Thursday, 8 September 2011

तपःसाधना

मनुष्य का मन चंचल तथा अधोमुखी है| मनुष्य की इन्द्रियॉं उसे निरन्तर बहिर्मुखी बना कर संसार में पतित करने में तत्पर हैं| मनुय के मन में स्थित विभाव उसे स्वकीय का दर्शनलाभ नहीं लेने देते| मोक्षमार्ग के पथिक को आत्मकल्याण करने के लिये मन, इन्द्रियों और विभावों से बचने का प्रयत्न करना पड़ता है| मन और इन्द्रियॉं प्रवृत्ति की भाषा से परिचित हैं| मोक्ष निवृत्तिपरक है| अतः चैतन्यधारा को निवृत्ति पथानुगामी बनाने के लिये मन और इन्द्रियों को निवृत्ति की भाषा सिखाने का प्रयत्न करने को उत्तम तप धर्म कहते हैं|
      मनुष्य की बाह्यप्रकृति राग-द्वेषात्मक प्रवृत्तियों को उद्भूत करती है| जब जीवन इन दूषित वृत्तियों में सिकुड़-सिमट रह जाता है, तब जीवन में वसन्त नहीं, पतझड़ आविर्भूत होता है| इससे जीवनोर्जा क्षरण को प्राप्त होती है और मनुष्य क्लान्त हो जाता है| जिस प्रकार अधोगमन स्वभाव के धारक जल को ऊर्ध्वगामी बनाने के लिये विद्युत्-यन्त्र की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार अधोगमन करने वाले मन को ऊर्ध्वगामी बनाने के लिये पुरुषार्थ-यन्त्र की आवश्यकता होती है| उसी पुरुषार्थ-यन्त्र को तप कहते हैं| तपःसाधना जीवन को नम्रता, आस्था, वत्सलता, सहनशीलता, क्षमादिक उदात्त भावनाओं से अभिसिंचित करती है| वासनाओं में वृत्ति है, कामनाओं का विकास है और सुख का आभास है| तप में तृप्ति है तथा आत्मगुणों का सुवास है| वासनायें दुःख का प्रतिनिधित्व करती हैं तो तप सौख्य का नेतृत्व करता है| जो इन्द्रिय और मन का निग्रह करता है, इच्छाओं का निरोध करता है, वही तप कर सकता है|
      सांसारिक भोगेच्छाओं का निरोध करने को तप कहते हैं| जब मन के सागर से संसार, शरीर और भोगों के प्रति इच्छा की लहरें उछलना बन्द हो जाती हैं, तब तप प्रकट होता है| तप आत्मसाक्षात्कार का मार्ग है| जिसके द्वारा आत्मविजय की प्राप्ति होती है, उसे तप कहते हैं| अहिंसा और संयम से अभिषिक्त आत्मा ही तप के योग्य होता है| कर्मों का क्षय करने के लिये जो तपा जाता है, उसे तप कहते हैं| जो इन्द्रिय और शरीर को सन्ताप देती हैं, उन क्रियाओं के सम्यक् अनुष्ठान को तप कहते हैं| दृष्टफल से निरपेक्ष होकर स्वभाव की प्राप्ति के लिये किये जाने वाले सत्प्रयत्न को तप कहते हैं अथवा वीतरागता से अनुप्राणित समस्त क्रियानुष्ठान को तप कहते हैं|
तपस्या करने वालों के द्वारा न तो शक्ति का अतिक्रमण होना चाहिये और न उपगूहन| शक्ति का अतिक्रमण करने से कषायों का जागरण होता है तथा शक्ति का उपगूहन करने से प्रमाद का जागरण होता है| प्रमाद और कषाय बृहत्तम पातक है| अतः साधक को उतना ही तप करना चाहिये, जिससे परिणामों में ग्लानता, वचनों में स्खलन तथा काया में वत-पित्त-कफ का उद्रेक न हो| शक्ति के अनुसार किया गया तप पथ्याहार की भॉंति कल्याणकारी बनता है|

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