Wednesday, 21 September 2011

आकिंचन्य धर्म

परि = चारों ओर से, ग्रह = पकड़ना, जकड़ना, दुःख देना, पीड़ा देना| जो चारों ओर से जकड़े, दुःख दे वह परिग्रह है| दस प्रकार के बाह्य और चौदह प्रकार के आभ्यन्तर इस प्रकार चौबीस प्रकार के परिग्रहों से रहित होकर और सुख-दुःख देने वाले कर्मजनित भावों को रोक कर निज स्वभाव में रहने का नाम आकिंचन्य है| उपात्त शरीरादिकों में भी ये मेरा नहीं है ऐसी भावना भाना आकिंचन्य धर्म है| यह धर्म जीव को निःसंग और निश्‍चिन्त बनाता है|
      परिग्रह के दो भेद हैं - बाह्य और आभ्यन्तर| बाह्य वस्तु मूर्च्छा में कारण होने से परिग्रह है न कि बाह्य वस्तु स्वयं परिग्रह है| सम्पन्नता होते हुए भी उसमें मूर्च्छा का नहीं होना आकिंचन्य है| छोड़ना और ग्रहण करना इनका तथ्य समझ में आ जाये तो त्याग और आकिंचन्य को समझा जा सकता है| सम्बन्ध जोड़ने का कार्य बुरा नहीं, लेकिन उसमें तटस्थ भाव रखना आकिंचन्य है| बेटी अपनी होते हुए भी वह परायी अमानत है ऐसा विरक्तिरूप भाव आकिंचन्य है| आकिंचन्य धर्म व्यक्ति को वस्तु से भिन्न रहना सिखाता है, जल में स्थित कमल की तरह|
      संसार की समस्त वस्तुयें नश्‍वर हैं, रिश्ता टूटने के लिये जुड़ा है ऐसा चिन्तन वस्तु के प्रति मोह (राग) उत्पन्न नहीं होने देगा| जिस प्रकार छोटे-से-छोटा कॉंटा शरीर में दुःख उत्पन्न कर देता है, उसी प्रकार छोटी-सी चाह भी शरीर को दुःख देती है| जो चाह से रहित होता है वह सब पर राज करता है| संसार भावना का चिन्तन और आकिंचन्य धर्म का पालन विपरीत परस्थितियों में स्थिरता प्रदान करने में कारणीभूत है| आज तक परिग्रह ने किसी को सुखी नहीं किया| अतः परिग्रह को छोड़ने में भूषण मानना चाहिये, जोड़ने में नहीं|

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