Saturday, 27 August 2011

तप आत्मसाक्षात्कार का मार्ग

मनुष्य की बाह्यप्रकृति राग-द्वेषात्मक प्रवृत्तियों को उद्भूत करती है| जब जीवन इन दूषित वृत्तियों में सिकुड़-सिमट रह जाता है, तब जीवन में वसन्त नहीं, पतझड़ आविर्भूत होता है| इससे जीवनोर्जा क्षरण को प्राप्त होती है और मनुष्य क्लान्त हो जाता है| जिस प्रकार अधोगमन स्वभाव के धारक जल को ऊर्ध्वगामी बनाने के लिये विद्युत्-यन्त्र की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार अधोगमन करने वाले मन को ऊर्ध्वगामी बनाने के लिये पुरुषार्थ-यन्त्र की आवश्यकता होती है| उसी पुरुषार्थ-यन्त्र को तप कहते हैं| तपःसाधना जीवन को नम्रता, आस्था, वत्सलता, सहनशीलता, क्षमादिक उदात्त भावनाओं से अभिसिंचित करती है| वासनाओं में वृत्ति है, कामनाओं का विकास है और सुख का आभास है| तप में तृप्ति है तथा आत्मगुणों का सुवास है| वासनायें दुःख का प्रतिनिधित्व करती हैं तो तप सौख्य का नेतृत्व करता है| जो इन्द्रिय और मन का निग्रह करता है, इच्छाओं का निरोध करता है, वही तप कर सकता है|
      सांसारिक भोगेच्छाओं का निरोध करने को तप कहते हैं| जब मन के सागर से संसार, शरीर और भोगों के प्रति इच्छा की लहरें उछलना बन्द हो जाती हैं, तब तप प्रकट होता है| तप आत्मसाक्षात्कार का मार्ग है| जिसके द्वारा आत्मविजय की प्राप्ति होती है, उसे तप कहते हैं| अहिंसा और संयम से अभिषिक्त आत्मा ही तप के योग्य होता है| कर्मों का क्षय करने के लिये जो तपा जाता है, उसे तप कहते हैं| जो इन्द्रिय और शरीर को सन्ताप देती हैं, उन क्रियाओं के सम्यक् अनुष्ठान को तप कहते हैं| दृष्टफल से निरपेक्ष होकर स्वभाव की प्राप्ति के लिये किये जाने वाले सत्प्रयत्न को तप कहते हैं अथवा वीतरागता से अनुप्राणित समस्त क्रियानुष्ठान को तप कहते हैं|

Wednesday, 24 August 2011

अर्थ-संयम जीवन में सुख प्रदान करता है

अर्थ अनर्थ का मूल है - इस उक्ति को कौन भूल सकता है ? प्रदर्शन, व्यसन और विलासिता में व्यय होने वाला धन अनेक प्रकार के सामाजिक अपराधों को जन्म देता है| इससे वर्गविषमता की वृद्धि होती है, घृणा, द्वेष आदि भाव प्रकृष्टता को प्राप्त होते हैं, उत्पादन घटता है, अकर्मण्यता की वृद्धि होती है| ऐसी दशा में अपनी मनोभिलाषा की पूर्ति के लिये मनुष्य अनैतिक आचरण में प्रवृत्त हो जाता है| रिश्‍वतखोरी और मिलावट जैसी समस्याओं का कारण अर्थविषयक असंयम ही है| फिजूलखर्ची और दुर्व्यसनों में फँसा हुआ व्यक्ति अपना ही नहीं, अपितु परिवार का भी नुकसान करता है| उसका परिवार आर्थिकतंगी से झूंझते हुए अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण नहीं कर पाता| अभाव से लड़ते-झगड़ते उनका व्यक्तित्व अविकसित रह जाता है|
      अर्थ-असंयम पारिवारिक अशान्ति का मूल कारण है| अतः अर्थसंयम के निर्देश से न्यायपूर्वक अर्थोपार्जन करके हितव्ययिता और मितव्ययिता का समादर करना चाहिये| जिस प्रकार योग्य समय में और योग्य परिमाण में ग्रहण किया गया आहार शरीर को बलशाली और दीर्घजीवी रखता है, उसी प्रकार योग्य समय में, योग्य स्थान में और योग्य परिमाण में किया गया न्यायोपार्जित धन का व्यय मनुष्य के सम्मान को सम्पुष्ट करता है| धन जीवननिर्वाह का संसाधन है| अतः उसका संयम निश्‍चित रूप से जीवन में सुख प्रदान कर सकता है|

