प्रत्येक मनुष्य भौतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रगति करना चाहता है| प्रगति के लिये शक्ति की आवश्यकता होती है| शक्ति का संचयन और संवर्द्धन मौन के द्वारा होता है| इसीलिये मौन प्रगति का बीज है| मौन का अर्थ है अपनी ऊर्जा के बिखराव को समेटना| अपनी अन्तरंगशक्ति को संग्रहित करके उच्चस्तरीय पुरुषार्थ में अर्थात् आत्माभ्युदय के श्रेष्ठ मार्ग में लगाने के लिये मौन परमावश्यक है| जिस प्रकार शरीर को शक्तिमान और बलवान बनाये रखने के लिये ब्रह्मचर्य की साधना की जाती है, उसी प्रकार वाणी को प्रभावशाली बनाये रखने के लिये मौन की साधना की जाती है| अधिक बोलने से मन और मस्तिष्क दोनों भी थक जाते हैं| अतः उन दोनों की स्फूर्ति के लिये मौन रामबाण औषधि है|
सारे संसार का इतिहास उठा कर देख लो, संसार में जितने भी अनर्थ हुए हैं या युद्ध हुए हैं - उनके पीछे सबसे बड़ा कारण जिह्वा का लपलपाना ही है| द्रौपदी यदि कटुवचन नहीं बोलती तो कुरुक्षेत्र में खून की नदियॉं बही नहीं होती| राजा दशरथ कैकेयी को वचन नहीं देते तो राम के राजतिलक में कोई विघ्न उपस्थित नहीं हुआ होता| रावण यदि विभीषण के साथ कटुवचनों का प्रयोग नहीं करता तो युद्धकाल में विभीषण राम के पक्ष में न लड़ता| आज भी पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय क्षेत्रों में जितने संघर्ष दिखाई दे रहे हैं, उनमें बोलना ही मुख्य कारण है| कलह के प्रसंग पर मौन शान्ति का उपाय है| विपत्ति के समय मौन धैर्यप्रदाता है| हजारों भाषणों का जो प्रभाव नहीं पड़ता, वह मौन का पड़ता है| इसीलिये आध्यात्मिक दर्शन में मौन को सर्वाधिक और सर्वप्रथम महत्त्व दिया गया है|
मौन रहने से मन को ताजगी मिलती है, विचारों में स्फूर्ति आती है, वाणी में जोश आता है और क्रियाओं में उत्साह का संचरण होता है| मौन मनुष्य की लोकप्रियता का एक अचूक साधन है| मौन रहने वाला जीव कलह से बचता है| मौन सभी तरह के मनुष्यों का सुरक्षाकवच है| ज्ञानी जीव जब तक मौन रखता है, तब तक वह अपने सत्यव्रत की रक्षा कर सकता है और अपनी लोकप्रियता बनाये रख सकता है| मूर्ख जीव जब तक मौन रखता है, तब तक वह लोगों द्वारा समझदार समझा जाता है| मौन इन्द्रियसंयम का प्रधान कारण है| मौन साधक को प्रगतिशील बनाता है| मौन धारण करके ही मनुष्य अपने अन्तरंग की निधि के दर्शन प्राप्त कर सकता है| मौन में उच्चकोटि की शक्ति है|
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