Saturday, 12 May 2012

२४ वॉं दीक्षादिवस सम्पन्न


पैठण ः- परम पूज्य चारित्र-चक्रवर्ती, आचार्यश्री आदिसागर जी महाराज (अंकलीकर) की सुविशुद्ध परम्परा के तृतीय पट्टाधीश परम पूज्य सिद्धान्त-चक्रवर्ती, आचार्यश्री सन्मतिसागर जी महाराज के उत्तराधिकारी परम पूज्य तपश्‍चर्या-चक्रवर्ती, आचार्यश्री सुविधिसागर जी महाराज का चौबीसवॉं दीक्षादिवस दिनांक ११-५-२०१२ को अतिशय क्षेत्र पैठण में सानन्द सम्पन्न हुआ|
इस अवसर पर प्रातः दस बजे विनयाजंलि सभा का आयोजन किया गया था| इस सभा का प्रारम्भ श्रीमती कंचनमाला कासलीवाल (नासिक) के द्वारा गाये गये मधुर मंगलाचरण के माध्यम से हुआ| बाहर से पधारे हुए गणमान्य श्रावकबन्धुओं ने गुरुजनों की चरणपादुका के समक्ष मंगल दीप को प्रज्वलित किया| ब्रह्मचारी श्री रवि जैन ने मानव जीवन में गुरु की आवश्यकता इस विषय पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया|
तदुपरान्त आचार्यश्री के पादप्रक्षालन एवं पूजन का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ| ब्रह्मचारिणी निर्मला लुहाड़िया ने आचार्यश्री और उनके संघस्थ साधुओं को शास्त्रभेंट किये|
पूज्या गणिनी-आर्यिकाश्री सुविधिमती माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि आचार्यश्री का चौबीसवॉं दीक्षा मनाने हेतु हम सभी एकत्रित हुए हैं| आचार्यश्री आदर्श के हिमालय हैं| छोटी-सी आयु में उन्होंने जिन उपलब्धियों को प्राप्त किया है, वह दुर्लभ है| आचार्यश्री सुविधिसागर जी महाराज का जीवन वटवृक्ष के समान है| जिस प्रकार वटवृक्ष एक छोटे से बीज से अपनी यात्रा प्रारम्भ कर विशालरूप धारण करता है, उसी प्रकार आचार्यश्री ने ब्रह्मचारी पद से अपनी यात्रा प्रारम्भ कर पट्टाचार्यत्व का पद प्राप्त किया| जिस प्रकार वटवृक्ष अनेक पक्षियों का आश्रयदाता है, उसी प्रकार आचार्यश्री अनेक शिष्यों के आश्रयदाता है और जिस प्रकार वटवृक्ष अनेक पथिकों को छाया और शीतलता प्रदान करता है, उसी प्रकार आचार्यश्री भव्य जीवों को अपनी शरण और आशीर्वाद प्रदान करते हैं|
आचार्यश्री अपनी श्रमणचर्या के परिपालन में जितने कठोर हैं, भक्तों व शिष्यों पर अनुशासन करने में उतने ही कोमल हैं| वे कर्मों का विनाश करने में जितने निष्ठुर हैं, भव्यों का उपकार करने में उतने ही दयाशाली हैं|
परम पूज्य परम्पराचार्यश्री सुविधिसागर जी महाराज ने अपने आशीर्वचन में कहा कि पूर्व जन्म में अर्जित कर्मों के प्रभाव के रूप में वासनायें अवचेतन मन में पड़ी रहती है| उसी के कारण मन में वैकारिक-भाव और तन में विकृतिजन्य कर्म उत्पन्न होते हैं| जैसे ग्रामोफोन के रिकार्ड में कटे हुए खॉंचों में से ध्वनियों का उद्गम होता है, उसी प्रकार वासनाओं से नानाविध कामनाओं का उद्गम होता है| वासनासहित मन मनुष्य का दुर्दान्त शत्रु है, क्योंकि वह मनुष्य को कुकर्म करने के लिये प्रेरित करता है|
