Wednesday, 21 September 2011

ब्रह्मचर्य धर्म

पॉंचों इन्द्रियों के विषयों से विरक्त होने का नाम ब्रह्मचर्य है| इस व्रत को धारण करने वाले साधक स्त्री-पुरुषों के परस्पर रागजन्य सम्बन्धों से विरक्त रहते हैं और निश्‍चय से पदार्थमात्र के विकल्पों का त्याग करके आत्मस्वभाव में स्थिर रहते हैं| जिन्हें किसी भी प्रकार के सांसारिक सुखों की इच्छा नहीं होती, वे ही इस दुर्द्धर व्रत को धारण कर सकते हैं| भोग्यपदार्थ की ओर झुका हुआ पुरुष दास बन कर रह जाता है| ब्रह्मचर्य का परिपालन करने वाला दास नहीं, स्वामी होता है|
      ब्रह्मचर्य अमरत्व की साधना है| शारीरिक विकास करने के लिये धर्ममार्ग में अनेक प्रकार की साधनायें बतलायी गयी हैं| उन साधनाओं में ब्रह्मचर्य प्रमुख है, ब्रह्मचर्यव्रत परिवार का मुखिया है| ब्रह्मचयर्र् ही सच्चा विघ्न-विनाशक है, क्योंकि उसकी सन्निधि में कोई विघ्न कायम नहीं रख सकता| गुरु मार्गदृष्टा और गौरवशाली होते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य मार्गदृष्टा और गौरवशाली होने से वह भी गुरु है|
      ब्रह्मचर्य की सुगन्ध के समान सुगन्ध संसार के पुष्पों में कहॉं ? पुष्पों का सौरभ तो हवा के रुख का आवागमन करती हैं, किन्तु ब्रह्मचर्य की सुगन्ध दशों दिशाओं में फैल जाती है| ब्रह्मचर्य के बिना मन्त्र, तन्त्र, अध्यनन, दया तथा साधनों में प्रगति नहीं हो सकती| शारीरिक वर्चस्व, बौद्धिक प्रतिभा, प्रतिभाशाली वक्तृत्व, कला-कौशल आदि लौकिक अभ्युदय के लिये ब्रह्मचर्य अत्यन्त आवश्यक है| आध्यात्मिक साधना की सिद्धि के लिये ब्रह्मचर्य से उत्तम साधन दूसरा नहीं होता| ब्रह्मचर्य की तुलना सूर्य के साथ की जा सकती है| जैसे सूर्य ग्रह और उपग्रहों का केन्द्र है, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य समस्त सद्गुणों का केन्द्र है| ब्रह्मचर्य के परिपालन से मनुषय का मन निर्विकार होता है और निर्विकार मन ही परमतत्त्व का घर है| इससे पे्रम व्यापक हो जाता है, यही व्यापकता जीवन का प्राप्तव्य है|

आकिंचन्य धर्म

परि = चारों ओर से, ग्रह = पकड़ना, जकड़ना, दुःख देना, पीड़ा देना| जो चारों ओर से जकड़े, दुःख दे वह परिग्रह है| दस प्रकार के बाह्य और चौदह प्रकार के आभ्यन्तर इस प्रकार चौबीस प्रकार के परिग्रहों से रहित होकर और सुख-दुःख देने वाले कर्मजनित भावों को रोक कर निज स्वभाव में रहने का नाम आकिंचन्य है| उपात्त शरीरादिकों में भी ये मेरा नहीं है ऐसी भावना भाना आकिंचन्य धर्म है| यह धर्म जीव को निःसंग और निश्‍चिन्त बनाता है|
      परिग्रह के दो भेद हैं - बाह्य और आभ्यन्तर| बाह्य वस्तु मूर्च्छा में कारण होने से परिग्रह है न कि बाह्य वस्तु स्वयं परिग्रह है| सम्पन्नता होते हुए भी उसमें मूर्च्छा का नहीं होना आकिंचन्य है| छोड़ना और ग्रहण करना इनका तथ्य समझ में आ जाये तो त्याग और आकिंचन्य को समझा जा सकता है| सम्बन्ध जोड़ने का कार्य बुरा नहीं, लेकिन उसमें तटस्थ भाव रखना आकिंचन्य है| बेटी अपनी होते हुए भी वह परायी अमानत है ऐसा विरक्तिरूप भाव आकिंचन्य है| आकिंचन्य धर्म व्यक्ति को वस्तु से भिन्न रहना सिखाता है, जल में स्थित कमल की तरह|
      संसार की समस्त वस्तुयें नश्‍वर हैं, रिश्ता टूटने के लिये जुड़ा है ऐसा चिन्तन वस्तु के प्रति मोह (राग) उत्पन्न नहीं होने देगा| जिस प्रकार छोटे-से-छोटा कॉंटा शरीर में दुःख उत्पन्न कर देता है, उसी प्रकार छोटी-सी चाह भी शरीर को दुःख देती है| जो चाह से रहित होता है वह सब पर राज करता है| संसार भावना का चिन्तन और आकिंचन्य धर्म का पालन विपरीत परस्थितियों में स्थिरता प्रदान करने में कारणीभूत है| आज तक परिग्रह ने किसी को सुखी नहीं किया| अतः परिग्रह को छोड़ने में भूषण मानना चाहिये, जोड़ने में नहीं|

