अर्थ अनर्थ का मूल है - इस उक्ति को कौन भूल सकता है ? प्रदर्शन, व्यसन और विलासिता में व्यय होने वाला धन अनेक प्रकार के सामाजिक अपराधों को जन्म देता है| इससे वर्गविषमता की वृद्धि होती है, घृणा, द्वेष आदि भाव प्रकृष्टता को प्राप्त होते हैं, उत्पादन घटता है, अकर्मण्यता की वृद्धि होती है| ऐसी दशा में अपनी मनोभिलाषा की पूर्ति के लिये मनुष्य अनैतिक आचरण में प्रवृत्त हो जाता है| रिश्वतखोरी और मिलावट जैसी समस्याओं का कारण अर्थविषयक असंयम ही है| फिजूलखर्ची और दुर्व्यसनों में फँसा हुआ व्यक्ति अपना ही नहीं, अपितु परिवार का भी नुकसान करता है| उसका परिवार आर्थिकतंगी से झूंझते हुए अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण नहीं कर पाता| अभाव से लड़ते-झगड़ते उनका व्यक्तित्व अविकसित रह जाता है|
अर्थ-असंयम पारिवारिक अशान्ति का मूल कारण है| अतः अर्थसंयम के निर्देश से न्यायपूर्वक अर्थोपार्जन करके हितव्ययिता और मितव्ययिता का समादर करना चाहिये| जिस प्रकार योग्य समय में और योग्य परिमाण में ग्रहण किया गया आहार शरीर को बलशाली और दीर्घजीवी रखता है, उसी प्रकार योग्य समय में, योग्य स्थान में और योग्य परिमाण में किया गया न्यायोपार्जित धन का व्यय मनुष्य के सम्मान को सम्पुष्ट करता है| धन जीवननिर्वाह का संसाधन है| अतः उसका संयम निश्चित रूप से जीवन में सुख प्रदान कर सकता है|
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