Wednesday, 26 October 2011

जैनधर्म और दीपावली

    कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी के अपररात्रिक काल में अर्थात् अमावस्या के दिन वर्तमानकालीन चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर को निर्वाणसुख की प्राप्ति हुयी थी| उसी दिन सायंकाल में गणाधिपति इन्द्रभूति अर्थात् गौतम गणधर को केवलज्ञान की प्राप्ति हुयी थी| मनुष्य, विद्याधर और देवों ने इस पावन बेला में दीप जला कर उत्सव मनाया था| आज भी इस अवसर पर जैनलोग उत्सव मनाते हैं| अतः दीपावली जैनपर्व के रूप में विख्यात है|

Tuesday, 25 October 2011

धर्मों के नामों में ऐक्य

धर्मों के नामों पर ध्यान दें तो भी एकत्व का बोध होता है| देखो,
१. जैन = इस शब्द की परिभाषा करते समय जैनाचार्यों ने कहा है -
रागद्वेषादि अरिन् जयतीति जिनः तस्योपासकः जैनः|
अर्थात् ः- जिन्होंने राग-द्वेषादि शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली है, वे जिन हैं| जो जिन की उपासना करते हैं, वे जैन हैं|
भारतीयसंस्कृति का कोई भी अंग (धर्म) भगवान को रागी, द्वेषी नहीं मानता| सभी लोग यही मानते हैं कि राग, द्वेष, काम-क्रोधादि भाव स्वभाव का विकार है| जब तक विभाव भावों का अभाव नहीं होता, कोई परमात्मा नहीं बनता| उसकी उपासना नहीं हो सकती| अत एव मान्यता की अपेक्षा से सभी जैन हैं, यह सिद्ध होता है|
२. ब्राह्मण = जो ब्रह्म की पूजा करे, वह ब्राह्मण है| ब्रह्म शब्द के अनेक अर्थ हैं| जैसे-वेद, सत्य, तप, तत्त्वज्ञानमय परमात्मा, आनन्दस्वरूप आत्मा आदि|
इस शब्द का व्युत्पत्यर्थ है - हिंसाया दूनोति स हिन्दूः|  अर्थात् ः- जो हिंसा से दूर रहे वह हिन्दू है|
हिंसा को किसी भी धर्म ने स्वीकार नहीं किया| समस्त तत्त्वचिन्तकों ने कहा कि अपने प्राणों की तरह अन्य जीवों के प्राण भी प्राण हैं, तुम जीना चाहते हो, वैसे वे भी जीना चाहते हैं| अत एव तुम्हें दूसरों के प्राणहरण करने का अधिकार नहीं है| तुम हिंसा मत करो| अत एव सभी लोग हिन्दू हैं|
४. मुसलमान = धान आदि कूटने का साधन होती है मुसल| मुसल टूटती नहीं और झुकती भी नहीं है| वैसे ही जिसका मान (सम्मान) हो, वह है मुसलमान| मुसलमान का अर्थ है - अपनी आन के लिये, अपनी शान के लिये, अपने सम्मान के लिये जो मरने तक तैयार हो जाये| आपमें से कौन आदमी ऐसा है जो अपमान को प्रतिकार किये बिना चुपचाप सह लेगा? शिवाजी जैसे मराठा राजा व राणा प्रताप जैसे राजपूत सम्राट् विशाल शत्रुसेना के साथ अपने सम्मान के लिये ल़ड़ते रहे| उनके आदर्श पर चलने की इच्छा रखने वाले आपमें से कितने लोग अपमान का कड़वा घूँट पी लेंगे? कोई भी नहीं ना ! फिर तो सभी मुसलमान हो गये|
५. बौद्ध = बुद्ध अर्थात् ज्ञानी, बुद्धों की जो पूजा करे, उपासना करे, वह बौद्ध है| सभी लोगों ने अपने आराध्य परमात्मा को परमज्ञानी, सर्वज्ञ माना है| अत एव सभी बौद्ध हैं - ऐसा सिद्ध हुआ|

Monday, 10 October 2011

प्रेम समस्त साधनाओं का सार है

प्रेम आत्मा की परम पावन अनुभूति है| प्रेम परमार्थसाधना है| प्रेम जीवन का अमृत है| इससे चेतना दिव्य तो ऊर्जा ऊर्ध्वमुखी होती है| अपने समान अन्य आत्माओं को स्वीकार कर सबका सन्मान करना, सबके प्रति निश्‍चल और निश्छल वात्सल्य वर्षा करना प्रेम का धर्म है| प्रेम अनुत्तर है| समस्त धर्मों का सार प्रेम ही है| जिसने प्रेम को जाना, उसने अध्यात्म के समस्त सारभूत तत्त्वों को जान लिया| मनुष्य मेंं विद्यमान रहने वाले सारे गुण नदियों की तरह है और प्रेम उन सद्गुणों का पुंजीभूत सागर है| प्रेम मन को उदात्त और शरीर को सशक्त बनाता है| प्रेम के कारण वसुधैव कुटुम्बकम् की साधना फलीभूत होती है| आत्मीयता का विस्तार बिना प्रेम के सम्भव नहीं है|
      जिस घट में मन में प्रेम नहीं होता, वह घट मन मरघट के समान है| प्रेमज्योति अलौकिक है| इसमें अनुताप नहीं होता, यह झंझावातों से बुझता नहीं है| दिव्य चिन्तामणि रत्न की शीतल कान्ति की तरह स्निग्ध, सन्तापहारी और मनमोहक कान्ति प्रेमदीपक की होती है| प्रेम ऐसा दिव्यमन्त्र है कि वह केवल अपने आश्रय को ही नहीं, अपितु अपनी सन्निधि में आने वाले जीवों को भी निर्मल, शीतल और शान्त बना देता है| प्रेम के बिना सच्चिदानन्दत्व की प्राप्ति असम्भव है| 
      लोग प्रेम और मोह को एक मानने की भूल करते हैं| मोह जड़ से सम्बन्ध रखता है तो प्रेम चेतन से रिश्ता बनाता है| मोह विभेद कराता है तो प्रेम अभेद में स्थिर करता है| मोह में अन्धत्व होता है तो प्रेम में आत्मवत् सर्वभूतेषु की दिव्यदृष्टि होती है| प्रेम सीमित से असीमित बनने की अनिर्वचनीय साधना है| प्रेम काया है तो मोह छाया है|प्रेम गंगाजल की तरह पवित्र होता है| इसे कहीं भी डालो, पवित्रता का ही निर्माण करता है| उसमें आदर्शों की अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है| प्रेम के साथ विवेकशीलता, सुहृदयता, पवित्रता, सदाशयता और वासनारहितता आदि गुणों का गठजोड़ है| प्रेम के कारण मनुष्य की भाव-संवेदनायें नित्य-निरन्तर उच्चस्तरीय आदर्शों के प्रति समर्पित रहती है| प्रेम उम्र, जाति और वैभवादि की सीमा में आबद्ध नहीं होता| प्रेम सूर्य की तरह है| जिस प्रकार सूर्य उदयकाल में मात्र प्राची को ही प्रकाशित करता है, उसी प्रकार प्रेम उदयकाल में इष्टमित्रों का अनुचरण करता है| जिस प्रकार सूर्य मध्याह्नकाल में सारे संसार को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार प्रेम विश्‍वव्यापी हो जाता है| प्रेम ही मोक्ष का पन्थ है|