Wednesday, 21 September 2011

उत्तम त्याग धर्म

संसार, शरीर और भोगों से उदासीन होने का नाम त्यागधर्म है अथवा सुपात्रों को आहार, शास्त्र, औषधि और अभय देना त्यागधर्म है| अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम्| अनुग्रह के लिये स्व (धन) का देना दान है| दान चार प्रकार का है - अन्वयदान, समदान, करुणादान और पात्र-दान|
      गोत्र में जो दान दिया जाता है वह अन्वयदान है| बेटी की विदाई के समय उसे भोगोपभोग की सामग्री आदि देना अन्वयदान कहलाता है| इससे परिजनों के मध्य प्रेम बढ़ता है| समान धर्म वालों के लिये जो दिया जाता है उसे समदान कहते हैं| चिकित्सा और शिक्षा ये दो ऐसी व्यवस्थायें हैं जिनके बिना व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता| इनमें दान देना भी समदान है| इससे आभ्यन्तर लोभ की निवृत्ति होती है| अतः दान धर्म है|
     सारी सृष्टि के दुःखी जीवों को देख कर उनके दुःखों को दूर करने के लिये जो दान या सेवा दी जाती है वह करुणादान है| जो मोक्षमार्ग में लगे हुए, पात्रता से युक्त हैं वे पात्र हैं| उत्तम, मध्यम और जघन्य के भेद से तीन प्रकार के पात्रों को दान देना पात्रदान कहलाता है|दान करने से लाभान्तराय कर्म का क्षयोपशम होता है|
      लेने के लिये अवश्य सोचना चाहिये, किन्तु देने के लिये कभी नहीं सोचना चाहिये| बादल पानी लेता है तो काला और देता है तो सफेद हो जाता है| नदियॉं सागर को पानी देती है अतः मीठी होती है, किन्तु सागर पानी लेता है अतः खारा होता है| जो जितना देता है उतना ही पाता है| जीवन में यदि सम्पदा का मात्र संग्रह ही होता रहे तो जीवन विनष्ट हो जायेगा| अतः त्यागधर्म के द्वारा जीवन में भोगों पर अनुशासन स्थापित करना अनिवार्य है|

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