- व्रत एक दुर्द्धर्ष संकल्प है| उद्देश्ययुक्त जीवन के लिये प्रबल विश्वास और अगाध निष्ठा का नाम व्रत है| परविरति और आत्मरति के लिये किया जाने वाला अनुष्ठान व्रत संज्ञा को प्राप्त होता है| व्रत एकप्रकार का आत्मानुशासन है| शरीर, इन्द्रियॉं, मन, बुद्धि और संस्कारों के मायाजाल में उलझ कर मनुष्य आत्मानुशासन से पतित हो जाता है| मनुष्य को इस पतन से केवल व्रत ही बचा सकते हैं| यदि जीवन के प्रत्येक कर्म को आत्मजागरुकता के साथ किया जाये तो प्रत्येक कर्म व्रत बन जाता है| आत्मबल को जगाने और साधने का नाम ही व्रत है| व्रत प्रवृत्तिमूलक और निर्वृत्तिमूलक भी होते हैं| जिन व्रतों के परिपालन में बाहरी संसाधनों का सहयोग लिया जाता है वे प्रवृत्तिमूलक व्रत हैं और जिन व्रतों के परिपालन में आत्मशक्ति का सहयोग लिया जाता है वे निर्वृत्तिमूलक व्रत हैं| जिसप्रकार नदी के प्रवाह को मर्यादित रखने के लिये दो किनारों की आवश्यकता होती है, उसीप्रकार जीवन के प्रवाह को शुद्ध और सहज बनाने के लिये व्रतों की आवश्यकता होती है| गाड़ी को ब्रेक की, ऊँट को नकेल की, घोड़े को लगाम की और जीवन को व्रतों की आवश्यकता होती है|
व्रतों के कारण मनुष्य सम्भावित आपदाओं, विनाशकारी क्षणों और पतनकारी घड़ियों से बच सकता है तथा निरापद रह सकता है| आधिभौतिक और आधिदैविक सफलताओं को प्राप्त करने में व्रतों का सहयोग आवश्यक होता है| अनियमित आहार-विहार तथा आचरण व्यवस्था मनुष्य को बेलगाम घोड़े के समान उत्पथगामी बनाता है| उससे मनुष्य विविध आपत्तियों को प्राप्त करता है| व्रतानुष्ठान जीवन को सन्तुलित बनाता है| इससे मानवीय चेतना आलोकपथ पर ऊर्ध्वगामी होती है|
व्रत मानसिक शक्तियों को विकसित करता है| इससे सद्विचार उत्पन्न होते हैं, जो सफलतादेवी के दर्शन कराते हैं| व्रतों के द्वारा आध्यात्मिक उपलब्धियॉं भी प्राप्त होती हैं| व्रतों से भावनाओं में उदात्तता का संचरण होता है, संवेदना छलछलाने लगती है, दिव्य प्रेम का अंकुरण होता है और सादगी का प्रस्फुरण होता है| इससे जैविक ऊर्जा का क्षरण अवरुद्ध हो जाता है और वह ऊर्जा सृजनधर्मिणी बन जाती है| इससे साधक वैचारिक विखण्डन से बच जाता है| यह बचाव केवल व्रतधारक को ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि को मंगलमयी बनाने में सहयोग करता है| अतः व्रत श्रेयस्कर हैं|
परम पूज्य चारित्र-चक्रवर्ती, मुनि-कुंजर, आचार्य श्री आदिसागर जी महाराज (अंकलीकर) की विशुद्ध परंपरा के वर्तमान पट्टाचार्य परम पूज्य विद्या-वाचस्पति, तपश्चर्या-चक्रवर्ती, शब्द-शिल्पी, जिनशासन प्रदीप, आकिंचन्य श्रमनेश्वर, आचार्य श्री सुविधिसागर जी महाराज ने 5 रस (घी, तेल, नमक, दही, शक्कर) का आजीवन के लिए त्याग कर दिया है.
Thursday, 11 August 2011
व्रत आत्मोत्थान का राजमार्ग है
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