उत्तम त्याग धर्म

संसार, शरीर और भोगों से उदासीन होने का नाम त्यागधर्म है अथवा सुपात्रों को आहार, शास्त्र, औषधि और अभय देना त्यागधर्म है| अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम्| अनुग्रह के लिये स्व (धन) का देना दान है| दान चार प्रकार का है - अन्वयदान, समदान, करुणादान और पात्र-दान|
      गोत्र में जो दान दिया जाता है वह अन्वयदान है| बेटी की विदाई के समय उसे भोगोपभोग की सामग्री आदि देना अन्वयदान कहलाता है| इससे परिजनों के मध्य प्रेम बढ़ता है| समान धर्म वालों के लिये जो दिया जाता है उसे समदान कहते हैं| चिकित्सा और शिक्षा ये दो ऐसी व्यवस्थायें हैं जिनके बिना व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता| इनमें दान देना भी समदान है| इससे आभ्यन्तर लोभ की निवृत्ति होती है| अतः दान धर्म है|
     सारी सृष्टि के दुःखी जीवों को देख कर उनके दुःखों को दूर करने के लिये जो दान या सेवा दी जाती है वह करुणादान है| जो मोक्षमार्ग में लगे हुए, पात्रता से युक्त हैं वे पात्र हैं| उत्तम, मध्यम और जघन्य के भेद से तीन प्रकार के पात्रों को दान देना पात्रदान कहलाता है|दान करने से लाभान्तराय कर्म का क्षयोपशम होता है|
      लेने के लिये अवश्य सोचना चाहिये, किन्तु देने के लिये कभी नहीं सोचना चाहिये| बादल पानी लेता है तो काला और देता है तो सफेद हो जाता है| नदियॉं सागर को पानी देती है अतः मीठी होती है, किन्तु सागर पानी लेता है अतः खारा होता है| जो जितना देता है उतना ही पाता है| जीवन में यदि सम्पदा का मात्र संग्रह ही होता रहे तो जीवन विनष्ट हो जायेगा| अतः त्यागधर्म के द्वारा जीवन में भोगों पर अनुशासन स्थापित करना अनिवार्य है|

