संसार का प्रत्येक जीव सुन्दरता का अभिलाषी है| अन्तर्मन को उकेेरे बिना वास्तविक सौन्दर्य के दर्शन हो नहीं पाते| सुन्दरता के लिये रूप की ही नहीं, गुणों की भी आवश्यकता होती है| वास्तविक सौन्दर्य में देवत्व और दिव्यत्व का भाव जुड़ा हुआ होता है| निःसन्देह वही सौन्दर्य समीचीन है, जिसमें मंगलता हो और कल्याणकारित्व हो| जीवन में आत्मप्रबोध, चरित्र,चिन्तन एवं व्यवहार को परिष्कृत करके ही कल्याणकारी सौन्दर्य के श्रीमुख का दर्शन हो सकता है| जब जीवन के हर क्षण में ऐसे सौन्दर्य का अनुभव होने लगता है, तब जीवन ही सौन्दर्य का पर्यायवाची बन जाता है| वस्तुतः शरीर को स्वस्थ एवं नीरोग रख कर आत्मान्वेषण करने पर ही सौन्दर्य प्राप्ति हो सकती है|
मन का सौन्दर्य उसके दिव्य-विचारों में सन्निहित है| श्रेष्ठ और सद्विचारों से मन का सौन्दर्य निखरता है| मनरूपी दर्पण पर जब भी कुविचारों की धूल जमती है, उसका अकृत्रिम सौन्दर्य नष्ट हो जाता है| ऐसा मन विकृत ही नहीं, कुरूप भी हो जाता है| यह समस्त मनोविकारों का जनक है| यदि मन कुमार्गगामी होता है तो शरीर भी सत्कर्मों से विरत हो जाता है, क्योंकि शरीर का नियन्ता व अनुशास्ता मन ही होता है| जिस पुरुष का मन विद्रूप हो, उसका शरीर चाहे कितना भी मनोहर व नयनरम्य क्यों न हो - सुन्दरता की श्रेणि में नहीं आ सकता| चर्म की सुन्दरता व असुन्दरता का मूल्य ही नहीं होता| इसीलिये मन के सौन्दर्य को उभारा जाना चाहिये| स्वाध्याय, ध्यान अथवा उपासनादिक साधनों से मन को सौन्दर्यान्वित किया जा सकता है| मन के सुन्दर होने पर व्यक्तित्व भी आकर्षक हो जाता है|
सेवा और सहकार के माध्यम से भावनाओं में सौन्दर्य की अभिवृद्धि की जा सकती है| जैसे मन विचारों का नायक है, उसी प्रकार हृदय भावनाओं का नायक है| भावनाओं का परिष्करण ही हृदय का सौन्दर्य है| वैचारिक सौन्दर्य अत्यन्त प्रखर और प्रबल होता है, उसी प्रकार भावनाओं का सौन्दर्य चन्द्रिकाओं के समान शीतल होता है| इन्हीं के प्रभाव से हृदय पीड़ित की पीड़ा को देख कर सजल हो उठता है| दूसरों को कष्ट में पड़ा हुआ देख कर जिसका हृदय मोम की तरह पिघल उठता है, वही भावनिक सौन्दर्य को प्राप्त करता है| अहंकार के आवरण को सेवा ही हटा सकती है| जो आत्मिक सौन्दर्य का रसास्वाद लेना चाहते हैं उन्हें सेवा का व्रत अवश्य स्वीकार करना चाहिये|
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