Tuesday, 23 August 2011

भक्ति और ज्ञान से जीवन का उत्थान होता है

आराध्य के प्रति आत्मपरिणति की तादात्म्यानुभूति भक्ति है और वस्तु के शाश्‍वत-अशाश्‍वत स्वभाव को जानने का माध्यम ज्ञान है| जीवन की चैतन्य चेतनता इन्हीं के मध्य प्रवाहित होती है| ये दो श्रेष्ठ धारायें हैं| भक्ति संवेदना से युक्त भावधारा है| इन दोनों का समुचितरूप से विकास हुए बिना जीवन में परमदशा का पुष्प पुष्पित नहीं होता| ये दोनों प्रकाश के दिव्य ज्योतिस्तम्भ हैं| इन्हीं के आलोक में मनुष्य अपनी गुणसम्पदा का अवलोकन कर सकते हैं| ये परम अमृत की तरह हैं, क्योंकि इन्हीं के द्वारा आत्मा अमर होता है| आत्मा की पूर्णता और गुणों का समग्र उत्थान इन्हीं दोनों की सन्निधि में होता है|
      अकेली भक्ति मूक होती है और अकेला ज्ञान वाचाल होता है| इन दोनों के मिले बिना व्यक्तित्व में अपूर्णता रह जाती है| ये दोनों जिस पल एकाकार हो जाते हैं, उसी पल जीवन में क्रान्ति घटित होती है| भक्ति और ज्ञान जीवन को परमोपलब्धि प्रदायक है| जीवनरूपी महासंग्राम में विजय प्राप्त करने के लिये अथवा मोक्ष को दिलाने वाले कला-कौशल को प्राप्त करने के लिये इस युगल की अनिवार्य आवश्यकता है| ज्ञान शास्त्र के समान विकारच्छेदक है| उससे कर्मों की जड़ पर वार तो किया जा सकता है, परन्तु साधक के पास भक्तिरूपी ढाल न हो तो वह अपनी सुरक्षा किस प्रकार कर सकेगा ? ज्ञान जब तर्कों की शुष्क रेत मन के आँगन में बिखराने का प्रयत्न करता है, तब भक्ति समीर बन कर उसे उड़ा ले जाती है| अतः भक्ति और ज्ञान दोनों ही उपादेय हैं|
      भक्ति और ज्ञान अर्थात् भावना और विचारणा की दो पतवारों से ही जीवन-नौका भवसागर से पार जा सकती है| ये आध्यात्मिक जीवनरूपी गाड़ी के दो ऐसे चक्र हैं, जो इष्टस्थान तक पहुँचने के लिये वाहक बनते हैं| ये सरिता के दो किनारों की भॉंति है, क्योंकि इनकी मर्यादा में रहने वाली आध्यात्मिक सरिता परमधामरूपी सागर तक जा सकती है| भक्ति और ज्ञान ये ऐसी साधना है, जिससे सिद्धि और समाधि का जन्म होता है| ये दोनों विचारों एवं कर्मों को श्रेष्ठत्व प्रदान करते हैं| निष्काम अवस्था इनकी अनुपस्थिति में प्रक नहीं हो सकती| मनुष्य के अन्तःकरण की ये सुगन्ध हैं| यही कारण है कि जीवन की सार्थकता और समग्रता भक्ति और ज्ञान के द्वारा ही हो सकती है|

Sunday, 21 August 2011

लक्ष्यपूर्ति ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिये

मनुष्य जैसा लक्ष्य बनाता है, उसी के अनुरूप जीवन की दशा एवं दिशा की संयोजना होती है| यूँ तो मनुष्य पर्याय ही श्रेष्ठता का पर्याय है, फिर भी लक्ष्य निर्धारण कर जीवन को नयी दिशा प्रदान करने वाली पर्याय और अधिक श्रेष्ठ बनती है| लक्ष्य चाहे ईश्‍वर-विषयक हो या ऐश्‍वर्य-विषयक, उसको एकनिष्ठ होकर पूर्ण करना चाहिये| लक्ष्य की दिशा में अपनी समस्त शक्ति और अविकल प्रतिभा का समर्पण होना चाहिये| जिसे प्राप्त करने के लिये मन मचल उठता हो, जिस कार्य की अभिरुचि हो और जो सार्थक व हितकारी हो वही लक्ष्य की श्रेणि में आता है| लक्ष्य का निर्धारण अनिच्छापूर्वक नहीं किया जाता, क्योंकि उसमें उमंग और उत्साह नहीं होने से लक्ष्यसन्धान नहीं हो सकता|
      लक्ष्य-निर्धारण करने के बाद सुदीर्घ प्रयत्न करने पड़ते हैं| जब कोई कार्य किया जाता है तो सफलता या असफलता मिलती है| साधक को सफलता मिलने पर हर्षान्माद और असफलता मिलने पर निराशा में नहीं फँसना चाहिये| निराशा और उदासीनता अकर्मण्य व्यक्ति के सहचर होते हैं, कर्मठ व्यक्ति के नहीं| कर्मठ व्यक्ति अनवरत उद्दाम उमंग और नूतन आशा का शक्तिकेन्द्र होते हैं| लक्ष्य चाहे जितना भी कठिन हो, दृढ़ संकल्प, अटल विश्‍वास और प्रबल पुरुषार्थ से उसे सहज सरल बनाया जा सकता है| जहॉं पर व्यामोह और दुर्बलता का नामोनिशान नहीं होता है, जो लगनशील योद्धा बन कर अविराम प्रयत्न करने की क्षमता दिखाता है, उसे अपने जीवन में अभीष्टप्राप्ति अवश्य होती है| सहायक खोजने की भी आवश्यकता नहीं है, स्वयं का विश्‍वास अटूट हो तो एकाकी भी लक्ष्यप्राप्ति कर सकता है|
      अब तक संसार में अनेक आत्माओं के चरण सफलता ने चूमे है| उनके जीवन का अध्ययन किया जाये तो यह स्पष्ट होता है कि उनकी महानता के पीछे लक्ष्यनिष्ठता है| उनका सम्पूर्ण जीवन लक्ष्य के इर्दगिर्द घूमता हुआ नजर आयेगा| असफलता उन्हें हरा न सकी और कठिनाइयॉं उनके हौसलों को पस्त न कर सकी| असीम धैर्य की पूंजी साथ लेकर वे अपने गन्तव्य की ओर बढ़ते ही चले गये| वस्तुतः जीवन में एक विशिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अटल संकल्प, आत्मविश्‍वास, उद्दाम साहस और असीम धैर्य की आवश्यकता हुआ करती है| लक्ष्य के प्रति निज का सर्वस्व उत्सर्ग होना आवश्यक है| लक्ष्यनिष्ठा का सुनिश्‍चित परिणाम निकलता ही है| लक्ष्यनिष्ठ जीवन ही श्रेष्ठ एवं वरेण्य है|