Thursday, 8 September 2011

तपःसाधना

मनुष्य का मन चंचल तथा अधोमुखी है| मनुष्य की इन्द्रियॉं उसे निरन्तर बहिर्मुखी बना कर संसार में पतित करने में तत्पर हैं| मनुय के मन में स्थित विभाव उसे स्वकीय का दर्शनलाभ नहीं लेने देते| मोक्षमार्ग के पथिक को आत्मकल्याण करने के लिये मन, इन्द्रियों और विभावों से बचने का प्रयत्न करना पड़ता है| मन और इन्द्रियॉं प्रवृत्ति की भाषा से परिचित हैं| मोक्ष निवृत्तिपरक है| अतः चैतन्यधारा को निवृत्ति पथानुगामी बनाने के लिये मन और इन्द्रियों को निवृत्ति की भाषा सिखाने का प्रयत्न करने को उत्तम तप धर्म कहते हैं|
      मनुष्य की बाह्यप्रकृति राग-द्वेषात्मक प्रवृत्तियों को उद्भूत करती है| जब जीवन इन दूषित वृत्तियों में सिकुड़-सिमट रह जाता है, तब जीवन में वसन्त नहीं, पतझड़ आविर्भूत होता है| इससे जीवनोर्जा क्षरण को प्राप्त होती है और मनुष्य क्लान्त हो जाता है| जिस प्रकार अधोगमन स्वभाव के धारक जल को ऊर्ध्वगामी बनाने के लिये विद्युत्-यन्त्र की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार अधोगमन करने वाले मन को ऊर्ध्वगामी बनाने के लिये पुरुषार्थ-यन्त्र की आवश्यकता होती है| उसी पुरुषार्थ-यन्त्र को तप कहते हैं| तपःसाधना जीवन को नम्रता, आस्था, वत्सलता, सहनशीलता, क्षमादिक उदात्त भावनाओं से अभिसिंचित करती है| वासनाओं में वृत्ति है, कामनाओं का विकास है और सुख का आभास है| तप में तृप्ति है तथा आत्मगुणों का सुवास है| वासनायें दुःख का प्रतिनिधित्व करती हैं तो तप सौख्य का नेतृत्व करता है| जो इन्द्रिय और मन का निग्रह करता है, इच्छाओं का निरोध करता है, वही तप कर सकता है|
      सांसारिक भोगेच्छाओं का निरोध करने को तप कहते हैं| जब मन के सागर से संसार, शरीर और भोगों के प्रति इच्छा की लहरें उछलना बन्द हो जाती हैं, तब तप प्रकट होता है| तप आत्मसाक्षात्कार का मार्ग है| जिसके द्वारा आत्मविजय की प्राप्ति होती है, उसे तप कहते हैं| अहिंसा और संयम से अभिषिक्त आत्मा ही तप के योग्य होता है| कर्मों का क्षय करने के लिये जो तपा जाता है, उसे तप कहते हैं| जो इन्द्रिय और शरीर को सन्ताप देती हैं, उन क्रियाओं के सम्यक् अनुष्ठान को तप कहते हैं| दृष्टफल से निरपेक्ष होकर स्वभाव की प्राप्ति के लिये किये जाने वाले सत्प्रयत्न को तप कहते हैं अथवा वीतरागता से अनुप्राणित समस्त क्रियानुष्ठान को तप कहते हैं|
तपस्या करने वालों के द्वारा न तो शक्ति का अतिक्रमण होना चाहिये और न उपगूहन| शक्ति का अतिक्रमण करने से कषायों का जागरण होता है तथा शक्ति का उपगूहन करने से प्रमाद का जागरण होता है| प्रमाद और कषाय बृहत्तम पातक है| अतः साधक को उतना ही तप करना चाहिये, जिससे परिणामों में ग्लानता, वचनों में स्खलन तथा काया में वत-पित्त-कफ का उद्रेक न हो| शक्ति के अनुसार किया गया तप पथ्याहार की भॉंति कल्याणकारी बनता है|

