Monday, 5 September 2011

उत्तम आर्जव धर्म

ॠजोर्भावः आर्जवम् सरलता के भाव को आर्जव कहते हैं| जो मनस्वी कुटिलता का परित्याग कर ॠजुभावों को अंगीकृत करता है, उसके आर्जव धर्म होता है| मन में हो, वैसा ही वचनप्रयोग करना चाहिये और वचनों के अनुसार ही काया के द्वारा क्रिया करनी चाहिये| माया शल्य होने के कारण कॉंटें की तरह चुभती है| उसके प्रभाव से जीवन अशान्त हो जाता है| शान्ति प्राप्त करने के इच्छुक जीव को आर्जव का परिपालन करना चाहिये|
आर्जव धर्म को समझने के लिये कपट को समझना अत्यन्त आवश्यक है| मन में विचार कुछ, वचन से उच्चारण कुछ और काया के द्वारा क्रिया कुछ और ही करना कपट है| कपट कुटिलता को उत्पन्न करता है| कुटिलता कठिनाईयों को जागृत करती है| कुटिल व्यक्तित्व के धारक व्यक्ति से कोई मित्रता नहीं करता, बल्कि उससे दूर रहने में ही अपनी भलाई समझता है| इससे विपरीत सरल व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति को तीनों लोक में पूजा जाता है|
     तथाकथित धार्मिकता से नास्तिक व्यक्तियों की उत्पत्ति होती है| अतः जितना सरलता से धर्म साधा जा सकता है उतना ही धर्म करना चाहिये| लोक में बगुले को कपट का प्रतीक माना गया है| बगुला एक टांग पर खड़ा रह कर ध्यानस्थ दिखता है, किन्तु उसके मन में तो मछली का ध्यान रहता है कि कब मछली आये और मैं उसका भक्षण करूँ| उसके कपट के विषय में कहा जाता है -
                                       उज्ज्वल वर्ण गरीब गति, एक टांग मुख ध्यान|
                                       देखत लागत भगवत, निकट कपट की खान॥
     इसी प्रकार जिसके मन-वचन-काय में कपट झलकता हो उसका उद्धार नहीं हो सकता| आचार्य भगवन्त कहते हैं कि जो माया करता है वह तिर्यंच होता है| इसका कारण यही है कि तिर्यंच टेढ़े होते हैं और कपट भी टेढ़ेपन से युक्त होता है| अतः माया, कपट, वंचना को छोड़ कर सरलता को अंगीकार करना चाहिये|

No comments:

Post a Comment