Saturday, 20 August 2011

चिन्तन में विधेयात्मकता होनी चाहिये

मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन पर उसके चिन्तन का गहरा प्रभाव पड़ता है| चिन्तन के द्वारा ही मनुष्य के लक्ष्य और भविष्य का निर्धारण होता है| चिन्तन की कला को जो जान लेता है, वही सफलता के सोपान चढ़ सकता है| संसार में जितने भी नकारात्मक विचारधारा वाले मनुष्य हैं, वे अपने आपको कायरता व निराशा के भँवर में फँसा कर असफलता का दामन थाम लेते हैं| नकारात्मक विचार आत्मशक्ति की विस्मृति से उत्पन्न होते हैं| उनकी सदवस्था में मनुष्य अपनी पात्रताओं को और सामर्थ्य को पहचान नहीं पाता| गरीबी, दीनता, कायरता और अनेक प्रकार की व्याधियॉं नकारात्मक विचारों के ही परिणाम हैं| इस स्थिति में मनुष्य समयोचित निर्णय नहीं कर पाता है, नतीजन उसे लाभ की जगह हानि ही उठानी पड़ती है|
      मनुष्य का स्वभाव बड़ा ही विचित्र है| मनुष्य की जितनी आस्था बुराई में है, उतनी सघनता अच्छे काम में नहीं होती|  यही कारण है कि मनुष्य अच्छे कार्य को करते समय प्राप्त हुई प्रारम्भिक असफलताओं से अत्यधिक निराश हो जाते हैं| उतनी निराशा उन्हें बुरे कार्य करते समय प्राप्त होने वाली असफलताओं से नहीं होती है| उतनी ही आस्था अच्छाई के प्रति उत्पन्न करनी हो तो विचारों में विधेयात्मकता का संचरण परमावश्यक है| ऐसे चिन्तन से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा रचनाधर्मिता से समन्वित होती है| ऐसे व्यक्ति को कभी निरुत्साही नहीं देखा जा सकता| उसके उन्नति के पथ का एक द्वार बन्द होने तक तो वह अन्य द्वार अपने पुरुषार्थ के बल पर खोल लेता है| साहस और विश्‍वास ये उसके दो सहचर होते हैं, इसीलिये सफलता उसके चरण चूमती है|
      मनुष्य के विचार उसके व्यक्तित्व के दर्पण होते हैं| वह जैसे विचार मन में रखता है, वैसे ही भाव उसके चेहरे पर उभर आते हैं| अशुभ विचार अथवा नकारात्मक विचार करने वाले मनुष्यों के चेहरे पर भय, निराशा और कुण्ठा परिलक्षित होती है| इससे विपरीत सकारात्मक विचारों के धारक लोग स्वस्थ, उल्लसित और आध्यात्मिक विचारों से परिपूर्ण रहते हैं| जिसके चित्त में एकाग्रता, दृढ़ता और निर्मलता होती है, वही मनुष्य अपने चिन्तन में शुभभावों को ला सकता है| जिसका चित्त ही रुग्न हो, उसका चरित्र निर्मल कैसे हो सकता है ? अतः विचारों की शुद्धता के लिये निषेधात्मकता को दूर करना चाहिये| सकारात्मक विचार आत्मशुद्धि में सहायक होते हैं|

Friday, 19 August 2011

संस्कारों से होता है व्यक्तित्व का निर्माण

वर्तमान में समाज एवं युग की अन्तहीन समस्याओं का मूल कारण संस्कारजनित चरित्र-निर्माण के महान कार्यों की उपेक्षा है| आज का मानव क्षणिक सुखोपभोग के लिये अथवा निजी क्षुद्र स्वार्थ की पूर्ति के लिये जीवन के इस सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य को विस्मृत कर गया है| आज मनुष्य ने भौतिक प्रगति के चाहे जितने कीर्तिमान स्थापित कर लिये हो, परन्तु वह आन्तरिक अवनति, पतन और पराभव की पीड़ा से सन्त्रस्त है| यही कारण है कि मनुष्य का जीवन अशान्ति और गहन विषाद का पर्यायवाची बन गया है| संस्कार-विहीन मनुष्य में समाधान के ढेरों प्रयत्न जीवन की खाई-खन्दकों को पाटने में असफल हो रहे हैं| तड़क-भड़क की चकाचौंध में चरित्रनिर्माण करने वाली संस्कारशाला का महत्त्व नगण्य हो गया है|
      संस्कार अनेक गुणरूपी फूलों का गुलदस्ता है| सदाचरण, विश्‍वसनीयता, आदरभाव, स्वविवेक, विनम्रता, दिव्यदृष्टि, आज्ञापालन, वचनबद्धता, निर्णायकशक्ति और दया आदि उच्चमनोवृत्ति के निर्माता सभी गुण इस गुलदस्ते के भिन्न-भिन्न पुष्प हैं| सुव्यवस्थित पद्धति से जीवन जीना अथवा अपने जीवन को गुणों से सुवासित करना ही संस्कार करना है| संस्कार नियमों में मर्यादित जीवन को सुव्यवस्थित कर जीने की कला को सिखाता है| अच्छे व्यक्तित्व का निर्माण संस्कारों के पावन धरातल पर आध्यात्मिक एवं नैतिक वातावरण की सन्निधि में हेाता है| व्यक्तित्व ही व्यक्ति का वास्तविक परिचय है| समृद्ध एवं श्रेष्ठ व्यक्तित्व ही व्यक्ति की शाश्‍वत पूंजी है| इसके अभाव में व्यक्ति का व्यवहारिक धरातल नितान्त दरिद्र और तुच्छ होता है| संस्कार आत्मा का आभूषण है|
      संस्कार ऐसी सम्पदा है जो दैनिक जीवन में आने वाले छोटे-छोटे सूत्रों के माध्यम से जमा होती है| जिसके पास यह पूंजी जितनी अधिक मात्रा में एकत्र होती है, वह उतना ही व्यवहारकुशल और सफल व्यक्तित्व का धनी होता है| संस्कार जीवन से भी अधिक कीमती है, क्योंकि उसी के द्वारा मनुष्य जीवन के मूल्यों को प्राप्त करता है| संस्कारों के अभाव में जब उच्च-आदर्श और मूल्य के अनुरूप जीवन को संगठित करने में मनुष्य विफल हो जाता है, तब वह बाह्य में भी समाज  का समायोजन करने में भी विफल हो जाता है| माता-पिता, गुरुजन, अनुभव और संगति ये चार संस्कार-निर्माण के आधारस्तम्भ हैं| संस्कारों के कारण ही मनुष्य इन्द्रिय और मनोवृत्तियों पर अंकुश लगा कर सफलता के हिमशिखर का स्पर्श करता है|

