
4 मई 2012 को परम पूज्य विद्या-वाचस्पति, गुरुवर श्री सुविधिसागर जी महाराज ने अपनी ही शिष्या पूज्य आर्यिका श्री सुविधिमती माताजी को गणिनी पद प्रदान किया. इसी दिन उन्होंने नमक रस का आजीवन त्याग कर दिया. इस अवसर पर पैठन समाज की और से पूज्य गुरुवर को आकिंचन्य श्रम्नेश्वर से अलंकृत किया.
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