गुणवानों की प्रशंसा करना एक दैवी गुण है| जिनके हृदय में दूसरों के प्रति प्रेम, सम्मान और आत्मीयता के भाव होते हैं, जिन्हें दूसरों के जीवन-व्यवहार तथा सत्कार्यों को देख कर प्रसन्नता का अनुभव होता है, जिनका मन पवित्र और विशाल होता है सच्चे अर्थों में वे ही लोग औरों की प्रशंसा कर सकते हैं| प्रशंसा करने से एक ओर जहॉं मानव गुणग्राही बनता है, वहीं दूसरी ओर समाज में अच्छे कार्यों को सम्पन्न करने वाले कार्यकर्त्ताओं को समर्थन, उत्साह और सम्बल प्राप्त होता है| इससे सत्कार्यों का असीम वेग भी बढ़ जाता है|
समाज के अधिकतर व्यक्ति अपना अमूल्य समय दूसरों की निन्दा करने में अथवा दूसरों के अवगुणों को खोजने में व्यतीत कर देते हैं| ऐसा करने से वह जिस समय में दूसरों के जीवन से कुछ प्रेरणा लेकर सीख सकता था, गुणवानों की प्रशंसा करके पुण्योपार्जन कर सकता था, उस समय को व्यर्थ में खोकर कर्मबन्ध कर लेता है| निन्दा के स्वभाव से स्वयं के जीवन में गुणों की कमी और दुर्गुणों का प्रवेश प्रारम्भ हो जाता है| यही कारण है कि निन्दक अपने आपको सदैव अशान्त, व्याकुल और अकेला पाता है| इससे विपरीत गुणग्राही व्यक्ति उत्साह, प्रमोद और शान्ति से परिपूर्ण होकर एक समय में अनेक लक्ष्यों की सिद्धि कर लेता है|
दूसरों की प्रशंसा लोकप्रिय बनने का प्रथम सोपान है| इससे चिन्तन की कोटि उच्च होती है| मनुष्य जैसा देखता है, वैसा करता है और जैसा करता है, उसी प्रकार बन जाता है| अतः पर के अवगुण देखने की अपेक्षा गुणों को देखना ही श्रेयस्कर है| प्रशंसा करने वाले मनुष्य के मन में उत्साह होता है, वह गुणों का अर्जन करने के लिये प्रतिपल प्रयत्नशील होता है| उसके मन में वात्सल्य, आत्मीयता और प्रेम की भावनायें तीव्रता से उदित होती रहती है| वह स्वयं तो शुद्ध भावों में रमण करता है और औरों के लिये भी आशा के दीप जलाता है| निन्दा करने वाला व्यक्ति दूसरों का तो कुछ भी नहीं बिगाड़ता, किन्तु स्वयं के समय, बुद्धिमत्ता, व्यवहार और जीवन की हानि कर लेता है| प्रशंसा मानव के मन और मस्तिष्क को विकसित करती है तो निन्दा उन्हें विकृत करती है| प्रशंसा प्रेरणा की प्रणेता है तो परनिन्दा पतन की पगडण्डी| अपने जीवन को समुन्नत बनाने के इच्छुक व्यक्ति को परनिन्दक नहीं अपितु प्रशंसक बनना चाहिये|
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