तनाव मनुष्य के मनोदैहिक तन्त्र की ऐसी अवस्था है, जिसमें वह अपने संवेगों और मांसपेशियों में जकड़न का अनुभव करता है| तनावग्रस्त मनुष्य का मन एवं शरीर दोनों ही सदैव दुःखी रहते हैं| ऐसा व्यक्ति सामान्य-से-सामान्य कार्य को भी सुचारु रूप से पूर्ण नहीं कर पाता| उसमें भय, चिन्ता, बेचैनी, घबराहट आदि के लक्षण विद्यमान रहते हैं| उसके शरीर में कम्पन होने लगता है| वह सदैव थका-थका-सा रहता है| भोजन करना अथवा स्नान करना जैसे दैनिक कार्य भी वह मन लगा कर नहीं कर सकता| तनाव से शरीर की पाचनक्रिया मन्द हो जाती है, रक्तचाप बढ़ जाता है और शरीर की अन्य ग्रन्थिया शिथिल हो जाती हैं| इससे शरीर निष्क्रिय हो जाता है| अजीर्ण और अनिद्रा तनाव के ही परिणाम हैं|
तनाव आकस्मिक नहीं होता| मनुष्य को वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारियों का निर्वहण करना पड़ता है| इस कार्य में कभी अधिक बोझ होता है| प्रतिस्पर्धा के कारण किसी से ईर्ष्या, द्वेष, भय या बेचैनी भी होती है| ये सारे कारण नाड़ीमण्डल पर विपरीत प्रभाव डालते हैं| फलतः मनुष्य तनावग्रस्त हो जाता है| वर्तमान युग में विलासपूर्ण जीवन, शारीरिक कार्यों से परहेज और स्वाद के वशीभूत होकर निष्प्राण खाद्यसामग्री का सेवन दिनचर्या का अविभाज्य अंग बन चुका है| इन कारणों से पाचनतन्त्र शिथिल हो जाता है| पाचनतन्त्र के शिथिल हो जाने पर शरीर का उचित पोषण नहीं हो पाता| अस्वस्थ शरीर में रहने वाला मन भी अस्वस्थ हो जाता है| फिर, जरा-सी भी विपरीत परिस्थिति मनुष्य को तनावग्रस्त बना देती है| तनाव सुखपूर्ण जीवन का महान शत्रु है|
तनाव से मुक्त होना कठिन अवश्य है, परन्तु असम्भव नहीं है| उसके लिये मनुष्य को सर्वप्रथम गलत दृष्टिकोण से सोचना बन्द करना होगा| अक्सर यही होता है कि नकारात्मक चिन्तन तनाव के उत्पादक बन जाते हैं| अवांछनीय अपेक्षायें, अनजाना भय अथवा अत्यधिक कार्यशीलता तनाव के कारण हो सकते हैं| यदि मनुष्य अपने विचारों में विधेयात्मकता ले आवे तो तनाव उड़न-छू हो जायेगा| बीते कल को भूल जाना और आगामी कल को कल पर छोड़ देना तनावमुक्ति का सुगम उपाय है| टहलना, संगीत सुनना, शंख या घण्टेे की मन्दध्वनि श्रवण करना, भगवन्नाम का जप करना, प्रणवमन्त्र का जप करना, शरीर की मालिश करना और सुपाच्य भोजन ग्रहण करना आदि कार्यों से भी तनाव से मुक्ति मिल सकती है|
तनाव आकस्मिक नहीं होता| मनुष्य को वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारियों का निर्वहण करना पड़ता है| इस कार्य में कभी अधिक बोझ होता है| प्रतिस्पर्धा के कारण किसी से ईर्ष्या, द्वेष, भय या बेचैनी भी होती है| ये सारे कारण नाड़ीमण्डल पर विपरीत प्रभाव डालते हैं| फलतः मनुष्य तनावग्रस्त हो जाता है| वर्तमान युग में विलासपूर्ण जीवन, शारीरिक कार्यों से परहेज और स्वाद के वशीभूत होकर निष्प्राण खाद्यसामग्री का सेवन दिनचर्या का अविभाज्य अंग बन चुका है| इन कारणों से पाचनतन्त्र शिथिल हो जाता है| पाचनतन्त्र के शिथिल हो जाने पर शरीर का उचित पोषण नहीं हो पाता| अस्वस्थ शरीर में रहने वाला मन भी अस्वस्थ हो जाता है| फिर, जरा-सी भी विपरीत परिस्थिति मनुष्य को तनावग्रस्त बना देती है| तनाव सुखपूर्ण जीवन का महान शत्रु है|
तनाव से मुक्त होना कठिन अवश्य है, परन्तु असम्भव नहीं है| उसके लिये मनुष्य को सर्वप्रथम गलत दृष्टिकोण से सोचना बन्द करना होगा| अक्सर यही होता है कि नकारात्मक चिन्तन तनाव के उत्पादक बन जाते हैं| अवांछनीय अपेक्षायें, अनजाना भय अथवा अत्यधिक कार्यशीलता तनाव के कारण हो सकते हैं| यदि मनुष्य अपने विचारों में विधेयात्मकता ले आवे तो तनाव उड़न-छू हो जायेगा| बीते कल को भूल जाना और आगामी कल को कल पर छोड़ देना तनावमुक्ति का सुगम उपाय है| टहलना, संगीत सुनना, शंख या घण्टेे की मन्दध्वनि श्रवण करना, भगवन्नाम का जप करना, प्रणवमन्त्र का जप करना, शरीर की मालिश करना और सुपाच्य भोजन ग्रहण करना आदि कार्यों से भी तनाव से मुक्ति मिल सकती है|
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