Thursday, 18 August 2011

अन्दर से सुन्दर बनें

संसार का प्रत्येक जीव सुन्दरता का अभिलाषी है| अन्तर्मन को उकेेरे बिना वास्तविक सौन्दर्य के दर्शन हो नहीं पाते| सुन्दरता के लिये रूप की ही नहीं, गुणों की भी आवश्यकता होती है| वास्तविक सौन्दर्य में देवत्व और दिव्यत्व का भाव जुड़ा हुआ होता है| निःसन्देह वही सौन्दर्य समीचीन है, जिसमें मंगलता हो और कल्याणकारित्व हो| जीवन में आत्मप्रबोध, चरित्र,चिन्तन एवं व्यवहार को परिष्कृत करके ही कल्याणकारी सौन्दर्य के श्रीमुख का दर्शन हो सकता है| जब जीवन के हर क्षण में ऐसे सौन्दर्य का अनुभव होने लगता है, तब जीवन ही सौन्दर्य का पर्यायवाची बन जाता है| वस्तुतः शरीर को स्वस्थ एवं नीरोग रख कर आत्मान्वेषण करने पर ही सौन्दर्य प्राप्ति हो सकती है|
      मन का सौन्दर्य उसके दिव्य-विचारों में सन्निहित है| श्रेष्ठ और सद्विचारों से मन का सौन्दर्य निखरता है| मनरूपी दर्पण पर जब भी कुविचारों की धूल जमती है, उसका अकृत्रिम सौन्दर्य नष्ट हो जाता है| ऐसा मन विकृत ही नहीं, कुरूप भी हो जाता है| यह समस्त मनोविकारों का जनक है| यदि मन कुमार्गगामी होता है तो शरीर भी सत्कर्मों से विरत हो जाता है, क्योंकि शरीर का नियन्ता व अनुशास्ता मन ही होता है| जिस पुरुष का मन विद्रूप हो, उसका शरीर चाहे कितना भी मनोहर व नयनरम्य क्यों न हो - सुन्दरता की श्रेणि में नहीं आ सकता| चर्म की सुन्दरता व असुन्दरता का मूल्य ही नहीं होता| इसीलिये मन के सौन्दर्य को उभारा जाना चाहिये| स्वाध्याय, ध्यान अथवा उपासनादिक साधनों से मन को सौन्दर्यान्वित किया जा सकता है| मन के सुन्दर होने पर व्यक्तित्व भी आकर्षक हो जाता है|
      सेवा और सहकार के माध्यम से भावनाओं में सौन्दर्य की अभिवृद्धि की जा सकती है| जैसे मन विचारों का नायक है, उसी प्रकार हृदय भावनाओं का नायक है| भावनाओं का परिष्करण ही हृदय का सौन्दर्य है| वैचारिक सौन्दर्य अत्यन्त प्रखर और प्रबल होता है, उसी प्रकार भावनाओं का सौन्दर्य चन्द्रिकाओं के समान शीतल होता है| इन्हीं के प्रभाव से हृदय पीड़ित की पीड़ा को देख कर सजल हो उठता है| दूसरों को कष्ट में पड़ा हुआ देख कर जिसका हृदय मोम की तरह पिघल उठता है, वही भावनिक सौन्दर्य को प्राप्त करता है| अहंकार के आवरण को सेवा ही हटा सकती है| जो आत्मिक सौन्दर्य का रसास्वाद लेना चाहते हैं उन्हें सेवा का व्रत अवश्य स्वीकार करना चाहिये|

