Saturday, 13 August 2011

रक्षाबन्धन

रक्षाबन्धनपर्व को वात्सलपर्व अथवा सलौनापर्व कहते हैं| इस पर्व के नाम में आगत बन्धन शब्द संकल्प का सूचक है| रक्षा का संकल्प करना ही रक्षाबन्धन है| रक्षा किसकी? यह प्रश्‍न विचारणीय है| अनादिकाल से संसार में परिभ्रमण करने वाले आत्मा के स्वभवा की रक्षा, सम्प्रदायों की अग्नि में झुलस रहे धर्म की रक्षा, परिवार राष्ट्र-देश और परिवेश की रक्षा इसी प्रकार समस्त कर्त्तव्य कर्मों की रक्षा आवश्यक है|
      संस्कृत, संस्कृति और संस्कार हमारे देश के आस्थास्तम्भ थे, जो शनैः शनैः जर्जरित हो रहे हैं| आज उनकी रक्षा का संकल्प आवश्यक है, क्योंकि देश होगा तो धर्म होगा तथा धर्म होगा तो मनुष्य के जीवन में सुख-शान्ति होगी| मुनिप्रवर विष्णुकुमार जी ने अपना सर्वस्व लुटा कर आज ही के दिन सात सौ मुनियों की रक्षा की थी| आज आर्यावर्त्त की आर्यसंस्कृति किसी विष्णुकुमार मुनिराज की राह तृषित नजरों से निहार रही है| क्या हम अपने संकल्पशक्ति को दृढ़ बना कर संस्कृतिरक्षा के लिये कटिबद्ध हो सकते हैं? क्या अमर्यादा के पंक में आकण्ठ डूबे इस सभ्यता को त्राण दिलाने का संकल्प किया जा सकता है? जिस देश में नारी पूजी जाती थी, उसी देश में आज मॉं-बहनों के आँचल तार-तार किये जा रहे हैं| क्या इससे उन्हें छुटकारा दिलाया जा सकता है? ऐसे कई यक्षप्रश्‍न हैं| इनके समाधान खोजने का संकल्पदिवस ही रक्षाबन्धन है| अतः जब हम कर्त्तव्यरक्षा के लिये तत्पर होंगे तभी पर्व मनाना सार्थक होगा|

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