Wednesday, 7 September 2011

संयम

इन्द्रियॉं साधक की मित्र भी हैं तो शत्रु भी| ये जीवन को प्रकाशित भी करती हैं तो तमसयुक्त गहन अन्धकार से सहित भी इनके द्वारा जीवन में अमृत का संचार भी होता है तो विष का प्रचार भी होता है| ये जीवन का उद्धार भी करती हैं तो संहार भी| जीवन में स्वर्ग के अवतरण के लिये जहॉं इन्द्रियों के सहयोग की अपेक्षा है, वहीं यह नरक का सृजन करने में भी सक्षम है| अतः इन्द्रियों पर आधिपत्य जमा कर उन्हें सत्प्रवृत्तियों में प्रवृत्त करने को इन्द्रियसंयम कहते हैं|
      घोड़े की सेवा करने वाला सईस कहलाता है तो घुड़सवारी करने वाला रईस कहलाता है| इन्द्रियॉं घोड़े की तरह हैं| जो उस पर सवारी करता है, वह संयमी है|
      हल्का, भारी, रूखा, चिकना, ठण्डा, गरम, कड़ा और नरम - ये स्पर्शनेन्द्रिय के आठ विषय हैं| खट्टा, मीठा, चरपरा, कडुआ और कषायला - ये रसनेन्द्रिय के पॉंच विषय हैं| सुगन्ध और दुर्गन्ध - ये घ्राणेन्द्रिय के दो विषय हैं| सफेद, काला, लाल, नीला और हरा - ये चक्षुरिन्द्रिय के पॉंच विषय हैं| षड्ज, ॠषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद - ये कर्णेन्द्रिय के सात विषय हैं| मन इन्द्रियों का सम्राट् है| इन्द्रियॉं सीमित विषयों का सेवन करती हैं, किन्तु मन का विषय असीमित है| नानाविध विकल्पजालों को बुन कर मन संसार की यात्रा कर लेता है, जबकि इन्द्रियों का क्षेत्र भी सीमित है| कर्मसिद्धान्त के अनुसार इन्द्रियों के द्वारा होने वाले आस्रव की अपेक्षा मानसिक आस्रव तीव्र एवं अधिक होता है| इन्द्रिय और मन को अपने विषयों में स्वैर प्रवृत्ति नहीं करने देने को संयम कहते हैं| जिस प्रकार संसाधनों का सत्प्रयोग समीचीन लाभ प्रदान करता है व दुरुपयोग हानि पहुँचाता है, उसी प्रकार इन्द्रियों और मन का सदुपयोग लाभ तथा दुरुपयोग हानिकारक है| इन्द्रिय और मन का सदुपयोग करना ही इन्द्रियसंयम है|
      मनुष्य केवल मरणधर्मा हाड़-मॉंस का पुतला नहीं है| मनुष्य इस सृष्टि की महानतम प्रतिकृति है| मनुष्य इस सृष्टि में परमात्मा का प्रतिनिधि है| मनुष्य जितना बड़ा है उतना ही बड़ा उसका व्यक्तित्व है और उतना ही बड़ा दायित्व एवं दृष्टिकोण है| आध्यात्मिक उत्कर्ष संयम के उच्च आदर्शों की जितनी साधनायें, सम्भावनायें तथा उच्चभूमिकायें हैं, उन सभी का स्रोत मनुष्य की ओर ही प्रवाहित होता है| जो अहिंसा, क्षमा, कर्त्तव्य आदि की धारायें हैं, उन सबका उदय, उद्गम तथा पाक-परिपाक मनुष्य जीवन में ही सम्भव है| मानव की महत्ता का मूल मानदण्ड, अन्तर्जागरण एवं आध्यात्मिक उत्कषर्न संयम की भूमिका पर ही टिका हुआ है| जिस मनुष्य में जितना अधिक संयम होगा, वह उतना ही अधिक श्रेष्ठ माना जाता है| संयम के द्वारा यह मनुष्य अनन्तकाल से आत्मा पर पड़ी हुयी मोह-ममता की धूल को उड़ा कर आत्मा को साफ करता है| संयम ही वह माध्यम है, जिसके द्वारा साधक विकार-वासनाओं से लड़ कर समस्त कर्मश्रृंखलाओं को तोड़ सकता है| इन्द्रिय, मन, बुद्धि और वचनों के संयम को प्राप्त किये बिना न लौकिक सिद्धियों की उपलब्धि हो सकती है और न पारलौकिक सिद्धियों की|
      चित्रकार जब किसी चित्र का निर्माण करता है तो उसके लिये उसे सर्वप्रथम रेखायें खींचनी पड़ती हैं| उन रेखाओं के आधार पर ही अपने मानसपटल पर अंकित चित्र को रेखांकित कर पाता है| रेखाओं का समाधार पाये बिना चित्र का सर्वांग सुन्दर एवं सुगठित सृजन नहीं हो सकता, यही स्थिति मनुष्य-जीवन के सम्बन्ध में भी है| जीवन के सुव्यवस्थित, सुगठित एवं विकासात्मक निर्माण के लिये जीव को मर्यादाओं की कुछ रेखायें डालनी पड़ती हैं| जैनसंस्कृति की भाषा में इन्हीं रेखाओं को संयम कहते हैं|
     संयम का विशद व्यापक अर्थ है - अपने ऊपर अपने द्वारा अपने नियन्त्रण को स्थापित करना| विवेकपूर्वक अपनी इच्छाओं, तृष्णामूलक अभिलाषाओं तथा पार्थिक कामनाओं पर अपने शासन की स्थापना करने को संयम कहते हैं| जीवन में नैतिकता, आध्यात्मिकता, आन्तरिक ओज एवं उद्रेचन लाने का नाम संयम है| जिसके द्वारा मनुष्य अपने अन्तर्मन को वासनाओं, इच्छाओं, भौतिक एषणाओं पर विजय प्राप्त करता है, उसे संयम कहते हैं| जिसके द्वारा साधक शरीर, इन्द्रिय और मन की दासता का परित्याग कर उनका स्वामी बनता है, उसे संयम कहते हैं| जिसको धारण करने पर जीवन का सार्वकालिक, सार्वभौमिक और सर्वतोमुखी विकास होता है, उसे संयम कहते हैं|

