Wednesday, 7 September 2011

संयम

इन्द्रियॉं साधक की मित्र भी हैं तो शत्रु भी| ये जीवन को प्रकाशित भी करती हैं तो तमसयुक्त गहन अन्धकार से सहित भी इनके द्वारा जीवन में अमृत का संचार भी होता है तो विष का प्रचार भी होता है| ये जीवन का उद्धार भी करती हैं तो संहार भी| जीवन में स्वर्ग के अवतरण के लिये जहॉं इन्द्रियों के सहयोग की अपेक्षा है, वहीं यह नरक का सृजन करने में भी सक्षम है| अतः इन्द्रियों पर आधिपत्य जमा कर उन्हें सत्प्रवृत्तियों में प्रवृत्त करने को इन्द्रियसंयम कहते हैं|
      घोड़े की सेवा करने वाला सईस कहलाता है तो घुड़सवारी करने वाला रईस कहलाता है| इन्द्रियॉं घोड़े की तरह हैं| जो उस पर सवारी करता है, वह संयमी है|
      हल्का, भारी, रूखा, चिकना, ठण्डा, गरम, कड़ा और नरम - ये स्पर्शनेन्द्रिय के आठ विषय हैं| खट्टा, मीठा, चरपरा, कडुआ और कषायला - ये रसनेन्द्रिय के पॉंच विषय हैं| सुगन्ध और दुर्गन्ध - ये घ्राणेन्द्रिय के दो विषय हैं| सफेद, काला, लाल, नीला और हरा - ये चक्षुरिन्द्रिय के पॉंच विषय हैं| षड्ज, ॠषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद - ये कर्णेन्द्रिय के सात विषय हैं| मन इन्द्रियों का सम्राट् है| इन्द्रियॉं सीमित विषयों का सेवन करती हैं, किन्तु मन का विषय असीमित है| नानाविध विकल्पजालों को बुन कर मन संसार की यात्रा कर लेता है, जबकि इन्द्रियों का क्षेत्र भी सीमित है| कर्मसिद्धान्त के अनुसार इन्द्रियों के द्वारा होने वाले आस्रव की अपेक्षा मानसिक आस्रव तीव्र एवं अधिक होता है| इन्द्रिय और मन को अपने विषयों में स्वैर प्रवृत्ति नहीं करने देने को संयम कहते हैं| जिस प्रकार संसाधनों का सत्प्रयोग समीचीन लाभ प्रदान करता है व दुरुपयोग हानि पहुँचाता है, उसी प्रकार इन्द्रियों और मन का सदुपयोग लाभ तथा दुरुपयोग हानिकारक है| इन्द्रिय और मन का सदुपयोग करना ही इन्द्रियसंयम है|
      मनुष्य केवल मरणधर्मा हाड़-मॉंस का पुतला नहीं है| मनुष्य इस सृष्टि की महानतम प्रतिकृति है| मनुष्य इस सृष्टि में परमात्मा का प्रतिनिधि है| मनुष्य जितना बड़ा है उतना ही बड़ा उसका व्यक्तित्व है और उतना ही बड़ा दायित्व एवं दृष्टिकोण है| आध्यात्मिक उत्कर्ष संयम के उच्च आदर्शों की जितनी साधनायें, सम्भावनायें तथा उच्चभूमिकायें हैं, उन सभी का स्रोत मनुष्य की ओर ही प्रवाहित होता है| जो अहिंसा, क्षमा, कर्त्तव्य आदि की धारायें हैं, उन सबका उदय, उद्गम तथा पाक-परिपाक मनुष्य जीवन में ही सम्भव है| मानव की महत्ता का मूल मानदण्ड, अन्तर्जागरण एवं आध्यात्मिक उत्कषर्न संयम की भूमिका पर ही टिका हुआ है| जिस मनुष्य में जितना अधिक संयम होगा, वह उतना ही अधिक श्रेष्ठ माना जाता है| संयम के द्वारा यह मनुष्य अनन्तकाल से आत्मा पर पड़ी हुयी मोह-ममता की धूल को उड़ा कर आत्मा को साफ करता है| संयम ही वह माध्यम है, जिसके द्वारा साधक विकार-वासनाओं से लड़ कर समस्त कर्मश्रृंखलाओं को तोड़ सकता है| इन्द्रिय, मन, बुद्धि और वचनों के संयम को प्राप्त किये बिना न लौकिक सिद्धियों की उपलब्धि हो सकती है और न पारलौकिक सिद्धियों की|
      चित्रकार जब किसी चित्र का निर्माण करता है तो उसके लिये उसे सर्वप्रथम रेखायें खींचनी पड़ती हैं| उन रेखाओं के आधार पर ही अपने मानसपटल पर अंकित चित्र को रेखांकित कर पाता है| रेखाओं का समाधार पाये बिना चित्र का सर्वांग सुन्दर एवं सुगठित सृजन नहीं हो सकता, यही स्थिति मनुष्य-जीवन के सम्बन्ध में भी है| जीवन के सुव्यवस्थित, सुगठित एवं विकासात्मक निर्माण के लिये जीव को मर्यादाओं की कुछ रेखायें डालनी पड़ती हैं| जैनसंस्कृति की भाषा में इन्हीं रेखाओं को संयम कहते हैं|
     संयम का विशद व्यापक अर्थ है - अपने ऊपर अपने द्वारा अपने नियन्त्रण को स्थापित करना| विवेकपूर्वक अपनी इच्छाओं, तृष्णामूलक अभिलाषाओं तथा पार्थिक कामनाओं पर अपने शासन की स्थापना करने को संयम कहते हैं| जीवन में नैतिकता, आध्यात्मिकता, आन्तरिक ओज एवं उद्रेचन लाने का नाम संयम है| जिसके द्वारा मनुष्य अपने अन्तर्मन को वासनाओं, इच्छाओं, भौतिक एषणाओं पर विजय प्राप्त करता है, उसे संयम कहते हैं| जिसके द्वारा साधक शरीर, इन्द्रिय और मन की दासता का परित्याग कर उनका स्वामी बनता है, उसे संयम कहते हैं| जिसको धारण करने पर जीवन का सार्वकालिक, सार्वभौमिक और सर्वतोमुखी विकास होता है, उसे संयम कहते हैं|

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