Wednesday, 17 August 2011

मौन के बिना आत्मदर्शन नहीं होता

प्रत्येक मनुष्य भौतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रगति करना चाहता है| प्रगति के लिये शक्ति की आवश्यकता होती है| शक्ति का संचयन और संवर्द्धन मौन के द्वारा होता है| इसीलिये मौन प्रगति का बीज है| मौन का अर्थ है अपनी ऊर्जा के बिखराव को समेटना| अपनी अन्तरंगशक्ति को संग्रहित करके उच्चस्तरीय पुरुषार्थ में अर्थात् आत्माभ्युदय के श्रेष्ठ मार्ग में लगाने के लिये मौन परमावश्यक है| जिस प्रकार शरीर को शक्तिमान और बलवान बनाये रखने के लिये ब्रह्मचर्य की साधना की जाती है, उसी प्रकार वाणी को प्रभावशाली बनाये रखने के लिये मौन की साधना की जाती है| अधिक बोलने से मन और मस्तिष्क दोनों भी थक जाते हैं| अतः उन दोनों की स्फूर्ति के लिये मौन रामबाण औषधि है|
     सारे संसार का इतिहास उठा कर देख लो, संसार में जितने भी अनर्थ हुए हैं या युद्ध हुए हैं - उनके पीछे सबसे बड़ा कारण जिह्वा का लपलपाना ही है| द्रौपदी यदि कटुवचन नहीं बोलती तो कुरुक्षेत्र में खून की नदियॉं बही नहीं होती| राजा दशरथ कैकेयी को वचन नहीं देते तो राम के राजतिलक में कोई विघ्न उपस्थित नहीं हुआ होता| रावण यदि विभीषण के साथ कटुवचनों का प्रयोग नहीं करता तो युद्धकाल में विभीषण राम के पक्ष में न लड़ता| आज भी पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय क्षेत्रों में जितने संघर्ष दिखाई दे रहे हैं, उनमें बोलना ही मुख्य कारण है| कलह के प्रसंग पर मौन शान्ति का उपाय है| विपत्ति के समय मौन धैर्यप्रदाता है| हजारों भाषणों का जो प्रभाव नहीं पड़ता, वह मौन का पड़ता है| इसीलिये आध्यात्मिक दर्शन में मौन को सर्वाधिक और सर्वप्रथम महत्त्व दिया गया है|
      मौन रहने से मन को ताजगी मिलती है, विचारों में स्फूर्ति आती है, वाणी में जोश आता है और क्रियाओं में उत्साह का संचरण होता है| मौन मनुष्य की लोकप्रियता का एक अचूक साधन है| मौन रहने वाला जीव कलह से बचता है| मौन सभी तरह के मनुष्यों का सुरक्षाकवच है| ज्ञानी जीव जब तक मौन रखता है, तब तक वह अपने सत्यव्रत की रक्षा कर सकता है और अपनी लोकप्रियता बनाये रख सकता है| मूर्ख जीव जब तक मौन रखता है, तब तक वह लोगों द्वारा समझदार समझा जाता है| मौन इन्द्रियसंयम का प्रधान कारण है| मौन साधक को प्रगतिशील बनाता है| मौन धारण करके ही मनुष्य अपने अन्तरंग की निधि के दर्शन प्राप्त कर सकता है| मौन में उच्चकोटि की शक्ति है|

Tuesday, 16 August 2011

निन्दक नहीं, प्रशंसक बनिये

गुणवानों की प्रशंसा करना एक दैवी गुण है| जिनके हृदय में दूसरों के प्रति प्रेम, सम्मान और आत्मीयता के भाव होते हैं, जिन्हें दूसरों के जीवन-व्यवहार तथा सत्कार्यों को देख कर प्रसन्नता का अनुभव होता है, जिनका मन पवित्र और विशाल होता है सच्चे अर्थों में वे ही लोग औरों की प्रशंसा कर सकते हैं| प्रशंसा करने से एक ओर जहॉं मानव गुणग्राही बनता है, वहीं दूसरी ओर समाज में अच्छे कार्यों को सम्पन्न करने वाले कार्यकर्त्ताओं को समर्थन, उत्साह और सम्बल प्राप्त होता है| इससे सत्कार्यों का असीम वेग भी बढ़ जाता है|
      समाज के अधिकतर व्यक्ति अपना अमूल्य समय दूसरों की निन्दा करने में अथवा दूसरों के अवगुणों को खोजने में व्यतीत कर देते हैं| ऐसा करने से वह जिस समय में दूसरों के जीवन से कुछ प्रेरणा लेकर सीख सकता था, गुणवानों की प्रशंसा करके पुण्योपार्जन कर सकता था, उस समय को व्यर्थ में खोकर कर्मबन्ध कर लेता है| निन्दा के स्वभाव से स्वयं के जीवन में गुणों की कमी और दुर्गुणों का प्रवेश प्रारम्भ हो जाता है| यही कारण है कि निन्दक अपने आपको सदैव अशान्त, व्याकुल और अकेला पाता है| इससे विपरीत गुणग्राही व्यक्ति उत्साह, प्रमोद और शान्ति से परिपूर्ण होकर एक समय में अनेक लक्ष्यों की सिद्धि कर लेता है|
      दूसरों की प्रशंसा लोकप्रिय बनने का प्रथम सोपान है| इससे चिन्तन की कोटि उच्च होती है| मनुष्य जैसा देखता है, वैसा करता है और जैसा करता है, उसी प्रकार बन जाता है| अतः पर के अवगुण देखने की अपेक्षा गुणों को देखना ही श्रेयस्कर है| प्रशंसा करने वाले मनुष्य के मन में उत्साह होता है, वह गुणों का अर्जन करने के लिये प्रतिपल प्रयत्नशील होता है| उसके मन में वात्सल्य, आत्मीयता और प्रेम की भावनायें तीव्रता से उदित होती रहती है| वह स्वयं तो शुद्ध भावों में रमण करता है और औरों के लिये भी आशा के दीप जलाता है| निन्दा करने वाला व्यक्ति दूसरों का तो कुछ भी नहीं बिगाड़ता, किन्तु स्वयं के समय, बुद्धिमत्ता, व्यवहार और जीवन की हानि कर लेता है| प्रशंसा मानव के मन और मस्तिष्क को विकसित करती है तो निन्दा उन्हें विकृत करती है| प्रशंसा प्रेरणा की प्रणेता है तो परनिन्दा पतन की पगडण्डी| अपने जीवन को समुन्नत बनाने के इच्छुक व्यक्ति को परनिन्दक नहीं अपितु प्रशंसक बनना चाहिये|