वासनायें कर्मों के द्वारा अभिव्यक्त होती है तथा बुरे व्यक्तित्व का निर्माण करती है| वासनात्मक वृत्तियों मन में फेन की तरह इच्छाओं को जन्म देती है, जिससे मनुष्य का मन भ्रान्त और जीवन अशान्त बन जाता है| अशान्त मन से कभी धर्मकार्य सम्पन्न नहीं हो सकता| वासनायें जब मन पर हावी हो जाती है, तब मनुष्य जीवनसागर में परित्यक्त नौका की भॉंति विपदाओं की उन्नति लहरों में फँस जाता है|
मनुष्य और बुद्धत्व के मध्य वासनाओं की मजबूत दीवार बन चुकी है| उस दीवार को गिराये बिना मनुष्य परमात्मा नहीं हो सकता| मनुष्य अज्ञानता के कारण बाह्य जगत् को संवारना चाहता है| उसी में वह सुन्दरता और सौख्य की कल्पना कर रहा है| उसे यह विवेक होना चाहिये कि संसार तभी सुन्दर प्रतीत होता है, जब अन्तःकरण शुचिर्भूत होता है| प्राप्त होने वाली विलास की सामग्रियों के द्वारा भी मनुष्य तब तक सुखी नहीं हो सकता, जब तक कि मन प्रसन्न नहीं होता| सुख बाहरी जगत् की देन नहीं है, वह तो अन्तस् का पावन संगीत है| मन प्रसन्न है तो सारी वस्तुयें सुखदायक और मन अप्रसन्न हो तो सारी वस्तुयें दुःखदायक होती हैं| बाहर जो कुछ परिलक्षित हो रहा है, वह सब अन्तस् का प्रक्षेपण है| अतः सुखेच्छ भव्य को वासनाओं का विलय करने विषयक प्रयत्न करना चाहिये|
इस कार्यक्रम का कुशल संचालन ब्रह्मचारी श्री सुमित जी जैन (मन्दसौर) ने किया| उन्होंने सभा को ज्ञात कराया कि आचार्यश्री ने अब तक कुल मिला कर पचहत्तर ग्रन्थों का अनुवाद किया है| आचार्यश्री की प्रेरणा और परिश्रम के फलस्वरूप एक हजार अठारह ग्रन्थ Internet पर jaingranths.com निःशुल्क उपलब्ध हैं| आचार्यश्री का विचार है कि पॉंच हजार ग्रन्थ नेट पर उपलब्ध कराये जाये| आचार्यश्री नेट के माध्यम से जैन-पाठशाला प्रारम्भ करने वाले हैं| इसके लिये आवश्यक तैयारियॉं पूर्ण हो चुकी हैं|
ज्ञातव्य है कि आचार्यश्री की जन्मभूमि औरंगाबाद है| वे इस वर्ष औरंगाबाद में ही वर्षायोग करने वाले हैं|
कार्यक्रम के अन्त में पैठण समाज के मान्यवर सदस्य श्री विलास जी पहाड़े ने आगन्तुक अतिथियों का आभार-प्रदर्शन किया| अतिथियों के भोजन के साथ ही इस मांगलिक कार्यक्रम का समापन हुआ|

Tuesday, 8 May 2012

गणिनी पद समारोह


4 मई 2012 को परम पूज्य विद्या-वाचस्पति, गुरुवर श्री सुविधिसागर जी महाराज ने अपनी ही शिष्या पूज्य आर्यिका श्री सुविधिमती माताजी को गणिनी पद प्रदान किया. इसी दिन उन्होंने नमक रस का आजीवन त्याग कर दिया. इस अवसर पर पैठन समाज की और से पूज्य गुरुवर को आकिंचन्य श्रम्नेश्वर से अलंकृत किया.