Friday, 2 September 2011

उत्तम क्षमा

जिसके द्वारा मनुष्य का उद्धार होता है, उसे धर्म कहते हैं| उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य ये धर्मरूपी पुष्प की दस कलियॉं हैं| इन्हीं की आराधना करने के लिये पर्यूषण पर्व मनाया जाता है| उन दशधर्मों का प्राण है उत्तम क्षमा| विपरीत परिस्थितियों के आने पर भी परिणामों को विकृत नहीं होने देना क्षमाधर्म है| क्षमा के माध्यम से क्रोध कषाय पर विजय प्राप्त की जाती है| जिस प्रकार अनुप्रेक्षाओं को भावनाओं की, समिति और गुप्तियों को व्रतों की माता कहा जाता है, उसी प्रकार क्षमा समस्त धर्मों की माता है| क्षमा शब्द पृथ्वी का पर्यायवाची है| जिस प्रकार पृथ्वी अपार सहिष्णु है, उसी प्रकार मनुष्य को सहिष्णु बनना चाहिये यह क्षमाधर्म का सन्देश है| क्षमा मानव जीवन की शोभा है| क्षमा अजातशत्रु बनाने वाला मन्त्र है|
    आचार्य श्री ने कहा कि यदि कोई कुवचन बोलता है तो यही विचार करना चाहिये कि जिसकी जैसी बुद्धि है, वैसी ही वाणी होती है| ऐसा विचार करने से क्रोध का जन्म नहीं हो सकेगा| यदि कोई आपके दोषों को प्रचारित करता है तो विचार करना चाहिये कि उसके वचन सत्य हैं कि असत्य ? यदि सत्य हैं तो मुझे अपने में सुधार करना चाहिये, जिससे मैं निर्दोष हो जाऊँ| मेरे दोषों को बता कर मेरा सुधार करने वाला तो मेरा मित्र है, फिर मैं उस पर क्रोध क्यों करूँ ? यदि उसके वचन असत्य हैं तो मुझे उस पर दया करनी चाहिये कि वह नाहक ही पापकर्म कर रहा है| दया के पात्र मनुष्य पर क्रोध क्यों करें ? इस प्रकार दूसरों के विपरीत वचनों पर क्षमाभाव धारण किया जा सकता है|

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