Monday, 5 September 2011

उत्तम आर्जव धर्म

ॠजोर्भावः आर्जवम् सरलता के भाव को आर्जव कहते हैं| जो मनस्वी कुटिलता का परित्याग कर ॠजुभावों को अंगीकृत करता है, उसके आर्जव धर्म होता है| मन में हो, वैसा ही वचनप्रयोग करना चाहिये और वचनों के अनुसार ही काया के द्वारा क्रिया करनी चाहिये| माया शल्य होने के कारण कॉंटें की तरह चुभती है| उसके प्रभाव से जीवन अशान्त हो जाता है| शान्ति प्राप्त करने के इच्छुक जीव को आर्जव का परिपालन करना चाहिये|
आर्जव धर्म को समझने के लिये कपट को समझना अत्यन्त आवश्यक है| मन में विचार कुछ, वचन से उच्चारण कुछ और काया के द्वारा क्रिया कुछ और ही करना कपट है| कपट कुटिलता को उत्पन्न करता है| कुटिलता कठिनाईयों को जागृत करती है| कुटिल व्यक्तित्व के धारक व्यक्ति से कोई मित्रता नहीं करता, बल्कि उससे दूर रहने में ही अपनी भलाई समझता है| इससे विपरीत सरल व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति को तीनों लोक में पूजा जाता है|
     तथाकथित धार्मिकता से नास्तिक व्यक्तियों की उत्पत्ति होती है| अतः जितना सरलता से धर्म साधा जा सकता है उतना ही धर्म करना चाहिये| लोक में बगुले को कपट का प्रतीक माना गया है| बगुला एक टांग पर खड़ा रह कर ध्यानस्थ दिखता है, किन्तु उसके मन में तो मछली का ध्यान रहता है कि कब मछली आये और मैं उसका भक्षण करूँ| उसके कपट के विषय में कहा जाता है -
                                       उज्ज्वल वर्ण गरीब गति, एक टांग मुख ध्यान|
                                       देखत लागत भगवत, निकट कपट की खान॥
     इसी प्रकार जिसके मन-वचन-काय में कपट झलकता हो उसका उद्धार नहीं हो सकता| आचार्य भगवन्त कहते हैं कि जो माया करता है वह तिर्यंच होता है| इसका कारण यही है कि तिर्यंच टेढ़े होते हैं और कपट भी टेढ़ेपन से युक्त होता है| अतः माया, कपट, वंचना को छोड़ कर सरलता को अंगीकार करना चाहिये|

Friday, 2 September 2011

उत्तम क्षमा

जिसके द्वारा मनुष्य का उद्धार होता है, उसे धर्म कहते हैं| उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य ये धर्मरूपी पुष्प की दस कलियॉं हैं| इन्हीं की आराधना करने के लिये पर्यूषण पर्व मनाया जाता है| उन दशधर्मों का प्राण है उत्तम क्षमा| विपरीत परिस्थितियों के आने पर भी परिणामों को विकृत नहीं होने देना क्षमाधर्म है| क्षमा के माध्यम से क्रोध कषाय पर विजय प्राप्त की जाती है| जिस प्रकार अनुप्रेक्षाओं को भावनाओं की, समिति और गुप्तियों को व्रतों की माता कहा जाता है, उसी प्रकार क्षमा समस्त धर्मों की माता है| क्षमा शब्द पृथ्वी का पर्यायवाची है| जिस प्रकार पृथ्वी अपार सहिष्णु है, उसी प्रकार मनुष्य को सहिष्णु बनना चाहिये यह क्षमाधर्म का सन्देश है| क्षमा मानव जीवन की शोभा है| क्षमा अजातशत्रु बनाने वाला मन्त्र है|
    आचार्य श्री ने कहा कि यदि कोई कुवचन बोलता है तो यही विचार करना चाहिये कि जिसकी जैसी बुद्धि है, वैसी ही वाणी होती है| ऐसा विचार करने से क्रोध का जन्म नहीं हो सकेगा| यदि कोई आपके दोषों को प्रचारित करता है तो विचार करना चाहिये कि उसके वचन सत्य हैं कि असत्य ? यदि सत्य हैं तो मुझे अपने में सुधार करना चाहिये, जिससे मैं निर्दोष हो जाऊँ| मेरे दोषों को बता कर मेरा सुधार करने वाला तो मेरा मित्र है, फिर मैं उस पर क्रोध क्यों करूँ ? यदि उसके वचन असत्य हैं तो मुझे उस पर दया करनी चाहिये कि वह नाहक ही पापकर्म कर रहा है| दया के पात्र मनुष्य पर क्रोध क्यों करें ? इस प्रकार दूसरों के विपरीत वचनों पर क्षमाभाव धारण किया जा सकता है|