Monday, 15 August 2011

व्यवहारकुशलता से सफलतायें मिलती है

सद्व्यवहाररूपी पुष्प चारित्र की लता पर खिलता है| उसका परिमल दिग्-दिगन्त में व्याप्त होकर चिन्तन का वातावरण सुरम्य बनाता है| इस पुष्प को पल्लवित करने के लिये सजल भावनारूपी नीर आवश्यक होता है| मनुष्य सामाजिक परिवेश में जीवित रहता है| रिश्तों की सौहार्द्रता के बिना सामाजिकता स्थिर नहीं रह सकती| रिश्तों की सौहार्द्रता के लिये सद्व्यवहार अति-आवश्यक है| मनुष्य के ज्ञान-विज्ञान, आचरण या आध्यात्मिक पात्रता का मूल्य व्यवहार-कुशलता के सद्भाव में ही सम्भव है| जो मनुष्य व्यवहारशिष्ट नहीं होता, उसके सारे गुण अंकरहित बिन्दियों की तरह निरर्थक हो जाते हैं| बाह्य व्यवहार आन्तरिक चिन्तन एवं भावनाओं के गर्भ से प्रसूत होने से अन्तरंग का दर्पण होता है|
      अशिष्ट व्यवहार अनगढ़ित रूखे व्यक्तित्व का परिचायक है| अशिष्ट व्यक्ति कितनी ही प्रतिभाओं से सम्पन्न क्यों न हो, वह लोकसम्मान को अर्जित नहीं कर सकता| उसकी अव्यावहारिकता लोगों के लिये विकर्षण का कारण बनती है| लोगों के लिये तो दूर, उसके परिजन भी उसके साथ पराये जैसा बर्ताव करते हैं| अपनी उद्धतता एवं उद्दण्डता के कारण वह अपने और औरों के लिये घातक होता है| वह अग्नि के समान ही स्व-परदाहक होता है| अभद्र और अशिष्ट व्यवहार करने वाला सभी का तिरस्कार पाते रहने से और अधिक उग्र और विनाशशील हो जाता है| फलतः उसकी रचनाधर्मिता नष्ट हो जाती है| अतः अशिष्ट व्यवहार करना आत्महत्या करने के समान है|
      व्यवहार की शालीनता पारसमणि के समान इच्छित फलप्रदात्री है| यह व्यक्तित्व का सहज वशीकरण मन्त्र है| यह ऐसा गुप्तरहस्य है, जिसे हृदयंगम करने वाला मनुष्य सफलता और महानता का वरण करता है| व्यवहार की शालीनता न केवल औरों को प्रसन्न करती है, अपितु स्वयं को भी आनन्दित करती है| इससे अन्तरंग परिष्कृत होता है| जब अन्तरंग की भावना प्रस्फुटित होती है, तब हृदय मोम के समान कोमल हो जाता है| इससे वाणी में अमृत झरने लगता है| ऐसी संवेदनशीलता दूसरों के हृदय पर सीधा असर करती है| फलतः वातावरण में सौम्यता आती है| इससे प्रतिभाओं को उभरने का अवसर मिलता है और सफलता प्राप्त होने की नियामकता बन जाती है|

Saturday, 13 August 2011

रक्षाबन्धन

रक्षाबन्धनपर्व को वात्सलपर्व अथवा सलौनापर्व कहते हैं| इस पर्व के नाम में आगत बन्धन शब्द संकल्प का सूचक है| रक्षा का संकल्प करना ही रक्षाबन्धन है| रक्षा किसकी? यह प्रश्‍न विचारणीय है| अनादिकाल से संसार में परिभ्रमण करने वाले आत्मा के स्वभवा की रक्षा, सम्प्रदायों की अग्नि में झुलस रहे धर्म की रक्षा, परिवार राष्ट्र-देश और परिवेश की रक्षा इसी प्रकार समस्त कर्त्तव्य कर्मों की रक्षा आवश्यक है|
      संस्कृत, संस्कृति और संस्कार हमारे देश के आस्थास्तम्भ थे, जो शनैः शनैः जर्जरित हो रहे हैं| आज उनकी रक्षा का संकल्प आवश्यक है, क्योंकि देश होगा तो धर्म होगा तथा धर्म होगा तो मनुष्य के जीवन में सुख-शान्ति होगी| मुनिप्रवर विष्णुकुमार जी ने अपना सर्वस्व लुटा कर आज ही के दिन सात सौ मुनियों की रक्षा की थी| आज आर्यावर्त्त की आर्यसंस्कृति किसी विष्णुकुमार मुनिराज की राह तृषित नजरों से निहार रही है| क्या हम अपने संकल्पशक्ति को दृढ़ बना कर संस्कृतिरक्षा के लिये कटिबद्ध हो सकते हैं? क्या अमर्यादा के पंक में आकण्ठ डूबे इस सभ्यता को त्राण दिलाने का संकल्प किया जा सकता है? जिस देश में नारी पूजी जाती थी, उसी देश में आज मॉं-बहनों के आँचल तार-तार किये जा रहे हैं| क्या इससे उन्हें छुटकारा दिलाया जा सकता है? ऐसे कई यक्षप्रश्‍न हैं| इनके समाधान खोजने का संकल्पदिवस ही रक्षाबन्धन है| अतः जब हम कर्त्तव्यरक्षा के लिये तत्पर होंगे तभी पर्व मनाना सार्थक होगा|

