आराध्य के प्रति आत्मपरिणति की तादात्म्यानुभूति भक्ति है और वस्तु के शाश्वत-अशाश्वत स्वभाव को जानने का माध्यम ज्ञान है| जीवन की चैतन्य चेतनता इन्हीं के मध्य प्रवाहित होती है| ये दो श्रेष्ठ धारायें हैं| भक्ति संवेदना से युक्त भावधारा है| इन दोनों का समुचितरूप से विकास हुए बिना जीवन में परमदशा का पुष्प पुष्पित नहीं होता| ये दोनों प्रकाश के दिव्य ज्योतिस्तम्भ हैं| इन्हीं के आलोक में मनुष्य अपनी गुणसम्पदा का अवलोकन कर सकते हैं| ये परम अमृत की तरह हैं, क्योंकि इन्हीं के द्वारा आत्मा अमर होता है| आत्मा की पूर्णता और गुणों का समग्र उत्थान इन्हीं दोनों की सन्निधि में होता है|
अकेली भक्ति मूक होती है और अकेला ज्ञान वाचाल होता है| इन दोनों के मिले बिना व्यक्तित्व में अपूर्णता रह जाती है| ये दोनों जिस पल एकाकार हो जाते हैं, उसी पल जीवन में क्रान्ति घटित होती है| भक्ति और ज्ञान जीवन को परमोपलब्धि प्रदायक है| जीवनरूपी महासंग्राम में विजय प्राप्त करने के लिये अथवा मोक्ष को दिलाने वाले कला-कौशल को प्राप्त करने के लिये इस युगल की अनिवार्य आवश्यकता है| ज्ञान शास्त्र के समान विकारच्छेदक है| उससे कर्मों की जड़ पर वार तो किया जा सकता है, परन्तु साधक के पास भक्तिरूपी ढाल न हो तो वह अपनी सुरक्षा किस प्रकार कर सकेगा ? ज्ञान जब तर्कों की शुष्क रेत मन के आँगन में बिखराने का प्रयत्न करता है, तब भक्ति समीर बन कर उसे उड़ा ले जाती है| अतः भक्ति और ज्ञान दोनों ही उपादेय हैं|
भक्ति और ज्ञान अर्थात् भावना और विचारणा की दो पतवारों से ही जीवन-नौका भवसागर से पार जा सकती है| ये आध्यात्मिक जीवनरूपी गाड़ी के दो ऐसे चक्र हैं, जो इष्टस्थान तक पहुँचने के लिये वाहक बनते हैं| ये सरिता के दो किनारों की भॉंति है, क्योंकि इनकी मर्यादा में रहने वाली आध्यात्मिक सरिता परमधामरूपी सागर तक जा सकती है| भक्ति और ज्ञान ये ऐसी साधना है, जिससे सिद्धि और समाधि का जन्म होता है| ये दोनों विचारों एवं कर्मों को श्रेष्ठत्व प्रदान करते हैं| निष्काम अवस्था इनकी अनुपस्थिति में प्रक नहीं हो सकती| मनुष्य के अन्तःकरण की ये सुगन्ध हैं| यही कारण है कि जीवन की सार्थकता और समग्रता भक्ति और ज्ञान के द्वारा ही हो सकती है|
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