Saturday, 20 August 2011

चिन्तन में विधेयात्मकता होनी चाहिये

मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन पर उसके चिन्तन का गहरा प्रभाव पड़ता है| चिन्तन के द्वारा ही मनुष्य के लक्ष्य और भविष्य का निर्धारण होता है| चिन्तन की कला को जो जान लेता है, वही सफलता के सोपान चढ़ सकता है| संसार में जितने भी नकारात्मक विचारधारा वाले मनुष्य हैं, वे अपने आपको कायरता व निराशा के भँवर में फँसा कर असफलता का दामन थाम लेते हैं| नकारात्मक विचार आत्मशक्ति की विस्मृति से उत्पन्न होते हैं| उनकी सदवस्था में मनुष्य अपनी पात्रताओं को और सामर्थ्य को पहचान नहीं पाता| गरीबी, दीनता, कायरता और अनेक प्रकार की व्याधियॉं नकारात्मक विचारों के ही परिणाम हैं| इस स्थिति में मनुष्य समयोचित निर्णय नहीं कर पाता है, नतीजन उसे लाभ की जगह हानि ही उठानी पड़ती है|
      मनुष्य का स्वभाव बड़ा ही विचित्र है| मनुष्य की जितनी आस्था बुराई में है, उतनी सघनता अच्छे काम में नहीं होती|  यही कारण है कि मनुष्य अच्छे कार्य को करते समय प्राप्त हुई प्रारम्भिक असफलताओं से अत्यधिक निराश हो जाते हैं| उतनी निराशा उन्हें बुरे कार्य करते समय प्राप्त होने वाली असफलताओं से नहीं होती है| उतनी ही आस्था अच्छाई के प्रति उत्पन्न करनी हो तो विचारों में विधेयात्मकता का संचरण परमावश्यक है| ऐसे चिन्तन से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा रचनाधर्मिता से समन्वित होती है| ऐसे व्यक्ति को कभी निरुत्साही नहीं देखा जा सकता| उसके उन्नति के पथ का एक द्वार बन्द होने तक तो वह अन्य द्वार अपने पुरुषार्थ के बल पर खोल लेता है| साहस और विश्‍वास ये उसके दो सहचर होते हैं, इसीलिये सफलता उसके चरण चूमती है|
      मनुष्य के विचार उसके व्यक्तित्व के दर्पण होते हैं| वह जैसे विचार मन में रखता है, वैसे ही भाव उसके चेहरे पर उभर आते हैं| अशुभ विचार अथवा नकारात्मक विचार करने वाले मनुष्यों के चेहरे पर भय, निराशा और कुण्ठा परिलक्षित होती है| इससे विपरीत सकारात्मक विचारों के धारक लोग स्वस्थ, उल्लसित और आध्यात्मिक विचारों से परिपूर्ण रहते हैं| जिसके चित्त में एकाग्रता, दृढ़ता और निर्मलता होती है, वही मनुष्य अपने चिन्तन में शुभभावों को ला सकता है| जिसका चित्त ही रुग्न हो, उसका चरित्र निर्मल कैसे हो सकता है ? अतः विचारों की शुद्धता के लिये निषेधात्मकता को दूर करना चाहिये| सकारात्मक विचार आत्मशुद्धि में सहायक होते हैं|

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