पॉंचों इन्द्रियों के विषयों से विरक्त होने का नाम ब्रह्मचर्य है| इस व्रत को धारण करने वाले साधक स्त्री-पुरुषों के परस्पर रागजन्य सम्बन्धों से विरक्त रहते हैं और निश्चय से पदार्थमात्र के विकल्पों का त्याग करके आत्मस्वभाव में स्थिर रहते हैं| जिन्हें किसी भी प्रकार के सांसारिक सुखों की इच्छा नहीं होती, वे ही इस दुर्द्धर व्रत को धारण कर सकते हैं| भोग्यपदार्थ की ओर झुका हुआ पुरुष दास बन कर रह जाता है| ब्रह्मचर्य का परिपालन करने वाला दास नहीं, स्वामी होता है|
ब्रह्मचर्य अमरत्व की साधना है| शारीरिक विकास करने के लिये धर्ममार्ग में अनेक प्रकार की साधनायें बतलायी गयी हैं| उन साधनाओं में ब्रह्मचर्य प्रमुख है, ब्रह्मचर्यव्रत परिवार का मुखिया है| ब्रह्मचयर्र् ही सच्चा विघ्न-विनाशक है, क्योंकि उसकी सन्निधि में कोई विघ्न कायम नहीं रख सकता| गुरु मार्गदृष्टा और गौरवशाली होते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य मार्गदृष्टा और गौरवशाली होने से वह भी गुरु है|
ब्रह्मचर्य की सुगन्ध के समान सुगन्ध संसार के पुष्पों में कहॉं ? पुष्पों का सौरभ तो हवा के रुख का आवागमन करती हैं, किन्तु ब्रह्मचर्य की सुगन्ध दशों दिशाओं में फैल जाती है| ब्रह्मचर्य के बिना मन्त्र, तन्त्र, अध्यनन, दया तथा साधनों में प्रगति नहीं हो सकती| शारीरिक वर्चस्व, बौद्धिक प्रतिभा, प्रतिभाशाली वक्तृत्व, कला-कौशल आदि लौकिक अभ्युदय के लिये ब्रह्मचर्य अत्यन्त आवश्यक है| आध्यात्मिक साधना की सिद्धि के लिये ब्रह्मचर्य से उत्तम साधन दूसरा नहीं होता| ब्रह्मचर्य की तुलना सूर्य के साथ की जा सकती है| जैसे सूर्य ग्रह और उपग्रहों का केन्द्र है, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य समस्त सद्गुणों का केन्द्र है| ब्रह्मचर्य के परिपालन से मनुषय का मन निर्विकार होता है और निर्विकार मन ही परमतत्त्व का घर है| इससे पे्रम व्यापक हो जाता है, यही व्यापकता जीवन का प्राप्तव्य है|
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