वर्तमान में समाज एवं युग की अन्तहीन समस्याओं का मूल कारण संस्कारजनित चरित्र-निर्माण के महान कार्यों की उपेक्षा है| आज का मानव क्षणिक सुखोपभोग के लिये अथवा निजी क्षुद्र स्वार्थ की पूर्ति के लिये जीवन के इस सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य को विस्मृत कर गया है| आज मनुष्य ने भौतिक प्रगति के चाहे जितने कीर्तिमान स्थापित कर लिये हो, परन्तु वह आन्तरिक अवनति, पतन और पराभव की पीड़ा से सन्त्रस्त है| यही कारण है कि मनुष्य का जीवन अशान्ति और गहन विषाद का पर्यायवाची बन गया है| संस्कार-विहीन मनुष्य में समाधान के ढेरों प्रयत्न जीवन की खाई-खन्दकों को पाटने में असफल हो रहे हैं| तड़क-भड़क की चकाचौंध में चरित्रनिर्माण करने वाली संस्कारशाला का महत्त्व नगण्य हो गया है|
संस्कार अनेक गुणरूपी फूलों का गुलदस्ता है| सदाचरण, विश्वसनीयता, आदरभाव, स्वविवेक, विनम्रता, दिव्यदृष्टि, आज्ञापालन, वचनबद्धता, निर्णायकशक्ति और दया आदि उच्चमनोवृत्ति के निर्माता सभी गुण इस गुलदस्ते के भिन्न-भिन्न पुष्प हैं| सुव्यवस्थित पद्धति से जीवन जीना अथवा अपने जीवन को गुणों से सुवासित करना ही संस्कार करना है| संस्कार नियमों में मर्यादित जीवन को सुव्यवस्थित कर जीने की कला को सिखाता है| अच्छे व्यक्तित्व का निर्माण संस्कारों के पावन धरातल पर आध्यात्मिक एवं नैतिक वातावरण की सन्निधि में हेाता है| व्यक्तित्व ही व्यक्ति का वास्तविक परिचय है| समृद्ध एवं श्रेष्ठ व्यक्तित्व ही व्यक्ति की शाश्वत पूंजी है| इसके अभाव में व्यक्ति का व्यवहारिक धरातल नितान्त दरिद्र और तुच्छ होता है| संस्कार आत्मा का आभूषण है|
संस्कार ऐसी सम्पदा है जो दैनिक जीवन में आने वाले छोटे-छोटे सूत्रों के माध्यम से जमा होती है| जिसके पास यह पूंजी जितनी अधिक मात्रा में एकत्र होती है, वह उतना ही व्यवहारकुशल और सफल व्यक्तित्व का धनी होता है| संस्कार जीवन से भी अधिक कीमती है, क्योंकि उसी के द्वारा मनुष्य जीवन के मूल्यों को प्राप्त करता है| संस्कारों के अभाव में जब उच्च-आदर्श और मूल्य के अनुरूप जीवन को संगठित करने में मनुष्य विफल हो जाता है, तब वह बाह्य में भी समाज का समायोजन करने में भी विफल हो जाता है| माता-पिता, गुरुजन, अनुभव और संगति ये चार संस्कार-निर्माण के आधारस्तम्भ हैं| संस्कारों के कारण ही मनुष्य इन्द्रिय और मनोवृत्तियों पर अंकुश लगा कर सफलता के हिमशिखर का स्पर्श करता है|
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