त होता है|
आनन्द आत्मा का शाश्वत गुण है| उसकी परिप्राप्त्यर्थ मनुष्य को जड़ पदार्थों की शरण छोड़ कर आध्यात्मिक मार्ग का अनुसरण करना होगा| इसका प्रथम चरण है कि मनुष्य उपलब्ध साधनों में सन्तोष करने लग जाये| मन ज्यों-ज्यों विषयविरक्त होता चला जायेगा, आत्मा वैसे-वैसे अपनी उस अवस्था में पहुँच सकता है, जिसे सहजानन्द या परमानन्द कहते हैं| यदि सुख-साधनों में मन को अटका के रखा जायेगा तो उससे व्यग्रता बढ़ती चली जायेगी| फलतः दुःख ही प्राप्त होने लगेंगे| जड़ पदार्थ यदि सचमुच ही प्रसन्नता के उद्गम होेते तो वे किसी के लिये विपन्नता के निमित्त नहीं बन पाते| अतः आनन्द को आत्मगुण स्वीकार कर आत्मपरिष्करण करना चाहिये|
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