Monday, 15 August 2011

व्यवहारकुशलता से सफलतायें मिलती है

सद्व्यवहाररूपी पुष्प चारित्र की लता पर खिलता है| उसका परिमल दिग्-दिगन्त में व्याप्त होकर चिन्तन का वातावरण सुरम्य बनाता है| इस पुष्प को पल्लवित करने के लिये सजल भावनारूपी नीर आवश्यक होता है| मनुष्य सामाजिक परिवेश में जीवित रहता है| रिश्तों की सौहार्द्रता के बिना सामाजिकता स्थिर नहीं रह सकती| रिश्तों की सौहार्द्रता के लिये सद्व्यवहार अति-आवश्यक है| मनुष्य के ज्ञान-विज्ञान, आचरण या आध्यात्मिक पात्रता का मूल्य व्यवहार-कुशलता के सद्भाव में ही सम्भव है| जो मनुष्य व्यवहारशिष्ट नहीं होता, उसके सारे गुण अंकरहित बिन्दियों की तरह निरर्थक हो जाते हैं| बाह्य व्यवहार आन्तरिक चिन्तन एवं भावनाओं के गर्भ से प्रसूत होने से अन्तरंग का दर्पण होता है|
      अशिष्ट व्यवहार अनगढ़ित रूखे व्यक्तित्व का परिचायक है| अशिष्ट व्यक्ति कितनी ही प्रतिभाओं से सम्पन्न क्यों न हो, वह लोकसम्मान को अर्जित नहीं कर सकता| उसकी अव्यावहारिकता लोगों के लिये विकर्षण का कारण बनती है| लोगों के लिये तो दूर, उसके परिजन भी उसके साथ पराये जैसा बर्ताव करते हैं| अपनी उद्धतता एवं उद्दण्डता के कारण वह अपने और औरों के लिये घातक होता है| वह अग्नि के समान ही स्व-परदाहक होता है| अभद्र और अशिष्ट व्यवहार करने वाला सभी का तिरस्कार पाते रहने से और अधिक उग्र और विनाशशील हो जाता है| फलतः उसकी रचनाधर्मिता नष्ट हो जाती है| अतः अशिष्ट व्यवहार करना आत्महत्या करने के समान है|
      व्यवहार की शालीनता पारसमणि के समान इच्छित फलप्रदात्री है| यह व्यक्तित्व का सहज वशीकरण मन्त्र है| यह ऐसा गुप्तरहस्य है, जिसे हृदयंगम करने वाला मनुष्य सफलता और महानता का वरण करता है| व्यवहार की शालीनता न केवल औरों को प्रसन्न करती है, अपितु स्वयं को भी आनन्दित करती है| इससे अन्तरंग परिष्कृत होता है| जब अन्तरंग की भावना प्रस्फुटित होती है, तब हृदय मोम के समान कोमल हो जाता है| इससे वाणी में अमृत झरने लगता है| ऐसी संवेदनशीलता दूसरों के हृदय पर सीधा असर करती है| फलतः वातावरण में सौम्यता आती है| इससे प्रतिभाओं को उभरने का अवसर मिलता है और सफलता प्राप्त होने की नियामकता बन जाती है|

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