धर्मों के नामों पर ध्यान दें तो भी एकत्व का बोध होता है| देखो,
१. जैन = इस शब्द की परिभाषा करते समय जैनाचार्यों ने कहा है -
रागद्वेषादि अरिन् जयतीति जिनः तस्योपासकः जैनः|
अर्थात् ः- जिन्होंने राग-द्वेषादि शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली है, वे जिन हैं| जो जिन की उपासना करते हैं, वे जैन हैं|
भारतीयसंस्कृति का कोई भी अंग (धर्म) भगवान को रागी, द्वेषी नहीं मानता| सभी लोग यही मानते हैं कि राग, द्वेष, काम-क्रोधादि भाव स्वभाव का विकार है| जब तक विभाव भावों का अभाव नहीं होता, कोई परमात्मा नहीं बनता| उसकी उपासना नहीं हो सकती| अत एव मान्यता की अपेक्षा से सभी जैन हैं, यह सिद्ध होता है|
२. ब्राह्मण = जो ब्रह्म की पूजा करे, वह ब्राह्मण है| ब्रह्म शब्द के अनेक अर्थ हैं| जैसे-वेद, सत्य, तप, तत्त्वज्ञानमय परमात्मा, आनन्दस्वरूप आत्मा आदि|
इस शब्द का व्युत्पत्यर्थ है - हिंसाया दूनोति स हिन्दूः| अर्थात् ः- जो हिंसा से दूर रहे वह हिन्दू है|
हिंसा को किसी भी धर्म ने स्वीकार नहीं किया| समस्त तत्त्वचिन्तकों ने कहा कि अपने प्राणों की तरह अन्य जीवों के प्राण भी प्राण हैं, तुम जीना चाहते हो, वैसे वे भी जीना चाहते हैं| अत एव तुम्हें दूसरों के प्राणहरण करने का अधिकार नहीं है| तुम हिंसा मत करो| अत एव सभी लोग हिन्दू हैं|
४. मुसलमान = धान आदि कूटने का साधन होती है मुसल| मुसल टूटती नहीं और झुकती भी नहीं है| वैसे ही जिसका मान (सम्मान) हो, वह है मुसलमान| मुसलमान का अर्थ है - अपनी आन के लिये, अपनी शान के लिये, अपने सम्मान के लिये जो मरने तक तैयार हो जाये| आपमें से कौन आदमी ऐसा है जो अपमान को प्रतिकार किये बिना चुपचाप सह लेगा? शिवाजी जैसे मराठा राजा व राणा प्रताप जैसे राजपूत सम्राट् विशाल शत्रुसेना के साथ अपने सम्मान के लिये ल़ड़ते रहे| उनके आदर्श पर चलने की इच्छा रखने वाले आपमें से कितने लोग अपमान का कड़वा घूँट पी लेंगे? कोई भी नहीं ना ! फिर तो सभी मुसलमान हो गये|
५. बौद्ध = बुद्ध अर्थात् ज्ञानी, बुद्धों की जो पूजा करे, उपासना करे, वह बौद्ध है| सभी लोगों ने अपने आराध्य परमात्मा को परमज्ञानी, सर्वज्ञ माना है| अत एव सभी बौद्ध हैं - ऐसा सिद्ध हुआ|
१. जैन = इस शब्द की परिभाषा करते समय जैनाचार्यों ने कहा है -
रागद्वेषादि अरिन् जयतीति जिनः तस्योपासकः जैनः|
अर्थात् ः- जिन्होंने राग-द्वेषादि शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली है, वे जिन हैं| जो जिन की उपासना करते हैं, वे जैन हैं|
भारतीयसंस्कृति का कोई भी अंग (धर्म) भगवान को रागी, द्वेषी नहीं मानता| सभी लोग यही मानते हैं कि राग, द्वेष, काम-क्रोधादि भाव स्वभाव का विकार है| जब तक विभाव भावों का अभाव नहीं होता, कोई परमात्मा नहीं बनता| उसकी उपासना नहीं हो सकती| अत एव मान्यता की अपेक्षा से सभी जैन हैं, यह सिद्ध होता है|
२. ब्राह्मण = जो ब्रह्म की पूजा करे, वह ब्राह्मण है| ब्रह्म शब्द के अनेक अर्थ हैं| जैसे-वेद, सत्य, तप, तत्त्वज्ञानमय परमात्मा, आनन्दस्वरूप आत्मा आदि|
इस शब्द का व्युत्पत्यर्थ है - हिंसाया दूनोति स हिन्दूः| अर्थात् ः- जो हिंसा से दूर रहे वह हिन्दू है|
हिंसा को किसी भी धर्म ने स्वीकार नहीं किया| समस्त तत्त्वचिन्तकों ने कहा कि अपने प्राणों की तरह अन्य जीवों के प्राण भी प्राण हैं, तुम जीना चाहते हो, वैसे वे भी जीना चाहते हैं| अत एव तुम्हें दूसरों के प्राणहरण करने का अधिकार नहीं है| तुम हिंसा मत करो| अत एव सभी लोग हिन्दू हैं|
४. मुसलमान = धान आदि कूटने का साधन होती है मुसल| मुसल टूटती नहीं और झुकती भी नहीं है| वैसे ही जिसका मान (सम्मान) हो, वह है मुसलमान| मुसलमान का अर्थ है - अपनी आन के लिये, अपनी शान के लिये, अपने सम्मान के लिये जो मरने तक तैयार हो जाये| आपमें से कौन आदमी ऐसा है जो अपमान को प्रतिकार किये बिना चुपचाप सह लेगा? शिवाजी जैसे मराठा राजा व राणा प्रताप जैसे राजपूत सम्राट् विशाल शत्रुसेना के साथ अपने सम्मान के लिये ल़ड़ते रहे| उनके आदर्श पर चलने की इच्छा रखने वाले आपमें से कितने लोग अपमान का कड़वा घूँट पी लेंगे? कोई भी नहीं ना ! फिर तो सभी मुसलमान हो गये|
५. बौद्ध = बुद्ध अर्थात् ज्ञानी, बुद्धों की जो पूजा करे, उपासना करे, वह बौद्ध है| सभी लोगों ने अपने आराध्य परमात्मा को परमज्ञानी, सर्वज्ञ माना है| अत एव सभी बौद्ध हैं - ऐसा सिद्ध हुआ|
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