Friday, 12 August 2011

मनुष्यजीवन


     मनुष्यजीवन मुक्तिनगर में प्रविष्ट होने का मुख्य प्रवेशद्वार है| इसको प्राप्त करने के लिये सुरेन्द्र, असुरेन्द्र और अहमिन्द्र तक तरसते हैं| इसी महाभवन में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूपी महाराजा रहते हैं| मोहरूपी दानव ने आत्मा की अगाध गुणराशि का अपहरण कर रखा है, उससे युद्ध कर विजय प्राप्त करने के लिये मनुष्यजीवन से सुन्दर और कोई कुरुक्षेत्र नहीं है| इस जीवन की महिमा अपरम्पार है| मनुष्यजीवन सात राजु प्रमाण ऊँची शिवपुरी को मात्र एक समय में पहुँचाने वाला श्रेष्ठ वायुयान है|
    मनुष्यजीवन अज्ञानरूपी तम को क्षणभर में ही ध्वस्त करने वाला तमहर सहस्रकिरण है| मनुष्यजीवन केवलज्ञानरूपी ज्योति का प्रकाश फैलाने वाला सर्वश्रेष्ठ ऊर्जाघर है| मनुष्यजीवन आधि, व्याधि और उपाधि इन त्रिविध अग्नि में दग्ध होने वाली आत्माओं को अपने शीतल और स्निग्ध जल से शीतलता प्रदान करने वाला मधुर जलयुक्त झरना है| मनुष्यजीवन जन्म, जरा और मरणरूपी रोगत्रय का सफलतापूर्वक निराकरण करने वाला महान औषधालय है| यह जीवाजीवादि सप्त तत्त्व तथा बन्ध और मोक्षमार्ग का बोध कराने वाला महाविद्यालय है|
     यही एक ऐसा उत्तम बन्दरगाह है जहॉं धर्मरूपी वस्तु का क्रय-विक्रय बड़े पैमाने पर होता है| यही अगाध शान्ति प्रदान करने वाला शान्ति निकेतन है| मनुष्यजीवन में ही शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक निधियों की प्राप्ति की जा सकती हैं| जिन्हें अपने आत्मतत्त्व से अगाध प्रेम है और जो परम सौख्य को प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें इस जीवन का सार्थक उपयोग करना चाहिये|

Thursday, 11 August 2011

व्रत आत्मोत्थान का राजमार्ग है


व्रत एक दुर्द्धर्ष संकल्प है| उद्देश्ययुक्त जीवन के लिये प्रबल विश्‍वास और अगाध निष्ठा का नाम व्रत है| परविरति और आत्मरति के लिये किया जाने वाला अनुष्ठान व्रत संज्ञा को प्राप्त होता है| व्रत एकप्रकार का आत्मानुशासन है| शरीर, इन्द्रियॉं, मन, बुद्धि और संस्कारों के मायाजाल में उलझ कर मनुष्य आत्मानुशासन से पतित हो जाता है| मनुष्य को इस पतन से केवल व्रत ही बचा सकते हैं| यदि जीवन के प्रत्येक कर्म को आत्मजागरुकता के साथ किया जाये तो प्रत्येक कर्म व्रत बन जाता है| आत्मबल को जगाने और साधने का नाम ही व्रत है| व्रत प्रवृत्तिमूलक और निर्वृत्तिमूलक भी होते हैं| जिन व्रतों के परिपालन में बाहरी संसाधनों का सहयोग लिया जाता है वे प्रवृत्तिमूलक व्रत हैं और जिन व्रतों के परिपालन में आत्मशक्ति का सहयोग लिया जाता है वे निर्वृत्तिमूलक व्रत हैं| जिसप्रकार नदी के प्रवाह को मर्यादित रखने के लिये दो किनारों की आवश्यकता होती है, उसीप्रकार जीवन के प्रवाह को शुद्ध और सहज बनाने के लिये व्रतों की आवश्यकता होती है| गाड़ी को ब्रेक की, ऊँट को नकेल की, घोड़े को लगाम की और जीवन को व्रतों की आवश्यकता होती है|
व्रतों के कारण मनुष्य सम्भावित आपदाओं, विनाशकारी क्षणों और पतनकारी घड़ियों से बच सकता है तथा निरापद रह सकता है| आधिभौतिक और आधिदैविक सफलताओं को प्राप्त करने में व्रतों का सहयोग आवश्यक होता है| अनियमित आहार-विहार तथा आचरण व्यवस्था मनुष्य को बेलगाम घोड़े के समान उत्पथगामी बनाता है| उससे मनुष्य विविध आपत्तियों को प्राप्त करता है| व्रतानुष्ठान जीवन को सन्तुलित बनाता है| इससे मानवीय चेतना आलोकपथ पर ऊर्ध्वगामी होती है| 
व्रत मानसिक शक्तियों को विकसित करता है| इससे सद्विचार उत्पन्न होते हैं, जो सफलतादेवी के दर्शन कराते हैं| व्रतों के द्वारा आध्यात्मिक उपलब्धियॉं भी प्राप्त होती हैं| व्रतों से भावनाओं में उदात्तता का संचरण होता है, संवेदना छलछलाने लगती है, दिव्य प्रेम का अंकुरण होता है और सादगी का प्रस्फुरण होता है| इससे जैविक ऊर्जा का क्षरण अवरुद्ध हो जाता है और वह ऊर्जा सृजनधर्मिणी बन जाती है| इससे साधक वैचारिक विखण्डन से बच जाता है| यह बचाव केवल व्रतधारक को ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि को मंगलमयी बनाने में सहयोग करता है| अतः व्रत श्रेयस्कर हैं|

व्रत आत्मोत्थान का राजमार्ग है

  1. व्रत एक दुर्द्धर्ष संकल्प है| उद्देश्ययुक्त जीवन के लिये प्रबल विश्‍वास और अगाध निष्ठा का नाम व्रत है| परविरति और आत्मरति के लिये किया जाने वाला अनुष्ठान व्रत संज्ञा को प्राप्त होता है| व्रत एकप्रकार का आत्मानुशासन है| शरीर, इन्द्रियॉं, मन, बुद्धि और संस्कारों के मायाजाल में उलझ कर मनुष्य आत्मानुशासन से पतित हो जाता है| मनुष्य को इस पतन से केवल व्रत ही बचा सकते हैं| यदि जीवन के प्रत्येक कर्म को आत्मजागरुकता के साथ किया जाये तो प्रत्येक कर्म व्रत बन जाता है| आत्मबल को जगाने और साधने का नाम ही व्रत है| व्रत प्रवृत्तिमूलक और निर्वृत्तिमूलक भी होते हैं| जिन व्रतों के परिपालन में बाहरी संसाधनों का सहयोग लिया जाता है वे प्रवृत्तिमूलक व्रत हैं और जिन व्रतों के परिपालन में आत्मशक्ति का सहयोग लिया जाता है वे निर्वृत्तिमूलक व्रत हैं| जिसप्रकार नदी के प्रवाह को मर्यादित रखने के लिये दो किनारों की आवश्यकता होती है, उसीप्रकार जीवन के प्रवाह को शुद्ध और सहज बनाने के लिये व्रतों की आवश्यकता होती है| गाड़ी को ब्रेक की, ऊँट को नकेल की, घोड़े को लगाम की और जीवन को व्रतों की आवश्यकता होती है| 
      व्रतों के कारण मनुष्य सम्भावित आपदाओं, विनाशकारी क्षणों और पतनकारी घड़ियों से बच सकता है तथा निरापद रह सकता है| आधिभौतिक और आधिदैविक सफलताओं को प्राप्त करने में व्रतों का सहयोग आवश्यक होता है| अनियमित आहार-विहार तथा आचरण व्यवस्था मनुष्य को बेलगाम घोड़े के समान उत्पथगामी बनाता है| उससे मनुष्य विविध आपत्तियों को प्राप्त करता है| व्रतानुष्ठान जीवन को सन्तुलित बनाता है| इससे मानवीय चेतना आलोकपथ पर ऊर्ध्वगामी होती है|  
      व्रत मानसिक शक्तियों को विकसित करता है| इससे सद्विचार उत्पन्न होते हैं, जो सफलतादेवी के दर्शन कराते हैं| व्रतों के द्वारा आध्यात्मिक उपलब्धियॉं भी प्राप्त होती हैं| व्रतों से भावनाओं में उदात्तता का संचरण होता है, संवेदना छलछलाने लगती है, दिव्य प्रेम का अंकुरण होता है और सादगी का प्रस्फुरण होता है| इससे जैविक ऊर्जा का क्षरण अवरुद्ध हो जाता है और वह ऊर्जा सृजनधर्मिणी बन जाती है| इससे साधक वैचारिक विखण्डन से बच जाता है| यह बचाव केवल व्रतधारक को ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि को मंगलमयी बनाने में सहयोग करता है| अतः व्रत श्रेयस्कर हैं|

Wednesday, 10 August 2011

णमोकारमन्त्र का महत्त्व

   णमोकारमन्त्र आत्मविकास के प्रशस्त मार्ग को अपनाने के लिये प्रेरणास्रोत का कार्य करता है| यह अभ्युदय और निःश्रेयस का प्रसाधक है| ऐहिकदृष्टि हो या पारलौकिक, समस्त दृष्टियों से णमोकारमन्त्र हित का सम्पादक है| अज्ञान एवं अहंमन्यता के आग्रह को मिटाने के लिये यह मन्त्र अति-अनिवार्य है|
  णमोकारमन्त्र का स्मरण करने से समस्त अमंगल दूर हो जाते हैं, अनेक प्रकार की ॠद्धि-सिद्धियॉं उपलब्ध होती हैं तथा मुक्त होने का सुलभ अवलम्बन प्राप्त होता है| जिस प्रकार अग्निकण ईन्धन की महाराशि को भस्म करने में समर्थ है, उसी प्रकार णमोकारमन्त्र चिरसंचित ज्ञानावरणादि कर्मों के समूहरूपी ईन्धन की राशि को क्षणार्द्ध में दग्ध करने में समर्थ है| कल्पवृक्ष, चिन्तामणि रत्न अथवा कामधेनु चिन्तित फलप्रदायक होने से जगत् में पूज्य माने गये हैं| णमोकारमन्त्र चिन्तित और अचिन्तित फलों का प्रदाता होने से उन तीनों से भी अधिक पूज्य है| जिस अज्ञान, पाप और संक्लेशरूपी अन्धकार को सूर्य, चन्द्र अथवा दीपक जैसे ज्योतिर्मयी पदार्थ दूर नहीं कर सकते, उस अन्धकार को इस महामन्त्र का स्मरण अतिशीघ्र दूर कर देता है| अतः इससे अधिक ज्योतिर्मयी कौन हो सकता है ?
इस मन्त्र का स्मरण करने से अनादिकालीन मूर्च्छा भग्न हो जाती है| णमोकारमन्त्र अंग और अंगबाह्य ग्रन्थों का सार है| जिस प्रकार धन की रक्षा के लिये तिजोरी, शरीर की रक्षा के लिये वस्त्र, आरोग्य की रक्षा के लिये औषधि आदि की आवश्यकता हुआ करती है, उसी प्रकार आध्यात्मिक भावों की रक्षा के लिये महामन्त्र की आवश्यकता है| यह सच है कि यह मन्त्र शब्दों से निर्मित है, किन्तु यह अपने आराधक को अशब्द की ओर ले जाता है| जब तक चेतना में चित्रांकित नहीं हो जाता, तब तक ही यह मन्त्र शब्दमयी बना रहता है| यह मन्त्र भक्ति, जप और ध्यान में सामंजस्य स्थापित करता है| संसाररूपी रणक्षेत्र में मोह, राग-द्वेषरूपी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना हो तो साधक के पास णमोकारमन्त्ररूपी अमोघ बाण परमावश्यक हैं| जिस प्रकार जल से शारीरिक मल दूर होते हैं, उसी प्रकार णमोकारमन्त्र से कर्ममल दूर होता है|
 जिस प्रकार धरती में वपन किया गया बीज धरती के रस को चूस कर यथासमय अंकुर के रूप में उत्फुल्लित होता है, उसी प्रकार साधक के मन में बोये गये णमोकारमन्त्र का एक-एक अक्षर आत्मा के चैतन्यामृत का पान कर तेज स्रोत के रूप में प्रकट हो जाता है| गुरु की गुरुता और प्रभु की प्रभुता की प्राप्ति के लिये णमोकारमन्त्र सहायक बनता है|